श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३०५ |
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| रामस्य च तथान्येषां वृष्णीनामपि सुव्रतः।<br>कन्दमूलफलैस्तस्य बलिकार्यं चकार सः॥ ९१<br><br>द्रव्याभावात्स्वयं पार्थो भ्रातृभिश्च दिवं गतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ९२ | तत्पश्चात् महाशक्तिशाली तथा उत्तम व्रतवाले उन अर्जुनने श्रीकृष्ण, बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशियोंका और्ध्वदेहिक कृत्य करके द्रव्योंके अभावके कारण कन्द-मूल-फलोंके द्वारा बलि-कार्य (पिण्डदानादि श्राद्धकार्य) किया; इसके बाद वे अर्जुन अपने भाइयोंके साथ स्वयं स्वर्गलोक चले गये॥ ९०-९१ १/२॥ |
| प्रभावो विलयश्चैव स्वेच्छयैव महात्मनः।<br>इत्येतत्सोमवंशानां नृपाणां चरितं द्विजाः॥ ९३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मणान् श्रावयेदपि।<br>स याति वैष्णवं लोकं नात्र कार्या विचारणा॥ ९४ | इस प्रकार मैंने अक्लिष्ट कर्मवाले महात्मा श्रीकृष्णके प्रभाव तथा अपनी इच्छासे उनके तिरोधानका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। हे द्विजो! जो [मनुष्य] सोमवंशीय राजाओंके इस चरित्रको पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णुलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९२-९४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशानुकीर्तनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवंशानुकीर्तन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६९॥
सत्तरवाँ अध्याय
महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविधसर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गस्त्वया सूत सूचितो न प्रकाशितः।<br>साम्प्रतं विस्तरेणैव वक्तुमर्हसि सुव्रत॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे सुव्रत! आपने आदिसृष्टिका परिचयमात्र दिया, उसपर प्रकाश नहीं डाला; अब आप [इसे] विस्तारसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>महेश्वरो महादेवः प्रकृतेः पुरुषस्य च।<br>परत्वे संस्थितो देवः परमात्मा मुनीश्वराः॥ २<br><br>अव्यक्तं चेश्वरात्तस्माद्भवत्कारणं परम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ३<br><br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ४<br><br>जगद्योनिं महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामीश्वराज्ञाप्रचोदितम्॥ ५<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभावव्ययम्।<br>अप्रकाशमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे समवर्तत॥ ६<br><br>अस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तं त्वासीच्छिवेच्छया।<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभागे तमोमये॥ ७ | **सूतजी बोले—**हे मुनीश्वरो! परमात्मा देव महेश्वर महादेव प्रकृति तथा पुरुषसे परे हैं। उन्हीं ईश्वरसे परम कारणस्वरूप अव्यक्त उत्पन्न हुआ, जिसे तत्त्वचिन्तक प्रधान तथा प्रकृति कहते हैं। यह गन्ध-वर्ण-रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, स्थिर, अविनाशी, शाश्वत, अपनी आत्मामें स्थित, जगत्की उत्पत्तिका स्रोत, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंका विग्रह (शरीर), ईश्वरकी आज्ञासे प्रेरित, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, सूक्ष्म, तीनों गुणोंसे युक्त, उत्पत्तिका स्रोत तथा अव्यय है; सर्गके आदि कालमें अव्यक्त तथा अविज्ञेय यह ब्रह्मरूप ही था। उस समय तमोमय अविभागके रहनेपर एवं गुणोंके समभावमें रहनेपर शिवकी इच्छासे इस |