भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 310
३०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादेव तमोद्रिक्तादहङ्कारादजायत।<br>भूततन्मात्रसर्गस्तु भूतादिस्तामसस्तु सः॥ ३०<br><br>भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह।<br>आकाशं सुशिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम्॥ ३१<br><br>आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्।<br>वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ३२<br><br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते।<br>स्पर्शमात्रस्तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ३३<br><br>ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह।<br>सम्भवन्ति ततो ह्यापस्ता वै सर्वरसात्मिकाः॥ ३४<br><br>रसमात्रास्तु ता ह्यापो रूपमात्रोऽग्निरावृणोत्।<br>आपश्चापि विकुर्वत्यो गन्धमात्रं ससर्जिरे॥ ३५<br><br>सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः।<br>तस्मिंस्तस्मिंश्च तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता॥ ३६हुए थे। उसी तमोगुणप्रधान अहंकारसे शब्द-स्पर्श आदि तन्मात्राओंका आकाश आदि तामस सर्ग हुआ। सृष्टिका विस्तार करते हुए भूतादिने शब्दमात्र आकाशका सृजन किया; उससे शब्दलक्षणवाला सुषिर (पुष्कर नामक) आकाश उत्पन्न हुआ। शब्दतन्मात्रावाले आकाशने स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया। सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए वायुने रूपतन्मात्रावाले अग्निको उत्पन्न किया। वायुसे जो ज्योति [अग्नि] उत्पन्न होती है, वह वायुके ही रूप तथा गुणवाली कही जाती है। इस प्रकार स्पर्शतन्मात्रावाले वायुने रूपतन्मात्रावाली अग्निको आच्छादित किया। सृष्टिको विस्तारित करती हुई ज्योति [अग्नि]ने रसतन्मात्राको उत्पन्न किया; उससे सर्वरसमय जल उत्पन्न हुआ। रूपतन्मात्रावाली अग्निने उस रसतन्मात्रात्मक जलको आच्छादित किया। पुनः सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए जलने गन्धतन्मात्राका सृजन किया, उससे पृथिवी उत्पन्न हुई; उसका गुण गन्ध माना गया है। वे शब्द आदि गुण अपने-अपने धर्मियोंमात्रमें ही स्थित रहते हैं। अतः उनमें तन्मात्रता कही गयी है॥ २९-३६॥
अविशेषवाचकत्वादविशेषास्ततस्तु ते।<br>प्रशान्तघोरमूढत्वादविशेषास्ततः पुनः॥ ३७<br><br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं विज्ञेयस्तु परस्परम्।<br>वैकारिकादहङ्कारात्सत्त्वोद्रिक्तात्तु सात्त्विकात्॥ ३८वे [शब्द आदि] अविशेषके वाचक होनेके कारण तन्मात्र शब्दका प्रतिपादक होनेके कारण तथा प्रशान्त (सात्त्विक), घोर (राजस) और मूढ़ (तामस) होनेके कारण अविशेष कहे गये हैं। इसे परस्पर (पंच) भूतोंकी तन्मात्राओंका सर्ग (सृष्टि) जानना चाहिये। वैकारिक [राजस] अहंकारसे और सत्त्वप्रधान सात्त्विक अहंकारसे वह वैकारिक सर्ग एक साथ प्रवर्तित होता है॥ ३७-३८ १/२॥
वैकारिकः स सर्गस्तु युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च॥ ३९<br><br>साधकानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश।<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम्॥ ४०<br><br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि तानि वै॥ ४१<br><br>पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत्।<br>गतिर्विसर्गो ह्यानन्दः शिल्पं वाक्यं च कर्म तत्॥ ४२पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये इन्द्रियाँ साधनस्वरूप हैं और उनके दस राजस अधिष्ठाता देवता हैं। जो ग्यारहवाँ मन है, वह अपने गुणसे उभयात्मक (ज्ञान-कर्मेन्द्रियात्मक) है। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा पाँचवीं नासिका—ये इन्द्रियाँ शब्द आदिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानयुक्त होती हैं। दोनों पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, दोनों हाथ तथा दसवीं वाणी है; क्रमशः गति, विसर्ग (मलत्याग), आनन्द, शिल्प तथा बोलना उनका कार्य है॥ ३९-४२॥