श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उसी प्रकार परम हर्षित हुई, जैसे अदिति आदित्यको प्राप्त करके हर्षित हुई थीं॥ ७७-७८॥ | |
| बाणस्य च तदा तेन च्छेदितं मुनिपुङ्गवाः।<br>भुजानां चैव साहस्त्रं शापाद्रुद्रस्य धीमतः॥ ७९<br>अथ दैत्यवधं चक्रे हलायुधसहायवान्।<br>तथा दुष्टक्षितीशानां लीलयैव रणाजिरे॥ ८० | हे मुनिश्रेष्ठो! उन श्रीकृष्णने बुद्धिमान् रुद्रके शापके कारण बाणासुरकी हजार भुजाओंको काट डाला था। इसके बाद बलरामको सहायक बनाकर उन्होंने युद्धक्षेत्रमें लीलापूर्वक [अनेक] दैत्योंका तथा दुष्ट राजाओंका वध किया॥ ७९-८०॥ |
| स हत्वा देवसम्भूतं नरकं दैत्यपुङ्गवम्।<br>ब्राह्मणस्योर्ध्वचक्रस्य वरदानान्महात्मनः॥ ८१<br>स्वोपभोग्यानि कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि जग्राह सहस्त्राणि महाबलः॥ ८२ | यज्ञवराहसे उत्पन्न दैत्यश्रेष्ठ नरकासुरका वध करके अतुलनीय पराक्रमवाले तथा महाबली उन श्रीकृष्णने ऊर्ध्वचक्रवाले वायुदेव तथा ब्रह्मापुत्र महात्मा नारदके वरदानसे अपने उपभोगके योग्य सोलह हजार एक सौ कन्याओंको ग्रहण किया था॥ ८१-८२॥ |
| शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान् कुलम्।<br>संहृत्य तत्कुलं चैव प्रभासेऽतिष्ठदच्युतः॥ ८३<br>तदा तस्यैव तु गतं वर्षाणामधिकं शतम्।<br>कृष्णस्य द्वारकायां वै जराक्लेशापहारिणः॥ ८४ | उन्होंने विप्रोंके शापके बहाने अपने कुलका संहार कर डाला और उस कुलका संहरण करके वे अच्युत (श्रीकृष्ण) प्रभासक्षेत्रमें रहने लगे। तदनन्तर वृद्धावस्थाके कष्टका हरण करनेवाले उन श्रीकृष्णका द्वारकामें रहते हुए सौ वर्षसे अधिक समय व्यतीत हुआ॥ ८३-८४॥ |
| विश्वामित्रस्य कण्वस्य नारदस्य च धीमतः।<br>शापं पिण्डारकेऽरक्षद्वच्यो दुर्वाससतस्तदा॥ ८५<br>त्यक्त्वा च मानुषं रूपं जरकास्त्रच्छलेन तु।<br>अनुगृह्य च कृष्णोऽपि लुब्धकं प्रययौ दिवम्॥ ८६ | उन्होंने [द्वारकाके समीपवर्ती] पिण्डारकक्षेत्रमें निवास करनेवाले विश्वामित्र, कण्व, बुद्धिमान् नारद तथा दुर्वासाके शाप तथा वचनकी रक्षा की। [व्याधके द्वारा बनाये गये] जरकास्त्रके बहाने अपने मानवशरीरका परित्याग करके उस व्याधपर कृपा* करके वे श्रीकृष्ण द्युलोक [अपने धाम]-को चले गये॥ ८५-८६॥ |
| अष्टावक्रस्य शापेन भार्याः कृष्णस्य धीमतः।<br>चौरैश्चापहृताः सर्वास्तस्य मायाबलेन च॥ ८७<br>बलभद्रोऽपि सन्त्यज्य नागो भूत्वा जगाम च।<br>महिष्यस्तस्य कृष्णस्य रुक्मिणीप्रमुखाः शुभाः॥ ८८<br>सहाग्निं विविशुः सर्वाः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>रेवती च तथा देवी बलभद्रेण धीमता॥ ८९<br>प्रविष्टा पावकं विप्राः सा च भर्तृपथं गता।<br>प्रेतकार्यं हरेः कृत्वा पार्थः परमवीर्यवान्॥ ९० | अष्टावक्रमुनिके शापसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णकी सभी भार्याएँ उनकी मायाके प्रभावसे चोरोंद्वारा अपहृत कर ली गयीं। बलराम भी अपने शरीरका त्याग करके शेषनागका रूप धारणकर [अपने लोक] चले गये। उन श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि प्रमुख कल्याणमयी सभी पटरानियाँ अक्लिष्ट कर्मवाले श्रीकृष्णके साथ अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं। हे विप्रो! देवी रेवतीने भी बुद्धिमान् बलभद्रजीके साथ अग्निमें प्रवेश किया और उन्होंने अपने पतिके मार्गका अनुगमन किया॥ ८७-८९ १/२॥ |
* मा भैर्जै त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे। याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३०।३९)
[भगवान् श्रीकृष्णने कहा—] हे जेरे! तू डर मत, उठ-उठ! यह तो तूने मेरे मनका काम किया है। जा, मेरी आज्ञासे तू उस स्वर्गमें निवास कर, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानोंको होती है।