भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 834 में से

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पृष्ठ 296
२९४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| तृष्णाक्षयसुखस्यैतत्कलां नार्हति षोडशीम्।<br>एवमुक्त्वा स राजर्षिः सदारः प्राविशद्वनम्॥ २४<br><br>भृगुतुङ्गे तपस्तप्त्वा तत्रैव च महायशाः।<br>साधयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान्॥ २५<br><br>तस्य वंशास्तु पञ्चैते पुण्या देवर्षिसत्कृताः।<br>यैर्व्याप्ता पृथिवी कृत्स्ना सूर्यस्येव मरीचिभिः॥ २६<br><br>धनी प्रजावानायुष्मान् कीर्तिमांश्च भवेन्नरः।<br>ययातिचरितं पुण्यं पठञ्छृण्वंश्च बुद्धिमान्॥ २७<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते॥ २८ | है, वह तृष्णाके नाशके सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है॥ १५–२३ १/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर वे राजर्षि [ययाति] पत्नीके साथ वनमें चले गये। उन महायशस्वीने वहीं भृगुतुंग शिखरपर निराहार रहकर [महान्] तपस्या करके भार्यासहित स्वर्गको प्राप्त किया। उनके ये पवित्र तथा देवर्षियोंद्वारा सत्कृत पाँच वंश हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे वह सूर्यकी रश्मियोंसे व्याप्त है। ययातिके पुण्यप्रद चरित्रको पढ़ने तथा सुननेवाला मनुष्य धनी, सन्तानयुक्त, आयुष्मान्, कीर्तिशाली एवं बुद्धिमान् हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २४–२८॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशे ययातिचरितं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवंशमें ययातिचरित' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६७॥


अड़सठवाँ अध्याय

ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन

| सूत उवाच<br>यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः।<br>सङ्क्षेपेणानुपूर्व्याच्च गदतो मे निबोधत॥ १<br>यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः।<br>सहस्रजित्सुतो ज्येष्ठो क्रोष्टुर्नीलोऽजको लघुः॥ २<br>सहस्रजित्सुतस्तद्वच्छतजिन्नाम पार्थिवः।<br>सुताः शतजितः ख्यातास्त्रयः परमकीर्तयः॥ ३<br>हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहयश्च यः।<br>हैहयस्य तु दायादो धर्म इत्यभिविश्रुतः॥ ४<br>तस्य पुत्रोऽभवद्विप्रा धर्मनेत्र इति श्रुतः।<br>धर्मनेत्रस्य कीर्तिस्तु सञ्जयस्तस्य चात्मजः॥ ५<br>सञ्जयस्य तु दायादो महिष्मान्नाम धार्मिकः।<br>आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान्॥ ६<br>भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दमो नाम पार्थिवः।<br>दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम विश्रुतः॥ ७<br>धनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकसम्मताः।<br>कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च॥ ८<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत्कार्तवीर्यस्ततोऽर्जुनः।<br>जज्ञे बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरोत्तमः॥ ९ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं [ययातिके] उत्तम तेजवाले ज्येष्ठ पुत्र यदुके वंशका क्रमानुसार संक्षेपमें वर्णन करूँगा; मुझ कहनेवालेसे [आपलोग] सुनें। यदुके देवपुत्रतुल्य पाँच पुत्र हुए; उनमें सहस्रजित् ज्येष्ठ पुत्र था और क्रोष्टु, नील, अजक तथा लघु अन्य पुत्र थे। सहस्रजित्का पुत्र उन्हींके समान था। वह शतजित् नामक राजा हुआ। शतजित्के महाकीर्तिशाली तीन पुत्र कहे गये हैं; वे हैहय, हय तथा राजा वेणुहय नामवाले थे। हैहयका जो पुत्र हुआ, वह धर्म नामसे प्रसिद्ध है। हे विप्रो! उसका धर्मनेत्र [नामके] पुत्र हुआ—ऐसा सुना गया है। धर्मनेत्रका पुत्र कीर्ति था और उस [कीर्ति]-का पुत्र संजय था। संजयका महिष्मान् नामक धार्मिक पुत्र था और महिष्मान्का पुत्र भद्रश्रेण्य था; वह प्रतापशाली था। भद्रश्रेण्यका पुत्र दुर्दम नामक राजा था। दुर्दमका बुद्धिमान् पुत्र धनक नामसे प्रसिद्ध था॥ १–७॥<br><br>धनकके कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा कृतौजा—ये चार लोकमान्य पुत्र उत्पन्न हुए। उन कृतवीर्यसे कार्तवीर्यार्जुन (सहस्रार्जुन) उत्पन्न हुआ; वह [अपनी] |

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