भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ६६] इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन २८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पिताने उससे कहा—'तुम चाण्डालोंके साथ रहो'॥ ५॥
इत्युक्तः स विचक्राम नगराद्वचनात्पितुः।<br>स तु सत्यव्रतो धीमाञ्छ्वपाकावसथान्तिके ॥ ६<br>पित्रा त्यक्तोऽवसद्वीरः पिता चास्य वनं ययौ।<br>सर्वलोकेषु विख्यातस्त्रिशङ्कुरिति वीर्यवान् ॥ ७<br>वसिष्ठकोपात्पुण्यात्मा राजा सत्यव्रतः पुरा।<br>विश्वामित्रो महातेजा वरं दत्त्वा त्रिशङ्कवे ॥ ८<br>राज्येऽभिषिच्य तं पित्र्ये याजयामास तं मुनिः।<br>मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः ॥ ९<br>सशरीरं तदा तं वै दिवमारोपयद्विभुः।इस प्रकार कहा गया वह [सत्यव्रत] पिताके आदेशसे नगरसे निकल गया और पिताके द्वारा त्यक्त वह बुद्धिमान् सत्यव्रत चाण्डालोंके निवासस्थानके समीप रहने लगा और उसके पिता वनमें चले गये। पूर्वकालमें वसिष्ठके कोपके कारण वह पुण्यात्मा राजा सत्यव्रत सभी लोकोंमें पराक्रमी त्रिशंकु—इस नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद महातेजस्वी मुनि विश्वामित्रने त्रिशंकुको वर प्रदानकर उसे पिताके राज्यपर अभिषिक्त करके उससे यज्ञ कराया था। देवताओं तथा वसिष्ठके निषेध करनेपर भी ऐश्वर्यशाली विश्वामित्रने उसे सशरीर स्वर्ग भेज दिया था॥ ६—९ १/२॥
तस्य सत्यव्रता नाम भार्या कैकयवंशजा ॥ १०<br>कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम्।<br>हरिश्चन्द्रस्य च सुतो रोहितो नाम वीर्यवान् ॥ ११<br>हरितो रोहितस्याथ धुन्धुर्हारित उच्यते।<br>विजयश्च सुतेजाश्च धुन्धुपुत्रौ बभूवतुः ॥ १२<br>जेता क्षत्रस्य सर्वत्र विजयस्तेन स स्मृतः।<br>रुचकस्तस्य तनयो राजा परमधार्मिकः ॥ १३<br>रुचकस्य वृकः पुत्रस्तस्माद् बाहुश्च जज्ञिवान्।<br>सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद्राजा परमधार्मिकः ॥ १४कैकयवंशमें उत्पन्न उसकी सत्यव्रता नामक भार्याने निष्पाप हरिश्चन्द्र नामक पुत्रको जन्म दिया। हरिश्चन्द्रका रोहित नामक पराक्रमी पुत्र था। रोहितका पुत्र हरित था। हरितका पुत्र धुंधु कहा जाता है। धुंधुके दो पुत्र हुए—विजय और सुतेज। उस [विजय]-ने समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था, अतः उसे विजय कहा गया है। उसका पुत्र रुचक महान् धार्मिक राजा था। रुचकका पुत्र वृक था। उस [वृक]-से बाहु उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र सगर हुआ; वह परम धार्मिक राजा था॥ १०—१४॥
द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा।<br>ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वोऽग्निः पुत्रकाम्यया ॥ १५<br>और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद्यथेष्टं वरमुत्तमम्।<br>एका षष्टिसहस्राणि सुतमेकं परा तथा ॥ १६सगरकी भी प्रभा तथा भानुमती [नामक] दो भार्याएँ थीं। उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे अग्निसदृश और्व ऋषिकी आराधना की थी; और्वने प्रसन्न होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान किया। उनमेंसे एक [रानी]-ने