भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६८ ] ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन २९५

तस्य रामस्तदा त्वासीनमृत्युर्नारायणात्मकः । तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः ॥ १०

कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः । शूरश्च शूरसेनश्च धृष्टः कृष्णस्तथैव च ॥ ११

जयध्वजश्च राजासीदावन्तीनां विशां पतिः । जयध्वजस्य पुत्रोऽभूत्तालजङ्घो महाबलः ॥ १२

शतं पुत्रास्तु तस्येह तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः । तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रोऽभवन्नृपः ॥ १३

वृषप्रभृतयश्चान्ये तत्सुताः पुण्यकर्मणः । वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः ॥ १४

मधोः पुत्रशतं चासीद् वृष्णिस्तस्य तु वंशभाक् । वृष्णेस्तु वृष्णयः सर्वे मधोर्वे माधवाः स्मृताः । यादवा यदुवंशेन निरुच्यन्ते तु हैहयाः ॥ १५

तेषां पञ्चगणा ह्येते हैहयानां महात्मनाम् ॥ १६

वीतिहोत्राश्च हर्य्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा । शूरसेनास्तु विख्यातास्तालजङ्घास्तथैव च ॥ १७

शूरश्च शूरसेनश्च वृषः कृष्णस्तथैव च । जयध्वजः पञ्चमस्तु विख्याता हैहयोत्तमाः ॥ १८

शूरश्च शूरवीरश्च शूरसेनस्य चानघाः । शूरसेना इति ख्याता देशास्तेषां महात्मनाम् ॥ १९


हजार भुजाओंके द्वारा सातों द्वीपोंका श्रेष्ठ स्वामी हो गया था। नारायणस्वरूपवाले परशुराम उस समय उसकी मृत्युका कारण बने। उसके सौ पुत्र थे; उनमेंसे पाँच पुत्र महारथी, अस्त्रोंके ज्ञाता, बलशाली वीर, धर्मात्मा तथा मनस्वी थे। वे शूर, शूरसेन, धृष्ट, कृष्ण तथा जयध्वज [नामवाले] थे। राजा जयध्वज अवन्तीयोंका स्वामी था। जयध्वजको तालजंघ नामक महाबली पुत्र हुआ। उस [तालजंघ]-के सौ पुत्र हुए, जो इस लोकमें 'तालजंघ' नामसे प्रसिद्ध हुए। उनमें ज्येष्ठ [पुत्र] वीतिहोत्र महापराक्रमी राजा हुआ। वृष आदि उसके जो अन्य पुत्र थे, वे पुण्यकर्मवाले थे। उनमें वृष ही वंशको चलानेवाला हुआ। उसका पुत्र मधु हुआ। मधुके सौ पुत्र थे। उस [मधु]-का पुत्र वृष्णि ही वंशप्रवर्तक हुआ। वृष्णिके सभी वंशज 'वृष्णि' तथा मधुके वंशज माधव कहे गये हैं। यदुवंशसे सम्बन्धित यादव हैहय कहे जाते हैं॥ ८–१५॥

उन महात्मा हैहयोंके ये पाँच वंश हैं—वीतिहोत्र, हर्य्यात, भोज, अवन्ति तथा शूरसेन; ये तालजंघ भी कहे गये हैं। शूर, शूरसेन, वृष, कृष्ण एवं पाँचवाँ जयध्वज—ये उत्तम हैहय कहे गये हैं। शूरसेनके वंशज शूर तथा शूरवीर नामवाले थे; हे अनघ [ऋषियो]! उन महात्माओंके