श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३०२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तां कन्यां जगृहे रक्षन् कंसात्स्वात्यात्मजं तदा।<br>चतुर्भुजं विशालाक्षं श्रीवत्सकृतलाञ्छनम् ॥ ५१<br>शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।<br>यशोदायै प्रदत्त्वा तु वसुदेवश्च बुद्धिमान् ॥ ५२<br>दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्षतामिति चाब्रवीत्।<br>रक्षकं जगतां विष्णुं स्वेच्छया धृतविग्रहम् ॥ ५३<br>प्रसादाच्चैव देवस्य शिवस्यामिततेजसः।<br>रामेण सार्धं तं दत्त्वा वरदं परमेश्वरम् ॥ ५४<br>भूभारनिग्रहार्थं च ह्यवतीर्णं जगद्गुरुम्।<br>अतो वै सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति ॥ ५५ | उस समय कंससे अपने पुत्रकी रक्षा करते हुए बुद्धिमान् वसुदेवने चार भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले श्रीवत्सके चिह्नसे युक्त, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले जनार्दनको यशोदाको देकर उस कन्याको ले लिया। लोकोंके रक्षक तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले इन विष्णुको देकर उन्होंने नन्दगोपसे कहा—'इसकी रक्षा कीजिये।' अमित तेजवाले देवदेव शिवकी कृपासे बलरामके साथ उन वरदायक, परमेश्वर, पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अवतीर्ण तथा जगत्के गुरु [श्रीकृष्ण]-को प्रदान करके कहा था—'इससे यादवोंका सब प्रकारका कल्याण होगा। यह देवकीका वही पुत्र है, जो हम लोगोंके कष्टोंको दूर करेगा'॥ ५१—५५ ½ ॥ |
| अयं स गर्भो देवक्या यो नः क्लेशान् हरिष्यति।<br>उग्रसेनात्मजायाथ कंसायानकदुन्दुभिः ॥ ५६<br>निवेदयामास तदा जातां कन्यां सुलक्षणाम्।<br>अस्यास्तवाष्टमो गर्भो देवक्याः कंस सुव्रत ॥ ५७<br>मृत्युरेव न सन्देह इति वाणी पुरातनी।<br>ततस्तां हन्तुमारेभे कंसः सोल्लङ्घ्य चाम्बरम् ॥ ५८<br><br>उवाचाष्टभुजा देवी मेघगम्भीरया गिरा।<br>रक्षस्व तत्स्वकं देहमायातो मृत्युरेव ते ॥ ५९<br>रक्षमाणस्य देहस्य मायावी कंसरूपिणः।<br>किं कृतं दुष्कृतं मूर्ख जातः खलु तवान्तकृत् ॥ ६० | उसके बाद वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंससे सुन्दर लक्षणोंवाली उस उत्पन्न हुई कन्याके विषयमें बताया—हे कंस! हे सुव्रत! यह देवकीका आठवाँ गर्भ ही तुम्हारा मृत्युरूप होगा; इसमें सन्देह नहीं—यह पुरातन वाणी है। तब कंसने उसे मारना आरम्भ किया। किंतु [उसके हाथसे छूटकर] आकाशमें जाकर उस अष्टभुजा देवीने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'[हे कंस!] अब तुम अपने देहकी रक्षा करो। मायावी कंसके स्वरूपमें रहनेवाले इस देहकी रक्षा करते हुए तुम्हारी मृत्यु आ गयी है; अरे, मूर्ख! तुमने कैसा अपराध कर डाला, तुम्हारा अन्त करनेवाला तो उत्पन्न हो चुका है'॥ ५६—६०॥ |
| देवक्याः स भयात्कंसो जघानैवाष्टमं त्विति।<br>स्मरन्ति विहितो मृत्युर्देवक्यास्तनयोऽष्टमः ॥ ६१<br>यस्तत्प्रतिकृतौ यत्नो भोजस्यासीद् वृथा हरेः।<br>प्रभावान्मुनिशार्दूलास्तया चैव जडीकृतः ॥ ६२<br>कंसोऽपि निहतस्तेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निहता बहवश्चान्ये देवब्राह्मणघातिनः ॥ ६३ | उस कंसने भयसे देवकीके आठवें गर्भको मार डालनेका प्रयत्न किया था; क्योंकि उसने स्मरण कर रखा था कि जिससे उसकी मृत्यु निर्धारित है, वह देवकीका आठवाँ पुत्र है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रतीकार करनेमें कंसका जो भी प्रयास था, वह व्यर्थ हो गया और [भगवान्] श्रीहरिके प्रभावसे उस वाणीके द्वारा वह कंस जड़ कर दिया गया था। [अन्तमें] अक्लिष्ट कर्म करनेवाले उन श्रीकृष्णने कंसको भी मार डाला और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका वध करनेवाले अन्य बहुत-से दुष्टोंको भी मार डाला॥ ६१—६३॥ |