भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308
३०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
[अव्यक्त]-के स्वरूपसे यह सम्पूर्ण [उत्पद्यमान] जगत् व्याप्त था॥ २-७॥
सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्य वै।<br>गुणभावाद् व्यज्यमानो महान् प्रादुर्बभूव ह॥ ८<br><br>सूक्ष्मेण महता चाथ अव्यक्तेन समावृतम्।<br>सत्त्वोद्रिक्तो महानग्रे सत्तामात्रप्रकाशकः॥ ९<br><br>मनो महांस्तु विज्ञेयमेकं तत्कारणं स्मृतम्।<br>समुत्पन्नं लिङ्गमात्रं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं हि तत्॥ १०सृष्टिकालमें क्षेत्रज्ञ (पुरुष)-के द्वारा अधिष्ठित प्रधानके गुणभावसे प्रेरित होता हुआ महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। पहले यह जगत् सूक्ष्म तथा महान् अव्यक्तसे आच्छादित था। इसके बाद सत्तामात्रका प्रकाशक सत्त्वगुण-प्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुआ। महत्तत्त्वको मनके रूपमें जानना चाहिये; यह सृष्टिका कारण कहा गया है। लिङ्ग-मात्र यह [महत्तत्त्व] जीवोंसे अधिष्ठित होकर उत्पन्न हुआ॥ ८-१०॥
धर्मादीनि च रूपाणि लोकतत्त्वार्थहेतवः।<br>महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया॥ ११यह महान् (महत्तत्त्व) सृष्टिकी इच्छासे ईश्वरके द्वारा प्रेरित होकर सृष्टिको तथा सृष्ट जीवोंके परमार्थ कारणभूत वेदों, धर्म आदि रूपोंको विस्तारित करता है॥ ११॥
मनो महान् मतिर्ब्रह्म पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा चितिः स्मृतिः संविद्विश्वेशश्चेति स स्मृतः॥ १२वे महेश्वर ही मन, महान्, मति, ब्रह्म, पूः, बुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, चिति, स्मृति, संविद् तथा विश्वेश कहे गये हैं॥ १२॥
मनुते सर्वभूतानां यस्माच्चेष्टा फलं ततः।<br>सौक्ष्म्यात्तेन विभक्तं तु येन तन्मन उच्यते॥ १३वे समस्त जीवोंका कर्मफल जानते हैं और इस मनके द्वारा सूक्ष्मताके कारण उस कर्मफलसे जगत् विभक्त है, इसलिये इन्हें ‘मन’ कहा जाता है॥ १३॥
तत्त्वानांमग्रजो यस्मान्महांश्च परिमाणतः।<br>विशेषेभ्यो गुणेभ्योऽपि महानिति ततः स्मृतः॥ १४ये सभी तत्त्वोंसे पहले उत्पन्न हुए हैं और परिमाणमें सत्त्व आदि गुणोंसे भी अधिक महान् हैं, इसलिये वे ‘महान्’ कहे गये हैं॥ १४॥
बिभर्ति मानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि च।<br>पुरुषो भोगसम्बन्धात्तेन चासौ मतिः स्मृतः॥ १५वे पुरुष [ईश्वर] भोगसम्बन्धके कारण सबका पोषण करते हैं, सम्पूर्ण प्रमाणको जानते हैं तथा समस्त भेद मानते हैं, इसलिये वे ‘मति’ कहे गये हैं॥ १५॥
बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च भावानां सकलाश्रयात्।<br>यस्माद्धारयते भावान् ब्रह्म तेन निरुच्यते॥ १६वे [महेश्वर] बृहत् होने, सबके पोषक होने तथा भावोंका सम्पूर्ण आश्रय होनेके कारण [समस्त] भावोंको धारण करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ब्रह्म’ कहा जाता है॥ १६॥
यः पूरयति यस्माच्च कृत्स्नान् देवाननुग्रहैः।<br>नयते तत्त्वभावं च तेन पूरिति चोच्यते॥ १७वे [महेश्वर] सभी देवताओंको [अपने] अनुग्रहोंसे परिपूर्ण करते हैं तथा उन्हें तत्त्वभाव प्राप्त कराते हैं, इसलिये वे ‘पूः’ कहे जाते हैं॥ १७॥
बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान् हितं तथा।<br>यस्माद् बोधयते चैव बुद्धिस्तेन निरुच्यते॥ १८वे ईश्वर इस ब्रह्माण्डमें समस्त भावों तथा हित (धर्म)-को [स्वयं] जानते हैं एवं [जीवोंको] बोध