भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२८८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अगृह्णाद्वंशकर्तारं प्रभागृह्णात्सुतान् बहून्।<br>एकं भानुमतिः पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्॥ १७<br>ततः षष्टिसहस्राणि सुषुवे सा तु वै प्रभा।<br>खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुहुङ्कारमार्गणैः॥ १८साठ हजार तथा दूसरीने वंशको बढ़ानेवाले एक पुत्रको माँगा था। प्रभाने बहुत पुत्रोंको प्राप्त किया और भानुमतीने असमंजस नामक एक पुत्रको प्राप्त किया। उसके बाद प्रभाने जिन साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया था, वे पृथ्वीको खोदते हुए कपिलरूप विष्णुके हुंकाररूपी बाणोंसे दग्ध हो गये॥ १५-१८॥
असमञ्जस्य तनयः सोऽंशुमान्नाम विश्रुतः।<br>तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः॥ १९<br>येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता।<br>भगीरथसुतश्चापि श्रुतो नाम बभूव ह॥ २०<br>नाभागस्तस्य दायादो भवभक्तः प्रतापवान्।<br>अम्बरीषः सुतस्तस्य सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत्॥ २१<br>नाभागेनाम्बरीषेण भुजाभ्यां परिपालिता।<br>बभूव वसुधात्यर्थं तापत्रयविवर्जिता॥ २२असमंजसके पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुए। उन [अंशुमान्]-के पुत्र दिलीप थे और दिलीपसे भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके भागीरथी गंगाका अवतरण कराया। भगीरथके श्रुत नामक पुत्र हुए। उन [श्रुत]-के पुत्र नाभाग हुए, जो शिवभक्त तथा प्रतापशाली थे। उन [नाभाग]-के अम्बरीष नामक पुत्र हुए। उन [अम्बरीष]-से सिन्धुद्वीप उत्पन्न हुए। नाभागपुत्र अम्बरीषके द्वारा भुजाओंसे भली-भाँति पालित की गयी पृथ्वी [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंसे पूर्णरूपसे विहीन हो गयी थी॥ १९-२२॥
अयुतायुः सुतस्तस्य सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान्।<br>पुत्रोऽयुतायुषो धीमानृतुपर्णो महायशाः॥ २३<br>दिव्याक्षहृदयज्ञो वै राजा नलसखो बली।<br>नलौ द्वावेव विख्यातौ पुराणेषु दृढव्रतौ॥ २४<br>वीरसेनसुतश्चान्यो यश्चेक्ष्वाकुकुलोद्भवः।<br>ऋतुपर्णस्य पुत्रोऽभूत्सार्वभौमः प्रजेश्वरः॥ २५<br>सुदासस्तस्य तनयो राजा त्विन्द्रसमोऽभवत्।<br>सुदासस्य सुतः प्रोक्तः सौदासो नाम पार्थिवः॥ २६<br>ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहश्च सः।<br>वसिष्ठस्तु महातेजाः क्षेत्रे कल्माषपादके॥ २७<br>अश्मकं जनयामास इक्ष्वाकुकुलवर्धनम्।<br>अश्मकस्योत्तरायां तु मूलकस्तु सुतोऽभवत्॥ २८<br>स हि रामभयाद्राजा स्त्रीभिः परिवृतो वने।<br>बिभर्ति त्राणमिच्छन् वै नारीकवचमुत्तमम्॥ २९<br>मूलकस्यापि धर्मात्मा राजा शतरथः सुतः।<br>तस्माच्छतरथाज्जज्ञे राजा त्विलविलो बली॥ ३०<br>आसीच्चैलविलिः श्रीमान् वृद्धशर्मा प्रतापवान्।<br>पुत्रो विश्वसहस्तस्य पितृकन्या व्यजीजनत्॥ ३१<br>दिलीपस्तस्य पुत्रोऽभूत्खट्वाङ्ग इति विश्रुतः।<br>येन स्वर्गादिहागत्य मुहूर्तं प्राप्य जीवितम्॥ ३२<br>त्रयोऽग्नयस्त्रयो लोका बुद्ध्या सत्येन वै जिताः।<br>दीर्घबाहुः सुतस्तस्य रघुस्तस्मादजायत॥ ३३उन सिन्धुद्वीपके अयुतायु नामक पराक्रमी पुत्र हुए। अयुतायुके ऋतुपर्ण नामक पुत्र हुए; वे बुद्धिमान् तथा महायशस्वी थे। वे बलवान् राजा [ऋतुपर्ण] नलके सखा और दिव्य द्यूतक्रीड़ाके मर्मज्ञ थे। पुराणोंमें दृढ़व्रतवाले दो नल प्रसिद्ध हैं। एक तो वीरसेनका पुत्र था और दूसरा इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुआ था, ऋतुपर्णके पुत्र राजा सार्वभौम हुए और उनके पुत्र सुदास हुए, वे इन्द्रके समान थे। सुदासके पुत्र राजा सौदास कहे गये हैं। उनका नाम मित्रसह था, किंतु वे कल्माषपाद नामसे प्रसिद्ध हुए। महातेजस्वी वसिष्ठने कल्माषपादके क्षेत्रमें इक्ष्वाकुकुलकी वृद्धि करनेवाले अश्मकको उत्पन्न किया। उत्तराके गर्भसे अश्मकके मूलक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। वे परशुरामके भयसे स्त्रियोंसे घिरे रहते थे और वनमें अपनी रक्षाकी इच्छा करते हुए उत्तम नारीकवच धारण किये रहते थे। मूलकके शतरथ नामक पुत्र हुए, वे धर्मात्मा राजा थे। उन शतरथसे बलशाली राजा इलविल उत्पन्न हुए। इलविलके पुत्र वृद्धशर्मा थे, जो ऐश्वर्यसम्पन्न तथा प्रतापशाली थे। उनके पुत्र विश्वसह थे, जिन्हें पितृकन्याने जन्म दिया था। उनके पुत्र दिलीप हुए; वे खट्वांग नामसे प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने एक मुहूर्तका जीवन प्राप्त करके स्वर्गसे इस लोकमें आकर [अपनी] बुद्धि एवं सत्यके द्वारा तीनों अग्नियों तथा तीनों लोकोंको जीत लिया था। उनके पुत्र दीर्घबाहु