भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 298
२९६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतोऽनर्त इत्युत।<br>दुर्जयः कृष्णपुत्रस्तु बभूवामित्रकर्षणः॥ २०<br><br>क्रोष्टोश्च शृणु राजर्षेर्वंशमुत्तमपौरुषम्।<br>यस्यान्वये तु सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः॥ २१<br><br>क्रोष्टोरेकोऽभवत्पुत्रो वृजिनीवान् महायशाः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्स्वाती कुशंकुस्तत्सुतोऽभवत्॥ २२<br><br>अथ प्रसूतिमिच्छन् वै कुशंकुः सुमहाबलः।<br>महाक्रतुभिरीजेऽसौ विविधैराप्तदक्षिणैः॥ २३<br><br>जज्ञे चित्ररथस्तस्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः।<br>अथ चैत्ररथो वीरो यज्वा विपुलदक्षिणः॥ २४<br><br>शशबिन्दुस्तु वै राजा अन्वयाद् व्रतमुत्तमम्।<br>चक्रवर्ती महासत्त्वो महावीर्यो बहुप्रजः॥ २५देश भी 'शूरसेन'—इस नामवाले कहे गये हैं। वीतिहोत्रका पुत्र अनर्त नामसे प्रसिद्ध हुआ। कृष्णका दुर्जय नामक पुत्र हुआ, वह शत्रुओंका दमन करनेवाला था। अब राजर्षि क्रोष्टुके उत्तम पौरुषवाले वंशका श्रवण कीजिये, जिसके कुलमें वृष्णिवंशको चलानेवाले विष्णु (कृष्ण) उत्पन्न हुए। क्रोष्टुका एक ही वृजिनीवान् नामक महायशस्वी पुत्र हुआ। उसका पुत्र स्वाती हुआ और उस [स्वाती]-का पुत्र कुशंकु हुआ। उसके बाद संतानकी इच्छा रखते हुए उन महाबली कुशंकुने अनेक प्रकारके पर्याप्त दक्षिणावाले महायज्ञोंके द्वारा यजन किया। [इसके परिणामस्वरूप] उसका चित्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो [शुभ] कर्मोंसे युक्त था। चित्ररथका पुत्र पराक्रमशाली शशबिन्दु था; उसने विपुल दक्षिणा देकर यज्ञ करके उत्तम तथा पवित्र व्रत आदि किया। [इस प्रकार] वह महाज्ञानी, महापराक्रमी तथा बहुत प्रजाओंवाला चक्रवर्ती राजा हो गया॥ १६–२५॥
शशबिन्दोस्तु पुत्राणां सहस्राणामभूच्छतम्।<br>शंसन्ति तस्य पुत्राणामनन्तकमनुत्तमम्॥ २६<br><br>अनन्तकात्सुतो यज्ञो यज्ञस्य तनयो धृतिः।<br>उशनास्तस्य तनयः सम्प्राप्य तु महीमिमाम्॥ २७<br><br>आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः।<br>स्मृतश्चोशनसः पुत्रः सितेषुर्नार्म पार्थिवः॥ २८<br><br>मरुतस्तस्य तनयो राजर्षिर्वंशवर्धनः।<br>वीरः कम्बलबर्हिंस्तु मरुतस्यात्मजः स्मृतः॥ २९<br><br>पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः।<br>निहत्य रुक्मकवचो वीरान् कवचिनो रणे॥ ३०<br><br>धन्विनो निशितैर्बाणैरवाप श्रियमुत्तमाम्।<br>अश्वमेधे तु धर्मात्मा ऋत्विग्भ्यः पृथिवीं ददौ॥ ३१शशबिन्दुके हजार पुत्र उत्पन्न हुए; लोग उनके पुत्रोंमें अनन्तकको सबसे उत्तम कहते हैं। अनन्तकसे यज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यज्ञका पुत्र धृति हुआ। उस [धृति]-का पुत्र उशना हुआ; उस परम धार्मिकने इस पृथ्वीको प्राप्त करके एक सौ अश्वमेध यज्ञ किया। उशनाका पुत्र सितेषु नामक राजा कहा गया है। उसका पुत्र मरुत था; वह वंशको बढ़ानेवाला राजर्षि हुआ। पराक्रमी कम्बलबर्हि [उस] मरुतका पुत्र बताया गया है। कम्बलबर्हिका पुत्र रुक्मकवच हुआ; वह विद्वान् था। रुक्मकवचने युद्धमें कवच तथा धनुष धारण करनेवाले वीरोंको [अपने] तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर उत्तम श्री प्राप्त कर ली थी। उस धर्मात्माने अश्वमेध-यज्ञमें [यज्ञ करानेवाले] ऋत्विजोंको पृथ्वीका दान किया था॥ २६–३१॥
जज्ञे तु रुक्मकवचात्परावृत्परवीरहा।<br>जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महासत्त्वाः परावृतः॥ ३२<br><br>रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः।<br>परिघं च हरिं चैव विदेहेषु पिता न्यसत्॥ ३३रुक्मकवचसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला परावृत् उत्पन्न हुआ। [उस] परावृत्से पाँच महाशक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुए—रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरि। पिताने परिघ तथा हरिको विदेहदेशोंमें स्थापित किया। रुक्मेषु राजा हुआ और पृथुरुक्म उसके आश्रयमें
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