भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ६७] राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा २९३


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम्।<br>व्यभजच्च त्रिधा राज्यं पुत्रेभ्यो नहुषस्तदा॥ १३<br><br>पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तु हर्षनिर्भरमानसः।<br>प्रीतिमानभवद्राजा भारमावेश्य बन्धुषु॥ १४नियोजित कर दिया और उन दोनों द्रुह्यु तथा अनुको [क्रमशः] पश्चिम तथा उत्तर दिशामें नियुक्त कर दिया। नहुषपुत्र ययातिने सात द्वीपोंवाली सागरोंसहित पृथ्वीको जीतकर पुत्रोंमें राज्यको तीन भागोंमें बाँट दिया। इस प्रकार पुत्रोंमें राज्य संक्रमित करनेवाले तथा हर्षपूर्ण मनवाले राजा बन्धुओंपर उनका भार सौंपकर प्रसन्न हो गये॥ १०—१४॥
अत्र गाथा महाराज्ञा पुरा गीता ययातिना।<br>याभिः प्रत्याहरेत्कामान् सर्वतोऽङ्गानि कूर्मवत्॥ १५<br><br>ताभिरेव नरः श्रीमान्नान्यथा कर्मकोटिकृत्।<br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति॥ १६<br><br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।<br>यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः॥ १७<br><br>नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।<br>यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम॥ १८<br><br>कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा।<br>यदा परान्न बिभेति परे चास्मान्न बिभ्यति॥ १९<br><br>यदा न निन्देन्न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा।<br>या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः॥ २०<br><br>योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।<br>जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः॥ २१<br><br>चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका निरुपद्रवा।<br>जीर्यन्ति देहिनः सर्वे स्वभावादेव नान्यथा॥ २२<br><br>जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यते।<br>यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्॥ २३महाराज ययातिके द्वारा इस विषयमें पहले ये गाथाएँ गायी गयी थीं, जिनके द्वारा मनुष्य जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगोंको समेट लेता है, वैसे ही अपनी समस्त कामनाओंको समेट लेता है और उन्हींसे वह श्रीमान् हो जाता है, अन्यथा नहीं; चाहे वह करोड़ों कर्म करनेवाला ही क्यों न हो। कामनाओंके उपभोगसे इच्छा शान्त नहीं होती है; जैसे हविके द्वारा अग्नि बढ़ती है, उसी प्रकार यह निरन्तर बढ़ती ही जाती है। पृथ्वीपर जो भी व्रीहि, जौ, सोना, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब वस्तुएँ [किसी] एकके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं—यह मानकर [मनुष्यको] कामनामुक्त हो जाना चाहिये। जब मनुष्य सभी प्राणियोंके प्रति मन, वचन तथा कर्मसे पापमय भाव नहीं रखता है, तब वह ब्रह्मको प्राप्त होता है। जब वह दूसरेसे डरता नहीं, दूसरे लोग भी उससे नहीं डरते; जब वह [दूसरेकी] निन्दा नहीं करता तथा उससे द्वेष नहीं करता, तब वह ब्रह्मको प्राप्त होता है। जो तृष्णा दुष्ट बुद्धिवालोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे त्यागनेयोग्य है, जो [मनुष्यके] जीर्ण होनेपर भी [स्वयं] जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणका अन्त करनेवाला रोग है; उस तृष्णाका त्याग कर देनेवालेको सुख होता है। जीर्ण व्यक्तिके केश जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण व्यक्तिके दाँत जीर्ण हो जाते हैं और उसके नेत्र तथा कान भी जीर्ण हो जाते हैं; केवल तृष्णा ही [सदा] उपद्रवरहित रहती है अर्थात् यह सदा तरुण बनी रहती है। सभी प्राणी स्वभावतः ही जीर्ण होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है, किंतु [मनुष्यके] जीर्ण हो जानेपर भी जीवनकी आशा एवं धनकी आशा जीर्ण नहीं होती है। संसारमें जो कामसुख है तथा जो स्वर्गका महान् सुख