श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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सड़सठवाँ अध्याय
राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा
| ययातिरुवाच | ययाति बोले—श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा सभी वर्णके लोग मेरा वचन सुनें—'मैं ज्येष्ठ पुत्रको कभी भी राज्य नहीं दूँगा। ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो [पिताके प्रति] विपरीत बुद्धिवाला हो, वह सज्जनोंके द्वारा पुत्र नहीं माना गया है। सज्जन लोग माता-पिताके वचनको माननेवाले पुत्रकी ही प्रशंसा करते हैं। [वास्तवमें] वही पुत्र है, जो माता-पिताके साथ पुत्रभावमें स्थित होकर व्यवहार करता है। यदुने मेरी अवज्ञा की है; उसी प्रकार तुर्वसु, द्रुह्य तथा अनुने भी मेरी बहुत अवहेलना की है। पुरुने मेरे वचनका पालन किया है और विशेषरूपसे मेरा सम्मान किया है। मेरा छोटा पुत्र [पुरु] ही मेरा उत्तराधिकारी है, जिसने मेरे बुढ़ापेको स्वीकार किया। शुक्राचार्यने देवयानीके लिये मुझे जरावस्था प्राप्त होनेकी आज्ञा दी थी। जब मैंने उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने पुनः बुढ़ापेको संचारिणी बना दिया। काव्य तथा उशना नामधारी शुक्रने स्वयं मुझे वर प्रदान किया था कि जो पुत्र आपके अनुकूल व्यवहार करे, वही आपके राज्यका अधिकारी होगा। अतः [हे ब्राह्मणो!] अब आपलोग भी मुझे आज्ञा दें कि यह पुरु राज्यपर अभिषिक्त किया जाय'॥ १–७ १/२ ॥ |
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| ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः।<br>ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथञ्चन॥ १<br>मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः।<br>प्रतिकूलमतिश्चैव न स पुत्रः सतां मतः॥ २<br>मातापित्रोर्वचनकृत्सद्भिः पुत्रः प्रशस्यते।<br>स पुत्रः पुत्रवद्यस्तु वर्तते मातृपितृषु॥ ३<br>यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च।<br>द्रुह्येण चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम्॥ ४<br>पुरुणा च कृतं वाक्यं मानितश्च विशेषतः।<br>कनीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम॥ ५<br>शुक्रेण मे समादिष्टा देवयान्याः कृते जरा।<br>प्रार्थितेन पुनस्तेन जरा सञ्चारिणी कृता॥ ६<br>शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम्।<br>पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स ते राज्यधरस्त्विति॥ ७<br>भवन्तोऽप्यनुजानन्तु पूरू राज्येऽभिषिच्यते। | |
| प्रकृतय ऊचुः | प्रजागण बोले—जो पुत्र गुणसम्पन्न, सर्वदा माता-पिताका हित करनेवाला तथा समस्त कल्याणके योग्य हो, वह छोटा होनेपर भी [राज्यका] उत्तराधिकारी होता है। अतः पुत्र पुरु ही राज्यके योग्य है, जिसने आपके वचनका पालन किया है; शुक्रके वरदानसे विपरीत [कार्य] नहीं किया जा सकता है॥ ८–९ १/२ ॥ |
| यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा॥ ८<br>सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः।<br>अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतो वाक्यकृत्तव॥ ९<br>वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं कर्तुमन्यथा। | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले—इस प्रकार जब प्रसन्न हुए नगरवासियोंने नहुषपुत्र [ययाति]-से कहा, तब उन्होंने अपने पुत्र पुरुको राज्यपर अभिषिक्त करके तुर्वसुको दक्षिण-पूर्व दिशामें रहनेकी आज्ञा प्रदान की। उसके बाद राजा [ययाति]-ने ज्येष्ठ पुत्र यदुको दक्षिण दिशामें |
| एवं जानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा॥ १०<br>अभिषिच्य ततो राज्ये पूरुं स सुतमात्मनः।<br>दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं पुत्रमादिशत्॥ ११<br>दक्षिणायामथो राजा यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्।<br>प्रतीच्यामुत्तरस्यां तु द्रुह्यं चानुं च तावुभौ॥ १२ |