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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
२९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृतस्तस्य सुधर्माभूत्पृषितो नाम विश्रुतः।<br>करूषस्य तु कारूषाः सर्वे प्रख्यातकीर्तयः ॥ ५१<br>पृषितो हिंसयित्वा गां गुरोः प्राप सुकल्मषम्।<br>शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्येति विश्रुतः॥ ५२<br>दिष्टपुत्रस्तु नाभागस्तस्मादपि भलन्दनः।<br>भलन्दनस्य विक्रान्तो राजासीदजवाहनः ॥ ५३<br>एते समासतः प्रोक्ता मनुपुत्रा महाभुजाः।<br>इक्ष्वाकोः पुत्रपौत्राद्या ऐलस्याथ वदामि वः ॥ ५४ऋत हुए, जो ऐश्वर्यशाली तथा धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। उनके पुत्र कृत हुए; उनके पुत्र सुधर्मा हुए, जो पृषित नामसे विख्यात हुए। करूषके पुत्र कारूष हुए, वे सब प्रसिद्ध कीर्तिवाले थे। पृषितने [अपने] गुरुकी गायका वध करके महान् पाप किया; वे च्यवनके शापसे शूद्रत्वको प्राप्त हुए थे—यह प्रसिद्ध है। दिष्टके पुत्र नाभाग हुए। उन [नाभाग]-से भलंदन हुए, भलंदनके पुत्र अजवाहन हुए; वे पराक्रमी राजा थे। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें विशाल भुजाओंवाले मनुपुत्रोंका तथा इक्ष्वाकुके पुत्र, पौत्र आदिका वर्णन कर दिया; अब मैं आप लोगोंसे ऐल वंशका वर्णन करता हूँ॥ ४७-५४॥
सूत उवाच<br>ऐलः पुरूरवा नाम रुद्रभक्तः प्रतापवान्।<br>चक्रे त्वकण्टकं राज्यं देशे पुण्यतमे द्विजाः ॥ ५५<br>उत्तरे यमुनातीरे प्रयागे मुनिसेविते।<br>प्रतिष्ठानाधिपः श्रीमान् प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठितः ॥ ५६<br>तस्य पुत्राः सप्त भवन्सर्वे वितततेजसः।<br>गन्धर्वलोकविदिता भवभक्ता महाबलाः ॥ ५७<br>आयुर्मायुरमायुश्च विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।<br>श्रुतायुश्च शतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः ॥ ५८<br>आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।<br>स्वर्भानुतनायायां ते प्रभायां जज्ञिरे नृपाः ॥ ५९<br>नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः ॥ ६०<br>उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः।<br>यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पञ्चमोऽन्धकः ॥ ६१<br>विजातिश्चेति षडिमे सर्वे प्रख्यातकीर्तयः।<br>यतिर्ज्येष्ठश्च तेषां वै ययातिस्तु ततोऽवरः ॥ ६२<br>ज्येष्ठस्तु यतिर्मोक्षार्थी ब्रह्मभूतोऽभवत्प्रभुः।<br>तेषां ययातिः पञ्चानां महाबलपराक्रमः ॥ ६३<br>देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः।<br>शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ६४हे द्विजो! इलाका पुरूरवा नामक पुत्र रुद्रभक्त तथा प्रतापी था। उसने उत्तरमें यमुनाके तटपर मुनियोंके द्वारा सेवित अत्यन्त पवित्र देश प्रयागमें निष्कंटक राज्य किया। प्रतिष्ठानपुरका स्वामी वह पुरूरवा प्रतिष्ठानपुरमें प्रतिष्ठित हुआ। उसके सात पुत्र हुए। वे सब महान् तेजस्वी, गन्धर्वलोकमें प्रसिद्ध, शिवभक्त तथा महाबली थे। आयु, मायू, अमायु, विश्वायु, वीर्यवान्, श्रुतायु, शतायु—ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे। आयुके पाँच महान् ओजवाले तथा वीर पुत्र हुए; स्वर्भानुकी पुत्री प्रभासे वे राजा उत्पन्न हुए थे। उनमें पहला [पुत्र] नहुष था, जो धर्मज्ञ एवं लोकप्रसिद्ध था। नहुषके छः पुत्र हुए। इन्द्रके समान तेजवाले तथा महान् ओजस्वी वे सब पितृकन्या विरजासे उत्पन्न हुए थे। यति, ययाति, संयाति, आयाति, अन्धक, विजाति—ये छः पुत्र थे; सब-के-सब प्रसिद्ध कीर्तिवाले थे। उनमें यति ज्येष्ठ था और ययाति उससे कनिष्ठ था। ज्येष्ठ यति मोक्षका इच्छुक था और वह ब्रह्मस्वरूप हो गया। उन [शेष] पाँचोंमें ययाति महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने उशना (शुक्राचार्य)-की पुत्री देवयानीको और वृषपर्वाकी पुत्री आसुरी शर्मिष्ठाको भार्यारूपमें प्राप्त किया था॥ ५५-६४॥
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।<br>तावुभौ शुभकर्माणौ स्तुतौ विद्याविशारदौ ॥ ६५<br>द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ययातये रथं तस्मै ददौ शुक्रः प्रतापवान् ॥ ६६देवयानीने यदु और तुर्वसुको उत्पन्न किया; वे दोनों ही उत्तम कर्मवाले, प्रशंसनीय तथा विद्यामें प्रवीण थे। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्य, अनु एवं पूरुको जन्म दिया। उन ययातिके द्वारा सन्तुष्ट किये गये प्रतापी विप्रेन्द्र शुक्रने प्रसन्न होकर उन ययातिको दो अक्षय महान् तरकस और अत्यन्त चमकीला, सुन्दरतापूर्वक निर्मित, स्वर्णमय, दिव्य तथा मनके समान वेगवाले घोड़ोंसे जुता

