भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| अध्याय ६६ ] | इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन | २८९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अजः पुत्रो रघोश्चापि तस्माज्जज्ञे च वीर्यवान्।<br>राजा दशरथस्तस्माच्छ्रीमानिक्ष्वाकुवंशकृत् ॥ ३४<br>रामो दशरथाद्वीरो धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलः॥ ३५हुए तथा उनसे रघु उत्पन्न हुए। उन रघुसे अज नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उन [अज]-से पराक्रमी दशरथ उत्पन्न हुए। उन दशरथसे ऐश्वर्यशाली, इक्ष्वाकुवंशको बढ़ानेवाले, वीर, धर्मज्ञ तथा लोकप्रसिद्ध राम और लक्ष्मण, भरत तथा महाबली शत्रुघ्न उत्पन्न हुए॥ २३—३५॥
तेषां श्रेष्ठो महातेजा रामः परमवीर्यवान्।<br>रावणं समरे हत्वा यज्ञैरिष्ट्वा च धर्मवित्॥ ३६<br>दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यं चकार सः।<br>रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः ॥ ३७<br>लवश्च सुमहाभागः सत्यवानभवत्सुधीः।<br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ॥ ३८<br>नलस्तु निषधाज्जातो नभस्तस्मादजायत।<br>नभसः पुण्डरीकाख्यः क्षेमधन्वा ततः स्मृतः ॥ ३९<br>तस्य पुत्रोऽभवद्वीरो देवानीकः प्रतापवान्।<br>अहीनरः सुतस्तस्य सहस्त्राश्वस्ततः परः ॥ ४०<br>शुभ्रश्चन्द्रावलोकश्च तारापीडस्ततोऽभवत्।<br>तस्यात्मजश्चन्द्रगिरिर्भानुचन्द्रस्ततोऽभवत् ॥ ४१<br>श्रुतायुरभवत्तस्माद् बृहद्बल इति स्मृतः।<br>भारते यो महातेजा सौभद्रेण निपातितः ॥ ४२<br>एते इक्ष्वाकुदायादा राजानः प्रायशः स्मृताः।<br>वंशे प्रधाना एतस्मिन् प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ॥ ४३<br>सर्वे पाशुपते ज्ञानमधीत्य परमेश्वरम्।<br>समभ्यर्च्य यथाज्ञानमिष्ट्वा यज्ञैर्यथाविधि ॥ ४४<br>दिवं गता महात्मानः केचिन्मुक्तात्मयोगिनः।<br>नृगो ब्राह्मणशापेन कृकलासत्वमागतः॥ ४५उनमें राम श्रेष्ठ, महातेजस्वी तथा महान् ओजस्वी थे। उन धर्मज्ञ रामने युद्धमें रावणका वध करके तथा यज्ञोंके द्वारा यजन करके दस हजार वर्षोंतक राज्य किया था। रामके कुश नामसे एक प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुए और दूसरे लव उत्पन्न हुए, जो परम भाग्यशाली, सत्यनिष्ठ और सद्बुद्धिवाले थे। कुशसे अतिथि उत्पन्न हुए। उन [अतिथि]-के पुत्र निषध थे। निषधसे नल उत्पन्न हुए और उन [नल]-से नभ उत्पन्न हुए। नभसे पुण्डरीक नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उनसे क्षेमधन्वा उत्पन्न कहे गये हैं। उनके देवानीक नामक वीर तथा प्रतापी पुत्र हुए। उनके पुत्र अहीनर थे तथा उनके पुत्र सहस्राश्व थे। उनसे कल्याणमय चन्द्रावलोक हुए और फिर उनसे तारापीड हुए। उन [तारापीड]-के पुत्र चन्द्रगिरि हुए और उनसे भानुचन्द्र हुए। उनसे श्रुतायु उत्पन्न हुए, उन्हें बृहद्बल कहा गया है, जिन महा-तेजस्वीको महाभारतके युद्धमें सुभद्रापुत्र [अभिमन्यु]-ने मार डाला था। ये सब प्रायः इक्ष्वाकुवंशके उत्तराधिकारी राजा कहे गये हैं। इस वंशके प्रधान राजाओंका वर्णन मुख्यरूपसे कर दिया गया। ये सब शिवका ज्ञान प्राप्त करके परमेश्वरका अर्चनकर अपने ज्ञानके अनुसार विधिपूर्वक यज्ञोंके द्वारा यजन करके स्वर्ग चले गये; इनमें कुछ महात्मा तथा मुक्त आत्मावाले योगी हुए। [राजा] नृग एक ब्राह्मणके शापसे गिरगिटकी योनिको प्राप्त हो गये थे॥ ३६—४५॥
धृष्टस्य धृष्टकेतुश्च यमबालश्च वीर्यवान्।<br>रणधृष्टस्य ते पुत्रास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ ४६धृष्टके तीन पुत्र थे—धृष्टकेतु, यमबाल तथा पराक्रमी रणधृष्ट; वे सब परम धार्मिक थे॥ ४६॥
आनर्तो नाम शर्यातेः सुकन्या नाम दारिका।<br>आनर्तस्याभवत्पुत्रो रोचमानः प्रतापवान् ॥ ४७<br>रोचमानस्य रेवोऽभूद्रेवाद्रैवत एव च।<br>ककुद्मी चापरो ज्येष्ठपुत्रः पुत्रशतस्य तु॥ ४८<br>रेवती यस्य सा कन्या पत्नी रामस्य विश्रुता।<br>नरिष्यन्तस्य पुत्रोऽभूज्जितात्मा तु महाबली ॥ ४९<br>नाभागादम्बरीषस्तु विष्णुभक्तः प्रतापवान्।<br>ऋतस्तस्य सुतः श्रीमान् सर्वधर्मविदां वरः ॥ ५०शर्यातिके आनर्त नामक पुत्र हुए और सुकन्या नामक पुत्री हुई। आनर्तके प्रतापशाली पुत्र रोचमान उत्पन्न हुए। रोचमानके पुत्र रेव हुए और रेवसे रैवत हुए जो ककुद्मी इस दूसरे नामसे भी प्रसिद्ध थे, वे सौ पुत्रोंवाले रेवके ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनकी कन्या रेवती थी; वह राम (बलराम)-की पत्नी कही गयी है। नरिष्यन्तके एक जितात्मा तथा महाबली पुत्र था। नाभागसे अम्बरीष हुए, वे विष्णुके भक्त एवं प्रतापशाली थे। उनके पुत्र