भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृतस्तस्य सुधर्माभूत्पृषितो नाम विश्रुतः।<br>करूषस्य तु कारूषाः सर्वे प्रख्यातकीर्तयः ॥ ५१<br>पृषितो हिंसयित्वा गां गुरोः प्राप सुकल्मषम्।<br>शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्येति विश्रुतः॥ ५२<br>दिष्टपुत्रस्तु नाभागस्तस्मादपि भलन्दनः।<br>भलन्दनस्य विक्रान्तो राजासीदजवाहनः ॥ ५३<br>एते समासतः प्रोक्ता मनुपुत्रा महाभुजाः।<br>इक्ष्वाकोः पुत्रपौत्राद्या ऐलस्याथ वदामि वः ॥ ५४ऋत हुए, जो ऐश्वर्यशाली तथा धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। उनके पुत्र कृत हुए; उनके पुत्र सुधर्मा हुए, जो पृषित नामसे विख्यात हुए। करूषके पुत्र कारूष हुए, वे सब प्रसिद्ध कीर्तिवाले थे। पृषितने [अपने] गुरुकी गायका वध करके महान् पाप किया; वे च्यवनके शापसे शूद्रत्वको प्राप्त हुए थे—यह प्रसिद्ध है। दिष्टके पुत्र नाभाग हुए। उन [नाभाग]-से भलंदन हुए, भलंदनके पुत्र अजवाहन हुए; वे पराक्रमी राजा थे। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें विशाल भुजाओंवाले मनुपुत्रोंका तथा इक्ष्वाकुके पुत्र, पौत्र आदिका वर्णन कर दिया; अब मैं आप लोगोंसे ऐल वंशका वर्णन करता हूँ॥ ४७-५४॥
सूत उवाच<br>ऐलः पुरूरवा नाम रुद्रभक्तः प्रतापवान्।<br>चक्रे त्वकण्टकं राज्यं देशे पुण्यतमे द्विजाः ॥ ५५<br>उत्तरे यमुनातीरे प्रयागे मुनिसेविते।<br>प्रतिष्ठानाधिपः श्रीमान् प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठितः ॥ ५६<br>तस्य पुत्राः सप्त भवन्सर्वे वितततेजसः।<br>गन्धर्वलोकविदिता भवभक्ता महाबलाः ॥ ५७<br>आयुर्मायुरमायुश्च विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।<br>श्रुतायुश्च शतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः ॥ ५८<br>आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।<br>स्वर्भानुतनायायां ते प्रभायां जज्ञिरे नृपाः ॥ ५९<br>नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः ॥ ६०<br>उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः।<br>यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पञ्चमोऽन्धकः ॥ ६१<br>विजातिश्चेति षडिमे सर्वे प्रख्यातकीर्तयः।<br>यतिर्ज्येष्ठश्च तेषां वै ययातिस्तु ततोऽवरः ॥ ६२<br>ज्येष्ठस्तु यतिर्मोक्षार्थी ब्रह्मभूतोऽभवत्प्रभुः।<br>तेषां ययातिः पञ्चानां महाबलपराक्रमः ॥ ६३<br>देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः।<br>शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ६४हे द्विजो! इलाका पुरूरवा नामक पुत्र रुद्रभक्त तथा प्रतापी था। उसने उत्तरमें यमुनाके तटपर मुनियोंके द्वारा सेवित अत्यन्त पवित्र देश प्रयागमें निष्कंटक राज्य किया। प्रतिष्ठानपुरका स्वामी वह पुरूरवा प्रतिष्ठानपुरमें प्रतिष्ठित हुआ। उसके सात पुत्र हुए। वे सब महान् तेजस्वी, गन्धर्वलोकमें प्रसिद्ध, शिवभक्त तथा महाबली थे। आयु, मायू, अमायु, विश्वायु, वीर्यवान्, श्रुतायु, शतायु—ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे। आयुके पाँच महान् ओजवाले तथा वीर पुत्र हुए; स्वर्भानुकी पुत्री प्रभासे वे राजा उत्पन्न हुए थे। उनमें पहला [पुत्र] नहुष था, जो धर्मज्ञ एवं लोकप्रसिद्ध था। नहुषके छः पुत्र हुए। इन्द्रके समान तेजवाले तथा महान् ओजस्वी वे सब पितृकन्या विरजासे उत्पन्न हुए थे। यति, ययाति, संयाति, आयाति, अन्धक, विजाति—ये छः पुत्र थे; सब-के-सब प्रसिद्ध कीर्तिवाले थे। उनमें यति ज्येष्ठ था और ययाति उससे कनिष्ठ था। ज्येष्ठ यति मोक्षका इच्छुक था और वह ब्रह्मस्वरूप हो गया। उन [शेष] पाँचोंमें ययाति महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने उशना (शुक्राचार्य)-की पुत्री देवयानीको और वृषपर्वाकी पुत्री आसुरी शर्मिष्ठाको भार्यारूपमें प्राप्त किया था॥ ५५-६४॥
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।<br>तावुभौ शुभकर्माणौ स्तुतौ विद्याविशारदौ ॥ ६५<br>द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ययातये रथं तस्मै ददौ शुक्रः प्रतापवान् ॥ ६६देवयानीने यदु और तुर्वसुको उत्पन्न किया; वे दोनों ही उत्तम कर्मवाले, प्रशंसनीय तथा विद्यामें प्रवीण थे। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्य, अनु एवं पूरुको जन्म दिया। उन ययातिके द्वारा सन्तुष्ट किये गये प्रतापी विप्रेन्द्र शुक्रने प्रसन्न होकर उन ययातिको दो अक्षय महान् तरकस और अत्यन्त चमकीला, सुन्दरतापूर्वक निर्मित, स्वर्णमय, दिव्य तथा मनके समान वेगवाले घोड़ोंसे जुता