श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 316, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 316
| ३१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है॥१०६॥ | |
| स्वयम्भुवोऽपि वृत्तस्य कालो विश्वात्मनस्तु यः।<br>न शक्यः परिसंख्यातुमपि वर्षशतैरपि ॥ १०७<br>कालसंख्याविवृत्तस्य परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः।<br>तावच्छेषोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते ॥ १०८ | अतीत विश्वात्मा स्वयम्भूका जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती है। वर्तमान ब्रह्माकी कालसंख्याको परार्ध कहा गया है। उतने ही परिमाणवाला इनका काल [द्वितीय परार्ध] शेष रहता है; उसके अन्तमें जगत्का संहार हो जाता है। कल्पोंके हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ही दूसरे अभी शेष हैं॥१०७-१०८ १/२॥ |
| कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परे तु ये।<br>यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहस्तं निबोधत ॥ १०९<br>प्रथमः साम्प्रतस्तेषां कल्पोऽयं वर्तते द्विजाः।<br>यस्मिन् स्वायम्भुवाद्यास्तु मनवस्ते चतुर्दश ॥ ११०<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्या ये च वै पुनः।<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥ १११<br>पूर्णं युगसहस्त्रं वै परिपाल्या महेश्वरैः।<br>प्रजाभिस्तपसा चैव तेषां शृणुत विस्तरम् ॥ ११२ | जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषयमें सुनिये। हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम [कल्प] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं। बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होनेवाले जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओंद्वारा अपनी तपस्यासे प्रजाओंके साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन पूरे हजार वर्षोंतक किया जाता है; अब उनका विस्तृत वर्णन सुनिये॥१०९-११२॥ |
| मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च।<br>कथितानि भविष्यन्ति कल्पः कल्पेन चैव हि ॥ ११३<br>अतीतानि च कल्पानि सोदर्काणि सहानुवैः।<br>अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ॥ ११४ | [हे ऋषियो!] एक मन्वन्तरके वर्णनसे सभी मन्वन्तरोंका तथा एक कल्पके वर्णनसे दूसरे कल्पका भी वर्णन हो जायगा। अपने वंशके राजाओंके साथ बीते हुए कल्प जिस रूपमें होते हैं, विद्वान्को वैसा ही तर्क (अनुमान) अनागत (भविष्य) कल्पोंके विषयमें भी कर लेना चाहिये॥११३-११४॥ |
| आपो ह्यग्रे समभवन्नष्टे च पृथिवीतले।<br>शान्ततारैकनीरेऽस्मिन् प्राजायत किञ्चन ॥ ११५<br>एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा भवति वै ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ११६<br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥ ११७<br>सत्त्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमुदैक्षत।<br>इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥ ११८<br>आपो नाराश्च सूनव इत्यपां नाम शुश्रुमः।<br>आपूर्य ताभिरयनं कृतवानात्मनो यतः ॥ ११९<br>अप्सु शेते यतस्तस्मात्ततो नारायणः स्मृतः।<br>चतुर्युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः ॥ १२० | पृथ्वीतलके नष्ट हो जानेपर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रोंसे युक्त तथा उस विस्तृत जलमय ब्रह्माण्डमें कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था। उस एकार्णव (प्रलयसागर)-में [समस्त] स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरवाले, हजार सिरवाले तथा स्वर्णिम रंगवाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूपमें प्रकट हुए। उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जलमें सोये हुए थे। पुनः सत्त्वगुणके उद्रेकके कारण जगे हुए उन ब्रह्माने लोकको शून्य देखा। लोग उन नारायणके प्रति इस श्लोकको उदाहृत करते हैं-जलका अर्थ है 'नार' तथा 'सूनु'-हमलोग जलके ये दो नाम सुनते हैं। उस जलसे पूरित करके उन्होंने अपना 'अयन' (निवासस्थान) बनाया और वे जलमें सोते हैं, इसलिये |