भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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३१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| तदाचलत्वादचलाः पर्वभिः पर्वताः स्मृताः ।<br>गिरयो हि निगीर्णत्वाच्छयानत्वाच्छिलोच्चयाः ॥ १३५<br><br>ततस्तेषु विकीर्णेषु कोटिशो हि गिरिश्वथ ।<br>विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥ १३६ | गये, वहाँ-वहाँ पर्वत बन गये। वे चलायमान न होनेके कारण 'अचल', पर्वोंसे युक्त होनेके कारण 'पर्वत', निगीर्ण होनेके कारण 'गिरि' तथा [भूमिपर] शयन करनेके कारण 'शिलोच्चय' कहे गये हैं। इस प्रकार [भगवान्] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्पमें उन करोड़ों पर्वतोंके [इधर-उधर] बिखर जानेपर बार-बार उनका विभाग करते हैं॥ १३१—१३६॥ | | ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पुनः सोऽथ व्यकल्पयत् ॥ १३७<br><br>लोकान् प्रकल्पयित्वाथ प्रजासर्गं ससर्ज ह ।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूभगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ १३८<br><br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां कल्पादिषु यथा पुरा ।<br>तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ १३९<br><br>बुद्ध्याश्च समकाले वै प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः ॥ १४०<br><br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ।<br>पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः ॥ १४१<br><br>संवृतस्तमसा चैव बीजाङ्कुरवदावृतः ।<br>बहिरन्तश्चाप्रकाशास्तब्धो निःसंज्ञ एव च ॥ १४२ | तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको, भूः आदि चारों लोकोंको बनाया। इसके बाद लोकोंकी रचना करके उन्होंने प्रजासर्गकी रचना की, विविध प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले स्वयम्भू भगवान् [ब्रह्मा]-ने उसी प्रकारकी सृष्टिकी रचना की, जैसा उन्होंने पहलेके कल्पोंमें किया था। सृष्टिके समय बुद्धिपूर्वक सर्गका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माकी बुद्धिसे तमोमय [अविद्यात्मक] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध—इन नामोंवाला है। इस प्रकार पाँच पर्वोंवाली यह अविद्या उन महात्मासे उत्पन्न हुई। ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्माका वह सर्ग पाँच प्रकारसे अवस्थित हुआ। वह तमसे आवृत, बीजांकुरकी भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतरसे प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ (चेतनाशून्य) था॥ १३७—१४२॥ | | यस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च ।<br>तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ १४३ | उन [पर्वतों]-की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके दुःख तथा क्रिया-कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा (आवृत आत्मावाले) वे नग (पर्वत) प्रथम उत्पन्न (मुख्य) कहे गये हैं॥ १४३॥ | | मुख्यसर्गं तथाभूतं दृष्ट्वा ब्रह्मा ह्यसाधकम् ।<br>अप्रसन्नमनाः सोऽथ ततोऽन्यं सो ह्यमन्यत ॥ १४४<br><br>तस्याभिध्यायताश्चैव तिर्यक्स्रोता ह्यवर्तत ।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४५<br><br>पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ।<br>तस्याभिध्यायतोऽन्यं वै सात्त्विकः समवर्तत ॥ १४६<br><br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु स वै चोर्ध्वं व्यवस्थितः ।<br>यस्मात्प्रवर्तते चोर्ध्वमूर्ध्वस्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४७ | उस प्रकारके प्रथम सर्गको कार्यहेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये। तब वे अन्य सर्गका विचार करने लगे। ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मासे तिर्यक्स्रोत (बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाहवाला)-सर्ग उत्पन्न हुआ। वह [सर्ग] तिर्यक् प्रवृत्तिवाला था, इसलिये उसे तिर्यक्स्रोत कहा गया है। हे द्विजो! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदिके रूपमें प्रसिद्ध हुए। इसके बाद अन्य सर्गका ध्यान करते हुए उन ब्रह्मासे ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्व इन्द्रियप्रवाहवाला) तीसरा सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ; |