भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६६ ] इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन [ २९१


| तोषितस्तेन विप्रेन्द्रः प्रीतः परमभास्वरम्।<br>सुसङ्गं काञ्चनं दिव्यमक्षये च महेषुधी॥ ६७<br>युक्तं मनोजवैरश्वैर्येन कन्यां समुद्वहन्।<br>स तेन रथमुख्येन षण्मासेनाजयन्महीम्॥ ६८<br>ययातिर्युधि दुर्धर्षो देवदानवमानुषैः।<br>भवभक्तस्तु पुण्यात्मा धर्मनिष्ठः समञ्जसः॥ ६९<br>यज्ञयाजी जितक्रोधः सर्वभूतानुकम्पनः। | हुआ रथ प्रदान किया, जिससे वह कन्याको [अपने घर] लाया था। उसने उस रथसे छः महीनेके भीतर ही [सम्पूर्ण] पृथ्वीको जीत लिया था। ययाति युद्धमें देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अजेय था। वह शिवभक्त, पुण्यात्मा, धर्मनिष्ठ, सामंजस्य रखनेवाला, यज्ञ करनेवाला, क्रोधको जीत लेनेवाला तथा सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला था॥ ६५-६९½॥ | | कौरवाणां च सर्वेषां स भवद्रथ उत्तमः॥ ७०<br>यावन्नरेन्द्रप्रवरः कौरवो जनमेजयः।<br>पूरोर्वंशस्य राज्ञस्तु राज्ञः पारीक्षितस्य तु॥ ७१<br>जगाम स रथो नाशं शापाद् गर्गस्य धीमतः।<br>गर्गस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः॥ ७२<br>अक्रूरं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः।<br>स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्नितस्ततः॥ ७३<br>पौरजानपदैस्त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित्।<br>ततः स दुःखसन्तप्तो न लेभे संविदं क्वचित्॥ ७४<br>जगाम शौनकम्ऋषिं शरण्यं व्यथितस्तदा।<br>इन्द्रेतिनाम विख्यातो योऽसौ मुनिरुदारधीः॥ ७५<br>याजयामास चेन्द्रेतिस्तं नृपं जनमेजयम्।<br>अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमाः॥ ७६ | वह [रथ] सभी कौरवोंका तबतक उत्तम रथ था, जबतक कुरुवंशी महाराज जनमेजय थे। बुद्धिमान् [ऋषि] गर्गके शापके कारण पुरुवंशमें उत्पन्न परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयका वह रथ विनाशको प्राप्त हो गया। उन राजा जनमेजयने गर्गके पुत्र बालक अक्रूरको मार डाला था, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या लग गयी। तब रुधिरकी गन्धवाले वे राजर्षि इधर-उधर भागने लगे। नगरवासियोंने उनका परित्याग कर दिया और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकी। जब दुःखसे संतप्त उनको कहीं भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका, तब वे व्यथित होकर शौनक ऋषिकी शरणमें गये। उदार बुद्धिवाले वे मुनि इन्द्रेति नामसे विख्यात थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! इन्द्रेतिने उन राजा जनमेजयको पवित्र करनेके लिये उनसे अश्वमेधयज्ञका यजन कराया॥ ७०-७६॥ | | स लोहगन्धान्निर्मुक्त एनसा च महायशाः।<br>यज्ञस्यावभृथे मध्ये यातो दिव्यो रथः शुभः॥ ७७<br>तस्माद्द्वांशात्परिभ्रष्टो वसोश्चेदिपतेः पुनः।<br>दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः॥ ७८<br>ततो हत्वा जरासन्धं भीमस्तं रथमुत्तमम्।<br>प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः॥ ७९ | तदनन्तर वे महायशस्वी जनमेजय रुधिरकी गन्धसे तथा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो गये और उस यज्ञके अवभृथस्नानके समय वह दिव्य तथा उत्तम रथ लुप्त हो गया। तदनन्तर इन्द्रने प्रसन्न होकर उस वंशसे परिभ्रष्ट उस रथको चेदिदेशके राजा वसुको दे दिया। पुनः उनसे बृहद्रथने प्राप्त किया। उसके बाद कौरवनन्दन भीमने जरासंधको मारकर वह उत्तम रथ वासुदेवको प्रेमपूर्वक प्रदान कर दिया॥ ७७-७९॥ | | सूत उवाच<br>अभ्यषिञ्चत्पुरुं पुत्रं ययातिर्नाहुषः प्रभुः।<br>कृतोपकारस्तेनैव पुरुणा द्विजसत्तमाः॥ ८०<br>अभिषेक्तुकामं च नृपं पुरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन्॥ ८१<br>कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो।<br>ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य कनीयान्राज्यमर्हति॥ ८२<br>एते सम्बोधयामस्त्वां धर्मं च अनुपालय॥ ८३ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! नहुषके पुत्र ययातिने अपने पुत्र पुरुको [राज्यपर] अभिषिक्त किया था; क्योंकि उस पुरुने उनका उपकार किया था। कनिष्ठ पुत्र पुरुका अभिषेक करनेकी इच्छावाले उन राजासे प्रमुख ब्राह्मणों तथा अन्य नागरिकोने यह वचन कहा था—'हे प्रभो! शुक्राचार्यके नाती तथा देवयानीके पुत्र ज्येष्ठ यदुका अतिक्रमण करके छोटा भाई [पुरु] राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम लोग आपको यह समझा रहे हैं कि आप धर्मका पालन करें'॥ ८०-८३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे इक्ष्वाकुवंशवर्णनं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः॥ ६६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'इक्ष्वाकुवंशवर्णन' नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६६॥