श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| यथाप्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया।<br>भक्तिमेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः ॥ १६९<br><br>ततो ह्यनुज्ञां प्राप्यैवं स्तुतो भक्तिमतां गतिः।<br>तस्माल्लब्ध्वा स्तवं शम्भोर्नृपस्त्रैलोक्यविश्रुतः ॥ १७०<br><br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य महायशाः।<br>गणाधिपत्यं सम्प्राप्तस्तण्डिनस्तेजसा प्रभोः ॥ १७१ | इन नामोंकी प्रधानताके अनुसार मैंने भक्तिपूर्वक समाहितचित्त होकर भगवान् यज्ञपति विभु शिवकी स्तुति की। इस प्रकार उनसे आज्ञा पाकर मैंने भक्तोंकी गतिस्वरूप शिवकी स्तुति की। उन तण्डीसे शिवजीका स्तोत्र प्राप्त करके तीनों लोकोंमें विख्यात तथा महायशस्वी राजा [त्रिधन्वा]-ने हजार अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्तकर प्रभु तण्डीके तेजसे गणाधिपपद प्राप्त किया ॥ १६९-१७१ ॥ | | यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद् ब्राह्मणानपि।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति वै द्विजाः ॥ १७२<br><br>ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः।<br>शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ १७३<br><br>मातृहा पितृहा चैव वीरहा भ्रूणहा तथा।<br>संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा त्रिसन्ध्यं शङ्कराश्रमे ॥ १७४<br><br>देवमिष्ट्वा त्रिसन्ध्यं च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १७५ | हे द्विजो! जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह हजार अश्वमेधयज्ञका फल अवश्य प्राप्त करता है। ब्राह्मणका वध करनेवाला, सुरापान करनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला, शरणमें आये हुएका वध करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, माता-पिताका वध करनेवाला, वीर-हत्या करनेवाला तथा भ्रूणहत्या करनेवाला भी शिवमन्दिरमें वर्षपर्यन्त तीनों सन्ध्याकालोंमें क्रमसे [इन नामोंका] जप करके एवं तीनों सन्ध्याकालोंमें देव [शिव]-का पूजन करके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७२-१७५ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे रुद्रसहस्रनामकथनं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'रुद्रसहस्रनामकथन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन
| सूत उवाच | |
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| त्रिधन्वा देवदेवस्य प्रसादात्तण्डिनस्तथा।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य प्रयत्नतः ॥ १<br><br>गाणपत्यं दृढं प्राप्तः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>आसीत्त्रिधन्वनश्चापि विद्वांस्त्रय्यारुणो नृपः ॥ २<br><br>तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः।<br>तेन भार्या विदर्भस्य हृता हत्वामितौजसम् ॥ ३<br><br>पाणिग्रहणमन्त्रेषु निष्ठामप्रापितेष्विह।<br>तेनाधर्मेण संयुक्तं राजा त्रय्यारुणोऽत्यजत् ॥ ४ | सूतजी बोले—[हे द्विजो!] त्रिधन्वाने देवदेव तण्डीकी कृपासे प्रयत्नपूर्वक हजार अश्वमेधयज्ञोंका फल प्राप्त करके सभी देवताओंसे नमस्कृत होकर महान् गणाधिपपद प्राप्त कर लिया। उन त्रिधन्वाके पुत्र विद्वान् राजा त्रय्यारुण थे। उन [त्रय्यारुण]-का सत्यव्रत नामक महाबली पुत्र हुआ। उसने अमित तेजवाले विदर्भ देशके राजाको मारकर पाणिग्रहणके मन्त्रोंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसकी पत्नीका हरण कर लिया। तब राजा त्रय्यारुणने उस अधर्मसे युक्त [अपने] पुत्रका त्याग कर दिया ॥ १-४ ॥ |
| पितरं सोऽब्रवीत्त्यक्तः क्व गच्छामीति वै द्विजाः।<br>पिता त्वेनमथोवाच श्वपाकैः सह वर्तय ॥ ५ | हे द्विजो! तत्पश्चात् [पिताके द्वारा] त्यक्त उस [सत्यव्रत]-ने पितासे कहा—'मैं कहाँ जाऊँ?' तब |