श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च संवृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोभवाः स्मृताः ॥ १४८<br><br>ते सत्त्वस्य च योगेन सृष्टाः सत्त्वोद्भवाः स्मृताः।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयो वै देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥ १४९<br><br>प्रकाशाद्बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः।<br>ते ऊर्ध्वस्रोतसो ज्ञेयास्तुष्टात्मानो बुधैः स्मृताः ॥ १५० | वह ऊर्ध्वरूपसे व्यवस्थित था। चूँकि यह ऊर्ध्वभावसे कार्य करता था, अतः यह [सर्ग] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है। वे सुख-प्रीतिकी अधिक प्रवृत्तिवाले, बाहर तथा भीतरसे संवृत और बाहर तथा भीतरसे प्रकाशमय थे, इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। वे सत्त्वगुणके योगसे सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग देवसर्ग कहा गया है। बाहर तथा भीतर प्रकाशसे युक्त रहनेके कारण वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोतके रूपमें ज्ञेय वे लोग विद्वानोंके द्वारा सन्तुष्ट आत्मावाले कहे गये हैं॥ १४८-१५०॥ |
| ऊर्ध्वस्रोतस्सु सृष्टेषु देवेषु वरदः प्रभुः।<br>प्रीतिमानभवद् ब्रह्मा ततोऽन्यं सोऽभ्यमन्यत ॥ १५१<br><br>ससर्ज सर्गमन्यं हि साधकं प्रभुरीश्वरः।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा ॥ १५२<br><br>प्रादुरासीत्तदा व्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः।<br>यस्मादर्वाक् न्यवर्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते ॥ १५३<br><br>ते च प्रकाशबहुलास्तमःपृक्ता रजोऽधिकाः।<br>तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः ॥ १५४<br><br>संवृता बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते।<br>लक्षणैस्तारकाद्यैस्ते ह्यष्टधा तु व्यवस्थिताः ॥ १५५<br><br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वसहधर्मिणः।<br>इत्येष तैजसः सर्गो ह्यर्वाक्स्रोतः प्रकीर्तितः ॥ १५६ | ऊर्ध्वस्रोतवाले देवताओंके सृष्ट हो जानेपर वर प्रदान करनेवाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उसके बाद वे दूसरी सृष्टिका विचार करने लगे। तब प्रभु ब्रह्माने अन्य साधक सर्गका सृजन किया। उस समय ध्यान करते हुए उन सत्यके अभिध्यायी व्यक्त ब्रह्मासे अर्वाक्स्रोत (बाहर तथा भीतरसे इन्द्रियप्रवाहवाला) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ। इस सृष्टिके लोग अर्वाक्रूपसे कार्यमें प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक्स्रोता कहे गये हैं। वे प्रकाशबाहुल्यवाले, तमोगुणसे युक्त तथा रजोगुणकी अधिकतावाले थे, इसलिये वे बहुत दुःखसे युक्त थे तथा बार-बार कर्म करनेवाले थे। बाहर तथा भीतरसे संवृत वे लोग साधक (कार्यसाधनमें तत्पर) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणोंके द्वारा आठ प्रकारसे व्यवस्थित हुए। सिद्ध आत्मावाले वे मनुष्य गन्धर्वोंके समान गुणधर्मवाले थे। इस अर्वाक्स्रोत सृष्टिको ‘तैजस' सर्ग कहा गया है॥ १५१-१५६॥ |
| पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा तु व्यवस्थितः।<br>विपर्ययेण शक्त्या च सिद्ध्या तुष्ट्या तथैव च ॥ १५७<br><br>स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तिः।<br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु ऋषिदेवेषु कृत्स्नशः ॥ १५८<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गो वैकृतोऽनवमः स्मृतः।<br>भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥ १५९ | पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह' है; यह विपर्यय, शक्ति, सिद्धि तथा तुष्टिके द्वारा चार प्रकारसे व्यवस्थित है। स्थावरों (वृक्ष आदि)-में विस्तारके कारण भेद होता है, पशु आदिमें सामर्थ्यसे होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धिसे युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओंमें सम्पूर्ण तुष्टिके द्वारा चतुर्थ भेद होता है। चार प्रकारवाला यह प्राकृत (प्रकृतिनिरूपण विषयवाला) तथा विकारको प्राप्त अनुग्रह [नामक] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है॥ १५७-१५८ १/२॥ |