श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात्सर्वाणि भूतानि बुद्धिश्च सह दैवतैः।<br>अहस्तिष्ठन्ति सर्वाणि परमेशस्य धीमतः॥ ७०<br><br>अहरन्ते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसम्भवः।<br>स्वात्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते॥ ७१<br><br>साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ।<br>तमःसत्त्वरजोपेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ॥ ७२<br><br>अनुपृक्तावभूतान्तावोतप्रोतौ परस्परम्।<br>गुणसाम्ये लयो ज्ञेयो वैषम्ये सृष्टिरुच्यते॥ ७३<br><br>तिले यथा भवेत्तैलं घृतं पयसि वा स्थितम्।<br>तथा तमसि सत्त्वे च रजस्यनुसृतं जगत्॥ ७४ | प्राणी तथा बुद्धि—ये सब देवताओंके साथ बुद्धिमान् परमेश्वरके दिनके समय विद्यमान रहते हैं और दिनके अन्तमें विलीन हो जाते हैं। रात्रिका अन्त होनेपर पुनः विश्वकी उत्पत्ति होती है। उस समय व्यक्तके अपनी आत्मामें स्थित होनेपर तथा विकारके विलीन हो जानेपर प्रधान एवं पुरुष अपने लक्षणोंके साथ स्थित होते हैं। तम, सत्त्व तथा रजसे युक्त वे दोनों समत्वसे व्यवस्थित होकर एक-दूसरेमें मिलकर ओत-प्रोत हो जाते हैं। गुणोंकी साम्यास्थितिमें लयको जानना चाहिये और वैषम्यकी स्थितिमें सृष्टि कही जाती है। जैसे तिलमें तेल तथा दूधमें घी स्थित होता है, उसी प्रकार तम-सत्त्व-रजमें जगत् स्थित रहता है॥ ६९—७४॥ |
| उपास्य रजनीं कृत्स्नां परां माहेश्वरीं तथा।<br>अहर्मुखे प्रवृत्तश्च परः प्रकृतिसम्भवः॥ ७५<br><br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः।<br>प्रधानं पुरुषञ्चैव प्रविश्य स महेश्वरः॥ ७६<br><br>महेश्वरात् त्रयो देवा जज्ञिरे जगदीशवरात्।<br>शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः॥ ७७ | पूरी रात परात्पर माहेश्वरीकी उपासना करके दिनका आरम्भ होनेपर प्रकृतिसे उत्पन्न परमेश्वर सृष्टिके लिये प्रवृत्त होते हैं। वे परमेश्वर महेश्वर (शिव) प्रधान तथा पुरुषमें प्रवेश करके श्रेष्ठ योगके द्वारा क्षोभ उत्पन्न करते हैं। तब शाश्वत, परम गुह्य, सर्वात्मा तथा शरीर-धारी तीन देवता [उन] जगदीश महेश्वरसे उत्पन्न होते हैं॥ ७५—७७॥ |
| एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः।<br>एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयोऽग्नयः॥ ७८<br><br>परस्पराश्रिता ह्येते परस्परमनुव्रताः।<br>परस्परेण वर्तन्ते धारयन्ति परस्परम्॥ ७९<br><br>अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः।<br>क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजन्ति परस्परम्॥ ८० | ये ही तीनों [ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर] देवता, ये ही तीनों गुण, ये ही तीनों लोक तथा ये ही तीनों अग्नयाँ हैं। ये देवता एक-दूसरेका आश्रय लेकर एक-दूसरेका अनुसरण करते हुए एक-दूसरेसे व्यवहार करते हैं और एक-दूसरेको धारण करते हैं। ये परस्पर संयोग करते हैं तथा एक-दूसरेके उपजीवी हैं; क्षणभरके लिये इनका वियोग नहीं होता है, ये एक-दूसरेका त्याग [कभी] नहीं करते हैं॥ ७८—८०॥ |
| ईश्वरस्तु परो देवो विष्णुश्च महतः परः।<br>ब्रह्मा च रजसा युक्तः सर्गादौ हि प्रवर्तते॥ ८१<br><br>परः स पुरुषो ज्ञेयः प्रकृतिः सा परा स्मृता॥ ८२ | महेश्वर सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, विष्णु महत्से परे हैं और ब्रह्मा रजोगुणसे युक्त होकर सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होते हैं। उस पुरुषको 'पर' जानना चाहिये और वह प्रकृति 'परा' कही गयी है॥ ८१-८२॥ |
| अधिष्ठिता सा हि महेश्वरेण<br>प्रवर्तते चोद्यमाने समन्तात्।<br>अनुप्रवृत्तस्तु महांस्तदेनां<br>चिरस्थिरत्वाद्विषयं श्रियः स्वयम्॥ ८३ | महेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह प्रकृति सभी ओरसे सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होती है और उस समय चिरस्थायी होनेके कारण महत्तत्त्व ऐश्वर्यके विषयको स्वयं धारणकर इस प्रकृतिका अनुगमन करता है॥ ८३॥ |