भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 834 में से

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पृष्ठ 305

अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... श्रीकृष्णचरितका वर्णन ३०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य कृष्णस्य तनयाः प्रद्युम्नप्रमुखास्तथा।<br>बहवः परिसंख्याताः सर्वे युद्धविशारदाः॥ ६४<br>कृष्णपुत्राः समाख्याताः कृष्णेन सदृशाः सुताः।<br>पुत्रेष्वेतेषु सर्वेषु चारुदेष्णादयो हरेः॥ ६५<br>विशिष्टा बलवन्तश्च रौक्मिणेयारिसूदनाः।<br>षोडशस्त्रीसहस्त्राणि शतमकं तथाधिकम्॥ ६६<br>कृष्णस्य तासु सर्वासु प्रिया ज्येष्ठा च रुक्मिणी।<br>तया द्वादशवर्षाणि कृष्णोनाक्लिष्टकर्मणा ॥ ६७<br>उष्यता वायुभक्षेण पुत्रार्थं पूजितो हरः।<br>चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः ॥ ६८<br>चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः साम्ब एव च।<br>एते लब्धास्तु कृष्णेन शूलपाणिप्रसादतः ॥ ६९उन श्रीकृष्णके प्रद्युम्न आदि बहुत-से पुत्र बताये गये हैं; वे सब युद्धमें प्रवीण थे। कृष्णके पुत्र कृष्णके ही समान थे। श्रीकृष्णके इन सभी पुत्रोंमें चारुदेष्ण आदि पुत्र विशिष्ट तथा बलवान् थे; वे रुक्मिणीके पुत्र शत्रुओंका विनाश करनेवाले थे। कृष्णकी सोलह हजार एक सौ भार्याएँ थीं; उन सबमें रुक्मिणी [उनकी] ज्येष्ठ पत्नी थी। अक्लिष्ट कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने उस [रुक्मिणी]-के साथ बारह वर्षोंतक उपवास करते हुए [केवल] वायुभक्षणसे पुत्रहेतु [भगवान्] शिवका पूजन किया था। [परिणामस्वरूप] श्रीकृष्णने शूलपाणि (शिव)-की कृपासे चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयश, प्रद्युम्न तथा साम्ब—इन पुत्रोंको प्राप्त किया था॥ ६४–६९॥
तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् रौक्मिणेयांश्च रुक्मिणीम्।<br>जाम्बवत्यब्रवीत्कृष्णं भार्या कृष्णस्य धीमतः ॥ ७०<br>मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तरम्।<br>सुरेशसम्मितं पुत्रं प्रसन्नो दातुमर्हसि ॥ ७१<br>जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथस्ततो हरिः।<br>तपस्तप्तुं समारेभे तपोनिधिरनिन्दितः ॥ ७२रुक्मिणीके उन वीर पुत्रोंको तथा रुक्मिणीको देखकर बुद्धिमान् कृष्णकी पत्नी जाम्बवतीने कृष्णसे कहा—'हे कमलनयन! आप प्रसन्न होकर मुझे विशिष्ट, महान् गुणी तथा शिवजीको प्रिय पुत्र प्रदान कीजिये। तदनन्तर जाम्बवतीका वचन सुनकर अनिन्द्य एवं तपोनिधि जगन्नाथ श्रीहरिने तप करना प्रारम्भ किया॥ ७०–७२॥
सोऽथ नारायणः कृष्णः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>व्याघ्रपादस्य च मुनेर्गत्वा चैवाश्रमोत्तमम् ॥ ७३<br>ऋषिं दृष्ट्वा त्वङ्गिरसं प्रणिपत्य जनार्दनः।<br>दिव्यं पाशुपतं योगं लब्ध्वांस्तस्य चाज्ञया ॥ ७४शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले उन जनार्दन नारायण श्रीकृष्णने मुनि व्याघ्रपादके श्रेष्ठ आश्रममें जाकर उन अंगिरागोत्रीय ऋषिको देखकर उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञासे दिव्य पाशुपतयोग प्राप्त किया॥ ७३–७४॥
प्रलुप्तश्मश्रुकेशश्च घृताक्तो मुञ्जमेखली।<br>दीक्षितो भगवान् कृष्णस्तताप च परंतपः ॥ ७५<br>ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितः।<br>फलाम्ब्वनिलभोजी च ऋतुत्रयमधोक्षजः ॥ ७६दाढ़ी तथा सिरको मुण्डित कराकर, शरीरको घृतसे अनुलिप्तकर तथा मूँजकी मेखला धारण करके [व्रतमें] दीक्षित होकर परंतप भगवान् श्रीकृष्ण तपस्या करने लगे। उन श्रीकृष्णने हाथोंको ऊपर उठाकर, आश्रयरहित होकर तथा पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित होकर क्रमशः फल, जल एवं वायुका आहार ग्रहण करते हुए तीन ऋतुओं तक तपस्या की॥ ७५–७६॥
तपसा तस्य सन्तुष्टो ददौ रुद्रो बहून् वरान्।<br>साम्बं जाम्बवतीपुत्रं कृष्णाय च महात्मने ॥ ७७<br>तथा जाम्बवती चैव साम्बं भार्या हरेः सुतम्।<br>प्रहर्षमतुलं लेभे लब्ध्वादित्यं यथादितिः ॥ ७८उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर [भगवान्] रुद्रने महात्मा कृष्णको अनेक वर प्रदान किया तथा जाम्बवतीसे साम्ब नामक पुत्र प्राप्त होनेका वर प्रदान किया। तब श्रीकृष्णकी भार्या जाम्बवती पुत्र साम्बको प्राप्त करके
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