भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... ...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
है, इसलिये ये 'आत्मा' कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥
ऋषिः सर्वगतत्वाच्च शरीरी सोऽस्य यत्प्रभुः ।<br>स्वामित्वमस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् ॥ ९७सर्वत्र गमन करनेके कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीरके प्रभु हैं तथा इसपर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करनेके कारण वे विष्णु हैं ॥ ९७ ॥
भगवान् भगवद्भावान्निर्मलत्वाच्छिवः स्मृतः ।<br>परमः सम्प्रकृष्टत्वादवनादोमिति स्मृतः ॥ ९८<br><br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वमयो यतः ।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्यं सम्प्रवर्तते ॥ ९९<br><br>सृजते ग्रसते चैव रक्षते च त्रिभिः स्वयम् ।<br>आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः ॥ १००<br><br>पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः ।<br>देवेषु च महान् देवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥ १०१<br><br>सर्वगत्वाच्च देवानामवश्यत्वाच्च ईश्वरः ।<br>बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भूत उच्यते ॥ १०२<br><br>क्षेत्रज्ञः क्षेत्रविज्ञानादेकत्वात्केवलः स्मृतः ।<br>यस्मात्पुर्यां स शेते च तस्मात्पूरुष उच्यते ॥ १०३<br><br>अनादित्वाच्च पूर्वत्वात्स्वयम्भूरिति संस्मृतः ।<br>याज्यत्वादुच्यते यज्ञः कविर्विक्रान्तदर्शनात् ॥ १०४वे ऐश्वर्यमय भावसे युक्त होनेके कारण 'भगवान्' तथा निर्मल होनेके कारण 'शिव' कहे गये हैं। वे विशिष्ट होनेके कारण 'परम' तथा रक्षा करनेके कारण 'ओम्' कहे गये हैं। वे सब कुछ सम्यक् जाननेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं तथा सर्वमय होनेके कारण 'सर्व' हैं; वे अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका संचालन करते हैं; वे तीन रूपोंसे स्वयं [जगतका] सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९८-९९ १/२ ॥<br><br>वे आदि (प्रारम्भ)-में प्रकट होनेके कारण 'आदिदेव' तथा अजन्मा होनेके कारण 'अज' कहे गये हैं। वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' कहे गये हैं। वे देवताओंमें [सबसे] महान् देवता हैं, इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं। वे सर्वव्यापी होने तथा किसीके वशमें न होनेके कारण देवताओंके भी 'ईश्वर', बृहत् होनेके कारण 'ब्रह्मा' तथा अपने भूतत्व (अस्तित्व)-के कारण 'भूत' कहे जाते हैं। वे क्षेत्रोंका ज्ञान रखनेके कारण 'क्षेत्रज्ञ' तथा एकमात्र होनेके कारण 'केवल' कहे गये हैं। चूँकि वे पुरी (शरीर)-में शयन करते हैं, इसलिये 'पुरुष' कहे जाते हैं। वे अनादि होने तथा [सबसे] पहले होनेके कारण 'स्वयम्भू' कहे गये हैं। वे यजनके योग्य होनेके कारण 'यज्ञ' तथा इन्द्रियोंसे न दिखायी देनेवाली वस्तुओंको भी देखनेके कारण 'कवि' कहे जाते हैं ॥ १००-१०४ ॥
क्रमणः क्रमणीयत्वात्पालकश्चापि पालनात् ।<br>आदित्यसंज्ञः कपिलो ह्यग्रजोऽग्निरिति स्मृतः ॥ १०५वे क्रमणीय (पहुँचनेके योग्य) होनेके कारण 'क्रमण', [सबका] पालन करनेके कारण 'पालक', कपिलवर्ण होनेके कारण 'आदित्य' और सबसे पहले उत्पन्न होनेके कारण 'अग्नि' कहे गये हैं ॥ १०५ ॥
हिरण्यमस्य गर्भोऽभूद्धिरण्मयस्यापि गर्भजः ।<br>तस्माद्धिरण्मयगर्भत्वं पुराणेऽस्मिन्निरुच्यते ॥ १०६हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी हिरण्यमय अण्डसे उत्पन्न हुए, अतः इस पुराणमें उन्हें
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