श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकालः प्रवर्तते।<br>ईश्वराधिष्ठितात्पूर्वं तस्मात्सदसदात्मकात्॥ ८४<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे रुद्रश्चाग्रे ह्यवर्तत।<br>तेजसाप्रतिमो धीमानव्यक्तः सम्प्रकाशकः॥ ८५<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>ब्रह्मा च भगवांस्तस्माच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः॥ ८६<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे तथा वै समवर्तत।<br>एक एव महादेवस्त्रिधैव स व्यवस्थितः॥ ८७<br><br>अप्रतीपेन ज्ञानेन ऐश्वर्येण समन्वितः।<br>धर्मेण चाप्रतीपेन वैराग्येण च तेऽन्विताः॥ ८८ | सबसे पहले ईश्वरसे अधिष्ठित तथा सत्-असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्यके कारण सृष्टिका काल प्रवर्तित होता है। अपने तेजसे अनुपम, बुद्धिमान्, अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करनेवाले रुद्र सबसे पहले कार्य करनेमें तत्पर हुए। वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। चार मुखवाले तथा प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य करनेमें समर्थ हुए। इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपोंमें व्यवस्थित हैं। वे [महादेव] अनुकूल ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्यसे युक्त हैं॥ ८४-८८॥ |
| अव्यक्ताज्जायते तेषां मनसा यद्यदीहितम्।<br>वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यं सापेक्षत्वात्स्वभावतः॥ ८९ | वशीभूत होने तथा सापेक्ष होनेके कारण उन देवताओंके मनमें जो-जो त्रिगुणात्मक सृष्टिविषयकी अभिलाषा थी, वह स्वभावसे ही अव्यक्तसे उत्पन्न हुई॥ ८९॥ |
| चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकः स्मृतः।<br>सहस्रमूर्धा पुरुषस्तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः॥ ९०<br><br>ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे सङ्क्षिपत्यपि।<br>पुरुषत्वे ह्युदासीनस्तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः॥ ९१<br><br>ब्रह्मा कमलगर्भाभो रुद्रः कालाग्निसन्निभः।<br>पुरुषः पुण्डरीकाक्षो रूपं तत्परमात्मनः॥ ९२ | वे परमेश्वर ही ब्रह्माके रूपमें चार मुखवाले तथा कालके रूपमें संहार करनेवाले कहे गये हैं। वे ही हजार सिरोंवाले पुरुष विष्णु भी हैं। इस प्रकार स्वयम्भू [परमेश्वर]-की तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्माके रूपमें वे लोकोंका सृजन करते हैं, कालके रूपमें उनका संहार भी करते हैं और पुरुषके रूपमें उदासीन रहते हैं; उन प्रजापतिकी तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्मा कमलगर्भकी आभावाले हैं, रुद्र कालाग्निके समान हैं तथा पुरुष [विष्णु] कमलके समान नेत्रवाले हैं—यह उन परमात्माका रूप है॥ ९०-९२॥ |
| एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९३<br><br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९४ | वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकारके शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं। वे महेश्वर अपनी लीलासे अनेक आकृति, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंको धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं॥ ९३-९४॥ |
| त्रिधा यद्वर्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते।<br>चतुर्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः॥ ९५ | वे [परमेश्वर] लोकमें तीन रूपोंमें विद्यमान हैं, इसलिये वे तीन गुणोंवाले कहे जाते हैं और चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण 'चतुर्व्यूह' कहे गये हैं॥ ९५॥ |
| यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम्।<br>यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते॥ ९६ | ये विषयोंको प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव |