श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६८ ] ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन [ २९७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रुक्मेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयात्।<br>तैस्तु प्रव्राजितो राजा ज्यामघोऽवसदाश्रमे ॥ ३४<br><br>प्रशान्तः स वनस्थोऽपि ब्राह्मणैरेव बोधितः।<br>जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी ॥ ३५<br><br>नर्मदातीरमेकाकी केवलं भार्यया युतः।<br>ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा त्यक्तमन्यैरुवास सः ॥ ३६ | रहने लगा। उन सबके द्वारा [राज्यसे] हटा दिया गया राजा ज्यामघ आश्रममें निवास करने लगा। ब्राह्मणोंने शान्त होकर वनमें निवास करनेवाले उस ज्यामघको ज्ञान प्रदान किया और ध्वजा तथा रथ धारण करनेवाला वह [अपना] धनुष लेकर दूसरे देशमें चला गया। अन्य लोगोंद्वारा त्यक्त वह ऋक्षवान्-पर्वतपर जाकर अपनी भार्याके साथ नर्मदा नदीके तटपर अकेला निवास करने लगा॥ ३२–३६॥ |
| ज्यामघस्याभवद्भार्या शैब्या शीलवती सती।<br>सा चैव तपसोऽग्रेण शैब्या वै सम्प्रसूयत ॥ ३७<br><br>सुतं विदर्भं सुभगा वयःपरिणता सती।<br>राजपुत्रसुतायां तु विद्वांसौ क्रथकैशिकौ ॥ ३८<br><br>पुत्रौ विदर्भराजस्य शूरौ रणविशारदौ।<br>रोमपादस्तृतीयश्च बभ्रुस्तस्यात्मजः स्मृतः ॥ ३९<br><br>सुधृतिस्तनयस्तस्य विद्वान् परमधार्मिकः।<br>कैशिकस्तनयस्तस्मात्तस्माच्चैद्यान्वयः स्मृतः ॥ ४०<br><br>क्रथो विदर्भस्य सुतः कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>कुन्तेर्वृत्तस्ततो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् ॥ ४१ | ज्यामघकी पत्नी शैब्या शीलसम्पन्न तथा पतिव्रता थी। उस सौभाग्यशालिनी एवं पतिव्रता शैब्याने कठोर तपस्याके द्वारा [अपनी] वृद्धावस्थामें विदर्भ नामक पुत्रको जन्म दिया। राजकुमारीके गर्भसे राजा विदर्भके क्रथ तथा कैशिक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे विद्वान्, पराक्रमी एवं युद्धमें प्रवीण थे। उसका तीसरा पुत्र रोमपाद भी था; उसका पुत्र बभ्रु कहा गया है। उस [बभ्रु]-का पुत्र सुधृति था; वह विद्वान् तथा परम धार्मिक था। उस विदर्भसे जो कैशिक नामक पुत्र था, उसीसे चैद्यवंश कहा गया है। विदर्भका जो पुत्र क्रथ था, उसका पुत्र कुन्ति हुआ। कुन्तिसे वृत उत्पन्न हुआ और उस [वृत]-से प्रतापी रणधृष्ट उत्पन्न हुआ॥ ३७–४१॥ |
| रणधृष्टस्य च सुतो निधृतिः परवीरहा।<br>दशार्हो नैधृतो नाम्ना महारिगणसूदनः ॥ ४२<br><br>दशार्हस्य सुतो व्याप्तो जीमूत इति तत्सुतः।<br>जीमूतपुत्रो विकृतिस्तस्य भीमरथः सुतः ॥ ४३<br><br>अथ भीमरथस्यासीत्पुत्रो नवरथः किल।<br>दानधर्मरतो नित्यं सत्यशीलपरायणः ॥ ४४<br><br>तस्य चासीद् दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।<br>तस्मात्करम्भः सम्भूतो देवरातोऽभवत्ततः ॥ ४५ | रणधृष्टका पुत्र निधृति था; वह शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला था। निधृतिका दशार्ह नामक पुत्र था, जो बड़े-बड़े शत्रुओंका वध करनेवाला था। दशार्हका पुत्र व्याप्त था और उसका पुत्र जीमूत था। जीमूतका पुत्र विकृति था और उस [विकृति]-का पुत्र भीमरथ था। उसके बाद भीमरथके नवरथ [नामक] पुत्र उत्पन्न हुआ; वह सदा दान तथा धर्ममें लगा रहता था और सत्य तथा सदाचारके प्रति परायण था। उसका पुत्र दृढरथ था और उस [दृढरथ]-का पुत्र शकुनि था। उस शकुनिसे करम्भ उत्पन्न हुआ और उस [करम्भ]-से देवरात उत्पन्न हुआ॥ ४२–४५॥ |
| देवरातादभूद्राजा देवरातिर्महायशाः।<br>देवगर्भोपमो जज्ञे यो देवक्षत्रनामकः ॥ ४६<br><br>देवक्षत्रसुतः श्रीमान् मधुर्नाम महायशाः।<br>मधूनां वंशकृद्राजा मधोस्तु कुरुवंशकः ॥ ४७ | देवरातसे देवराति उत्पन्न हुआ; वह महायशस्वी राजा था। उससे देवपुत्रतुल्य देवक्षत्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। देवक्षत्रको मधु नामक पुत्र हुआ; जो ऐश्वर्यशाली, |