श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०७
| कराते हैं, इसलिये उन्हें 'बुद्धि' कहा जाता है॥ १८॥ | |
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| ख्यातिः प्रत्युपभोगश्च यस्मात्संवर्तते ततः।<br>भोगस्य ज्ञाननिष्ठत्वात्तेन ख्यातिरिति स्मृतः॥ १९<br><br>ख्यायते तद्गुणैर्वापि ज्ञानादिभिरनेकंशः।<br>तस्माच्च महतः संज्ञा ख्यातिरितृत्यभिधीयते॥ २० | ज्ञाननिष्ठाके कारण [विषय-सम्बन्धी] सुखकी ख्याति (प्रशंसा) तथा भोगकी प्राप्ति उन्हीं ईश्वरसे प्रवर्तित होती है, इसलिये वे 'ख्याति' कहे गये हैं। [आकाश आदिके शब्द आदि] गुणोंके द्वारा तथा ज्ञान आदिके द्वारा सत्पुरुष उनकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये भी उन महान् (पूज्य) ईश्वरका नाम 'ख्याति' कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| साक्षात्सर्वं विजानाति महात्मा तेन चेश्वरः।<br>यस्माज्ज्ञानानुगश्चैव प्रज्ञा तेन स उच्यते॥ २१ | वे महात्मा शिव सम्पूर्ण जगत्को प्रत्यक्ष रूपसे जानते हैं, इसलिये 'ईश्वर' कहे जाते हैं और [स्वयं] ज्ञानरूप हैं, इसलिये 'प्रज्ञा' कहे जाते हैं॥ २१॥ |
| ज्ञानादीनि च रूपाणि बहुकर्मफलानि च।<br>चिनोति यस्माद्भोगार्थं तेनासौ चितिरुच्यते॥ २२ | वे [जीवोंको] भोगोंकी प्राप्तिके लिये ज्ञान आदि रूपों तथा अनेकविध कर्मफलोंका विस्तार करते हैं, इसलिये वे 'चिति' कहे जाते हैं॥ २२॥ |
| वर्तमानव्यतीतानि तथैवानागतान्यपि।<br>स्मरते सर्वकार्याणि तेनासौ स्मृतिरुच्यते॥ २३ | वे [महेश्वर] वर्तमान, भूत तथा भविष्यके भी समस्त कार्योंका स्मरण करते हैं अर्थात् उनका ज्ञान रखते हैं, इसलिये वे 'स्मृति' कहे जाते हैं॥ २३॥ |
| कृत्स्नं च विन्दते ज्ञानं यस्मान्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तस्माद्विन्देर्विदेश्चैव संविदित्युभिधीयते॥ २४<br><br>विद्यतेऽपि च सर्वत्र तस्मिन् सर्वं च विन्दति।<br>तस्मात्संविदिति प्रोक्तो महद्भिर्मु निसत्तमाः॥ २५ | वे सम्पूर्ण ज्ञान तथा उत्तम माहात्म्यको जानते हैं, इसलिये वे 'विन्द्' तथा 'विद्' धातुसे व्युत्पन्न 'संविद्' रूप भी कहे जाते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे सर्वत्र विद्यमान हैं और भक्त उन [शिव]-में ही सब कुछ प्राप्त करता है, इसलिये वे महात्माओंद्वारा 'संविद्' कहे गये हैं॥ २४-२५॥ |
| जानातेर्ज्ञानमित्याहुर्भगवान् ज्ञानसन्निधिः।<br>बन्धनादिपरीभावादीश्वरः प्रोच्यते बुधैः॥ २६ | 'ज्ञा' धातुसे 'ज्ञान' शब्द कहा गया है। ज्ञानसमुद्र भगवान् शिव बन्धन आदिका तिरस्कार करनेके कारण विद्वानोंद्वारा 'ईश्वर' कहे गये हैं॥ २६॥ |
| पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम्।<br>व्याख्यातं तत्त्वभावज्ञैर्देवस्सद्भावचिन्तकैः॥ २७ | इस प्रकार महेश्वरके उत्तम भावोंका चिन्तन करनेवाले तत्त्ववेत्ताओंने अनेक अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाले शब्दोंके द्वारा आदि (सबसे पहले उत्पन्न) सर्वोत्तम 'शिव' नामक तत्त्वका वर्णन किया है॥ २७॥ |
| महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया।<br>सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम्॥ २८ | सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर 'महत्' सृष्टिकार्यको विस्तारित करता है। संकल्प तथा अध्यवसाय—ये उसकी दो वृत्तियाँ कही गयी हैं॥ २८॥ |
| त्रिगुणाद्रजसोद्रिक्तादहङ्कारस्ततोऽभवत् ।<br>महता च वृतः सर्गो भूतादिर्बाह्यतस्तु सः॥ २९ | रजोगुणप्रधान त्रिगुणके कारण वह [उत्पद्यमान] सर्ग, भूत आदि तथा अहंकार महत्के द्वारा बाहरसे ढके |