अध्याय ६६ ] इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी कथा तथा ययातिवंश-वर्णन [ २९१


| तोषितस्तेन विप्रेन्द्रः प्रीतः परमभास्वरम्।<br>सुसङ्गं काञ्चनं दिव्यमक्षये च महेषुधी॥ ६७<br>युक्तं मनोजवैरश्वैर्येन कन्यां समुद्वहन्।<br>स तेन रथमुख्येन षण्मासेनाजयन्महीम्॥ ६८<br>ययातिर्युधि दुर्धर्षो देवदानवमानुषैः।<br>भवभक्तस्तु पुण्यात्मा धर्मनिष्ठः समञ्जसः॥ ६९<br>यज्ञयाजी जितक्रोधः सर्वभूतानुकम्पनः। | हुआ रथ प्रदान किया, जिससे वह कन्याको [अपने घर] लाया था। उसने उस रथसे छः महीनेके भीतर ही [सम्पूर्ण] पृथ्वीको जीत लिया था। ययाति युद्धमें देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अजेय था। वह शिवभक्त, पुण्यात्मा, धर्मनिष्ठ, सामंजस्य रखनेवाला, यज्ञ करनेवाला, क्रोधको जीत लेनेवाला तथा सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला था॥ ६५-६९½॥ | | कौरवाणां च सर्वेषां स भवद्रथ उत्तमः॥ ७०<br>यावन्नरेन्द्रप्रवरः कौरवो जनमेजयः।<br>पूरोर्वंशस्य राज्ञस्तु राज्ञः पारीक्षितस्य तु॥ ७१<br>जगाम स रथो नाशं शापाद् गर्गस्य धीमतः।<br>गर्गस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः॥ ७२<br>अक्रूरं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः।<br>स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्नितस्ततः॥ ७३<br>पौरजानपदैस्त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित्।<br>ततः स दुःखसन्तप्तो न लेभे संविदं क्वचित्॥ ७४<br>जगाम शौनकम्ऋषिं शरण्यं व्यथितस्तदा।<br>इन्द्रेतिनाम विख्यातो योऽसौ मुनिरुदारधीः॥ ७५<br>याजयामास चेन्द्रेतिस्तं नृपं जनमेजयम्।<br>अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमाः॥ ७६ | वह [रथ] सभी कौरवोंका तबतक उत्तम रथ था, जबतक कुरुवंशी महाराज जनमेजय थे। बुद्धिमान् [ऋषि] गर्गके शापके कारण पुरुवंशमें उत्पन्न परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयका वह रथ विनाशको प्राप्त हो गया। उन राजा जनमेजयने गर्गके पुत्र बालक अक्रूरको मार डाला था, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या लग गयी। तब रुधिरकी गन्धवाले वे राजर्षि इधर-उधर भागने लगे। नगरवासियोंने उनका परित्याग कर दिया और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकी। जब दुःखसे संतप्त उनको कहीं भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका, तब वे व्यथित होकर शौनक ऋषिकी शरणमें गये। उदार बुद्धिवाले वे मुनि इन्द्रेति नामसे विख्यात थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! इन्द्रेतिने उन राजा जनमेजयको पवित्र करनेके लिये उनसे अश्वमेधयज्ञका यजन कराया॥ ७०-७६॥ | | स लोहगन्धान्निर्मुक्त एनसा च महायशाः।<br>यज्ञस्यावभृथे मध्ये यातो दिव्यो रथः शुभः॥ ७७<br>तस्माद्द्वांशात्परिभ्रष्टो वसोश्चेदिपतेः पुनः।<br>दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः॥ ७८<br>ततो हत्वा जरासन्धं भीमस्तं रथमुत्तमम्।<br>प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः॥ ७९ | तदनन्तर वे महायशस्वी जनमेजय रुधिरकी गन्धसे तथा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो गये और उस यज्ञके अवभृथस्नानके समय वह दिव्य तथा उत्तम रथ लुप्त हो गया। तदनन्तर इन्द्रने प्रसन्न होकर उस वंशसे परिभ्रष्ट उस रथको चेदिदेशके राजा वसुको दे दिया। पुनः उनसे बृहद्रथने प्राप्त किया। उसके बाद कौरवनन्दन भीमने जरासंधको मारकर वह उत्तम रथ वासुदेवको प्रेमपूर्वक प्रदान कर दिया॥ ७७-७९॥ | | सूत उवाच<br>अभ्यषिञ्चत्पुरुं पुत्रं ययातिर्नाहुषः प्रभुः।<br>कृतोपकारस्तेनैव पुरुणा द्विजसत्तमाः॥ ८०<br>अभिषेक्तुकामं च नृपं पुरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन्॥ ८१<br>कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो।<br>ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य कनीयान्राज्यमर्हति॥ ८२<br>एते सम्बोधयामस्त्वां धर्मं च अनुपालय॥ ८३ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! नहुषके पुत्र ययातिने अपने पुत्र पुरुको [राज्यपर] अभिषिक्त किया था; क्योंकि उस पुरुने उनका उपकार किया था। कनिष्ठ पुत्र पुरुका अभिषेक करनेकी इच्छावाले उन राजासे प्रमुख ब्राह्मणों तथा अन्य नागरिकोने यह वचन कहा था—'हे प्रभो! शुक्राचार्यके नाती तथा देवयानीके पुत्र ज्येष्ठ यदुका अतिक्रमण करके छोटा भाई [पुरु] राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम लोग आपको यह समझा रहे हैं कि आप धर्मका पालन करें'॥ ८०-८३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे इक्ष्वाकुवंशवर्णनं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः॥ ६६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'इक्ष्वाकुवंशवर्णन' नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६६॥

