श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६९ ] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा कृष्णचरितका वर्णन ३०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यापि पुत्रमिथुनं बभूवाभिजितः किल।<br>आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातौ कीर्तिमतां वरौ॥ ३७<br>आहुकात्काश्यदुहितुर्द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः।<br>देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ॥ ३८<br>देवकस्य सुता राज्ञो जज्ञिरे त्रिदशोपमाः।<br>देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः॥ ३९<br>तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ।<br>वृषदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता॥ ४०<br>श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा तथापरा।<br>देवकी चापि तासां च वरिष्ठाऽभूत्सुमध्यमा॥ ४१ | पुनर्वसुने जन्म लिया था। वह विद्वान्, सर्वज्ञ, दानी तथा यज्ञ करनेवाला हुआ। उस अभिजित्के जुड़वाँ पुत्र भी उत्पन्न हुए; कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आहुक तथा आहुकि नामवाले कहे गये हैं। आहुकसे काश्यकी पुत्रीको देवक एवं उग्रसेन नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे दोनों देवताओंके पुत्रोंके समान थे। राजा देवकके देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित—ये देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी सात बहनें थीं। राजाने उन्हें वसुदेवको दे दिया। वे वृषदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा तथा देवकी [नामवाली] थीं। उनमें देवकी वरिष्ठ एवं परम सुन्दरी थी॥ ३५—४१॥ |
| नवोग्रसेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ ४२<br>देवकस्य सुता पत्नी वसुदेवस्य धीमतः।<br>बभूव वन्द्या पूज्या च देवैरपि पतिव्रता॥ ४३<br>रोहिणी च महाभागा पत्नी चानकदुन्दुभेः।<br>पौरवी बाह्निकसुता सम्पूज्यासीत्सुरैरपि॥ ४४ | उग्रसेनके नौ पुत्र थे; कंस उनमें ज्येष्ठ था। उन सबके सैकड़ों-हजारों पुत्र तथा पौत्र थे। देवककी पुत्री [देवकी] बुद्धिमान् वसुदेवकी भार्या हुई; वह देवताओंकी भी वन्दनीया तथा पूजनीया और पतिव्रता थी। बाह्निकपुत्री पौरवी महाभाग्यशालिनी रोहिणी भी आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-की पत्नी थी; वह देवताओंके द्वारा भी पूजाके योग्य थी॥ ४२—४४॥ |
| असूत रोहिणी रामं बलश्रेष्ठं हलायुधम्।<br>आश्रितं कंसभीत्या च स्वात्मानं शान्ततेजसम्॥ ४५<br>जाते रामेऽथ निहते षड्गर्भे चातिदक्षिणे।<br><br>वसुदेवो हरिं धीमान् देवक्यामुदपादयत्॥ ४६<br>स एव परमात्मासौ देवदेवो जनार्दनः।<br>हलायुधश्च भगवाननन्तो रजतप्रभः॥४७<br>भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।<br>बभूव तस्यां देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः॥४८ | कंसके भयसे [स्वयं देवकीके गर्भसे निकलकर] रोहिणीके गर्भका आश्रय लेनेवाले, बलशालियोंमें श्रेष्ठ, हलका आयुध धारण करनेवाले तथा शान्त तेजवाले बलरामको रोहिणीने उत्पन्न किया; परम सुन्दर छः गर्भोंके [कंसद्वारा] वध कर दिये जानेके बाद और बलरामके जन्म लेनेके बाद बुद्धिमान् वसुदेवने देवकीसे श्रीकृष्णको उत्पन्न किया। वे ही परमात्मा, देवदेव तथा जनार्दन हैं और रजत (चाँदी)-के समान कान्तिवाले हलायुध (बलराम) भगवान् अनन्त (शेष) हैं। वे जनार्दन (श्रीविष्णु) भृगुके शापके बहाने मानवशरीर धारण करना स्वीकार करते हुए उस देवकीसे वसुदेवके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे॥ ४५—४८॥ |
| उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।<br>नियोगाद्देवदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥ ४९<br>सा चैव प्रकृतिः साक्षात्सर्वदेवनमस्कृता।<br>पुरुषो भगवान् कृष्णो धर्ममोक्षफलप्रदः॥ ५० | उसी समय देवदेव [श्रीविष्णु]-की आज्ञासे उमाके देहसे उत्पन्न योगनिद्रा [भगवती] कौशिकीने यशोदाकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया था। वे ही सभी देवताओंसे नमस्कृत साक्षात् प्रकृति हैं और धर्म तथा मोक्षका फल देनेवाले भगवान् कृष्ण पुरुष हैं॥ ४९-५०॥ |