श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप… सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव | ३१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| 'नारायण' कहे गये हैं॥ ११५-११९ १/२॥ | |
| शार्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्।<br>ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा समाचरत्॥ १२१<br><br>निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्तु सः।<br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्॥ १२२<br><br>अनुमानादसम्मूढो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>अकरोत्स तनूमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा॥ १२३<br><br>ततो महात्मा भगवान् दिव्यरूपमचिन्तयत्।<br>सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स तु समन्ततः॥ १२४ | हजार चतुर्युगीतक जलमें निवास करनेके पश्चात् रात्रिके अन्तमें उन्होंने सृष्टि करनेके उद्देश्यसे ब्रह्माका रूप धारण किया। ब्रह्माजी वायु होकर उस जलमें विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतुमें रात्रिमें खद्योत विचरण करता है। तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्माने अनुमानपूर्वक पृथ्वीको जलके भीतर गयी हुई जानकर पहलेके कल्पोंमें जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूपको धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ब्रह्मा] उस दिव्य रूपका चिन्तन करने लगे। सभी ओरसे जलसे व्याप्त पृथ्वीको देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार करूँ॥ १२०-१२४ १/२॥ |
| किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं महीमिमाम्।<br>जलक्रीडानुसदृशं वाराहं रूपमाविशत्॥ १२५<br><br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम्॥ १२६<br><br>अद्भिः सञ्छादितां भूमिं स तामाशु प्रजापतिः।<br>उपगम्योज्जहारैनामापश्चापि समाविशत्॥ १२७<br><br>सामुद्रा वै समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च।<br>रसातलतले मग्नां रसातलपुटे गताम्॥ १२८<br><br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्रयाभ्युज्जहार गाम्।<br>ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः॥ १२९<br><br>मुमोच पूर्ववदसौ धारयित्वा धराधरः।<br>तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता॥ १३० | उन्होंने जलक्रीड़ाके अनुरूप, सभी प्राणियोंसे अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन [वाराहरूपधारी] प्रजापतिने जलसे घिरी हुई पृथ्वीके पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्रके जलको समुद्रोंमें तथा नदियोंके जलको नदियोंमें समाविष्ट कर दिया। इस प्रकार उन प्रभुने लोक-कल्याणके लिये रसातलमें गयी हुई तथा समुद्रतलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपने दंष्ट्रापर उठा लिया। इसके बाद उन धरणीधरने पृथ्वीको उसके [मूल] स्थानमें लाकरके पूर्वकी भाँति रखकर छोड़ दिया। वह पृथ्वी उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाकी भाँति स्थित हो गयी और उसीके समान विशाल देह होनेके कारण पृथ्वी [पुनः] डूब न सकी॥ १२५-१३० १/२॥ |
| तत्समा ह्युरुदेहत्वान्न मही याति सम्प्लवम्।<br>तत उत्क्षिप्य तां देवो जगतः स्थापनेच्छया॥ १३१<br><br>पृथिव्याः प्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>पृथिवीं च समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्॥ १३२<br><br>प्राक्सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना।<br>तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भूरि विस्तराः॥ १३३<br><br>शैत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना तेन संहताः।<br>निक्षिप्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन्॥ १३४ | तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले भगवान्ने उसे उठा करके जगत्की स्थापनाकी इच्छासे पृथ्वीका विभाग करनेके लिये मनमें निश्चय किया। उन्होंने पृथ्वीको समतल करके पृथ्वीपर पर्वतोंको संग्रहीत किया। संवर्तक अग्निद्वारा पूर्व सृष्टिके दग्ध कर दिये जानेपर उस समय बहुत विस्तारवाले वे पर्वत उस अग्निसे विशीर्ण हो गये थे। उस एकार्णवमें वायुप्रवाहके द्वारा एकत्रित होकर शीतके कारण वे जहाँ-जहाँ जम |