श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आकाशं शब्दमात्रं च स्पर्शमात्रं समाविशत्।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत्॥ ४३<br>रूपं तथैव विशतः शब्दस्पर्शगुणावुभौ।<br>त्रिगुणस्तु ततस्त्वग्निः सशब्दस्पर्शरूपवान्॥ ४४<br>सशब्दस्पर्शरूपं च रसमात्रं समाविशत्।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः॥ ४५<br>शब्दस्पर्शं च रूपं च रसो वै गन्धमाविशत्।<br>सङ्गता गन्धमात्रेण आविशन्तो महीमिमाम्॥ ४६<br>तस्मात्पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शस्यते।<br>शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः॥ ४७<br>परस्परानुपवेशाद्धारयन्ति परस्परम्।<br>भूमेरन्तस्त्विदं सर्वं लोकालोकाचलावृतम्॥ ४८ | शब्दतन्मात्रावाला आकाश स्पर्शतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुणवाला हुआ। शब्द एवं स्पर्श—ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, अतः शब्द-स्पर्श-रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणोंवाला हुआ। शब्द-स्पर्श-रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जलको चार गुणोंवाला जानना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये गन्धतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए। अतः गन्धतन्मात्राके साथ इस पृथ्वीमें इनके प्रवेश करनेपर पृथ्वी पाँच गुणोंवाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [पाँचों] भूतोंमें श्रेष्ठ कही जाती है। अतः [अधिक गुणके कारण] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुणवाले हैं; इसी कारणसे वे विशेष कहे गये हैं। परस्पर प्रवेश करनेके कारण वे एक-दूसरेको धारण करते हैं। भूमिके भीतर यह सब लोकालोकपर्वतसे आवृत है॥ ४३-४८॥ |
| विशेषाश्चेन्द्रियग्राह्या नियतत्वाच्च ते स्मृताः।<br>गुणं पूर्वस्य सर्गस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तराः॥ ४९<br>तेषां यावच्च तद्यच्च यच्च तावद् गुणं स्मृतम्।<br>उपलभ्याप्सु वै गन्धं केचिद् ब्रूयुरपां गुणम्॥ ५०<br>पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रयात्।<br>एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्॥ ५१<br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महादयो विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते॥ ५२ | वे विशेष (शब्द आदि) नियतत्वके कारण इन्द्रिय-ग्राह्य कहे गये हैं। पूर्व सर्ग (आकाश आदि)-के गुणको उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं। उन शब्द आदिमें जितनी मात्रामें जो गुण होता है, उतनी ही मात्रामें उसे कहा गया है। जलमें गन्धका अनुभव होनेपर कुछ लोग कहते हैं कि यह जलका गुण है। पृथ्वीमें उस गन्धको जल तथा वायुके संयोगसे जानना चाहिये। महान् आत्मावाले ये सातों [महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण] एक-दूसरेके आश्रयसे रहते हैं। महत्तत्त्वसे लेकर [शब्द आदि] विशेषतक पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण तथा अव्यक्त [परमेश्वर]-के अनुग्रहसे ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ४९-५२॥ |
| एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवन्महत्तदुदकेशयम् ॥५३<br>अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैतास्तेजसा बाह्यतो वृताः॥ ५४<br>तेजो दशगुणेनैव वायुना बाह्यतो वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ५५<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम्।<br>भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान्॥ ५६ | जलमें बुलबुलेकी भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों (शब्द आदि)-से एक ही बारमें उत्पन्न हुआ; वह जलमें स्थित था। वह अण्ड [अपनेसे] दस गुना विस्तारवाले जलसे बाहरसे घिरा था; यह जल दस गुना विस्तारवाले तेज (अग्नि)-से बाहरसे घिरा था, तेज दस गुना विस्तारवाले वायुसे बाहरसे घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तारवाले आकाशसे बाहरसे घिरा था, जिस आकाशसे वायु आवृत था, वह आकाश |