भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
भूत आदिसे घिरा था। भूत आदि महत्तत्त्वसे घिरे थे और महत्तत्त्व [उस] अव्यक्तसे घिरा था॥ ५३-५६॥
शर्वश्चाण्डकपालस्थो भवश्चाम्भसि सुव्रताः ।<br>रुद्रोऽग्निमध्ये भगवानुग्रो वायौ पुनः स्मृतः ॥ ५७<br><br>भीमश्चावनिमध्यस्थो ह्यहङ्कारे महेश्वरः ।<br>बुद्धौ च भगवानीशः सर्वतः परमेश्वरः ॥ ५८हे सुव्रतो! शर्व [उस] अण्डके कपालपर स्थित हैं और भव जलमें स्थित हैं; रुद्र अग्निमें तथा भगवान् उग्र वायुमें [स्थित] कहे गये हैं; भीम पृथ्वीके मध्यमें स्थित हैं, महेश्वर अहंकारमें स्थित हैं, भगवान् ईश बुद्धिमें स्थित हैं और परमेश्वर सर्वत्र स्थित हैं॥ ५७-५८॥
एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ।<br>एता आवृत्य चान्योन्यमष्टौ प्रकृतयः स्थिताः ॥ ५९<br><br>प्रसर्गकाले स्थित्वा तु ग्रसन्त्येताः परस्परम् ।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ॥ ६०<br><br>आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु ।<br>महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् ॥ ६१<br><br>अण्डाज्जज्ञे स एवेशः पुरुषोऽर्कसमप्रभः ।<br>तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धं स्वेच्छयैव तु ॥ ६२<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते ।<br>तस्य वामाङ्गजो विष्णुः सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ६३<br><br>लक्ष्म्‍या देव्या ह्याभूद्देव इच्छया परमेष्ठिनः ।<br>दक्षिणाङ्गोद्भवो ब्रह्मा सरस्वत्या जगद्गुरुः ॥ ६४अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे आवृत है और एक-दूसरेको आवृत करके ये आठ प्रकृतियाँ (मूर्तियाँ) स्थित हैं। इस प्रकार स्थित होकर ये प्रसर्गकालमें एक-दूसरेको ग्रसती हैं और सृष्टिकालमें साथ-साथ उत्पन्न होकर एक-दूसरेको धारण करती हैं। वे विकार आधार-आधेयभावसे विकारियोंमें रहते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न हुआ है। सूर्यके समान प्रभाववाले वे पुरुष परमेश्वर ही अण्डसे उत्पन्न हुए; उन पुरुषमें [उत्पद्यमान] सृष्टिका उत्पादन अपनी इच्छासे हुआ। वे ही प्रथम शरीरधारी और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। सभी देवताओंसे नमस्कृत [भगवान्] विष्णु देवी लक्ष्मीके साथ शिवकी इच्छासे उनके बायें अंगसे उत्पन्न हुए और जगद्गुरु ब्रह्मा सरस्वतीके साथ [उनके] दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए॥ ५९-६४॥
तस्मिन्नण्डे इमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।<br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥ ६५<br><br>लोकालोकद्वयं किञ्चिदण्डे ह्यस्मिन् समर्पितम् ।<br>यत्तु सृष्टौ प्रसंख्यातं मया कालान्तरं द्विजाः ॥ ६६<br><br>एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहर्वै पारमेश्वरम् ।<br>रात्रिश्चैतावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः ॥ ६७<br><br>अहस्तस्य तु या सृष्टिः रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः ।<br>नाहस्तु विद्यते तस्य न रात्रिरीति धारयेत् ॥ ६८<br><br>उपचारस्तु क्रियते लोकानां हितकाम्यया ।उस अण्डमें ये लोक और यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। नक्षत्रों, ग्रहों तथा वायुसहित सूर्य-चन्द्रमा भी इसीमें हैं। दोनों लोकालोक [पर्वत] तथा सब कुछ इस अण्डमें स्थित है। हे द्विजो! अब मैं सृष्टिमें कहे गये कालान्तरको बताता हूँ। इस कालान्तरको परमेश्वरका दिन जानना चाहिये और [उन] परमेश्वरकी पूर्णरूपसे उतने ही कालकी रात जाननी चाहिये। जो सृष्टि है, वही उनका दिन है और प्रलयकालको उनकी रात कहा गया है। ऐसा मानना चाहिये कि न तो उनका दिन है और न उनकी रात; [केवल] लोकोंके हितकी कामनासे [उनके द्वारा] रात-दिनका ऐसा उपचार किया जाता है॥ ६५-६८ १/२॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ॥ ६९इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके विषय, पाँच महाभूत, सभी