६७- राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा

२९२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

सड़सठवाँ अध्याय

राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा

ययातिरुवाचययाति बोले—श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा सभी वर्णके लोग मेरा वचन सुनें—'मैं ज्येष्ठ पुत्रको कभी भी राज्य नहीं दूँगा। ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो [पिताके प्रति] विपरीत बुद्धिवाला हो, वह सज्जनोंके द्वारा पुत्र नहीं माना गया है। सज्जन लोग माता-पिताके वचनको माननेवाले पुत्रकी ही प्रशंसा करते हैं। [वास्तवमें] वही पुत्र है, जो माता-पिताके साथ पुत्रभावमें स्थित होकर व्यवहार करता है। यदुने मेरी अवज्ञा की है; उसी प्रकार तुर्वसु, द्रुह्य तथा अनुने भी मेरी बहुत अवहेलना की है। पुरुने मेरे वचनका पालन किया है और विशेषरूपसे मेरा सम्मान किया है। मेरा छोटा पुत्र [पुरु] ही मेरा उत्तराधिकारी है, जिसने मेरे बुढ़ापेको स्वीकार किया। शुक्राचार्यने देवयानीके लिये मुझे जरावस्था प्राप्त होनेकी आज्ञा दी थी। जब मैंने उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने पुनः बुढ़ापेको संचारिणी बना दिया। काव्य तथा उशना नामधारी शुक्रने स्वयं मुझे वर प्रदान किया था कि जो पुत्र आपके अनुकूल व्यवहार करे, वही आपके राज्यका अधिकारी होगा। अतः [हे ब्राह्मणो!] अब आपलोग भी मुझे आज्ञा दें कि यह पुरु राज्यपर अभिषिक्त किया जाय'॥ १–७ १/२ ॥
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः।<br>ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथञ्चन॥ १<br>मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः।<br>प्रतिकूलमतिश्चैव न स पुत्रः सतां मतः॥ २<br>मातापित्रोर्वचनकृत्सद्भिः पुत्रः प्रशस्यते।<br>स पुत्रः पुत्रवद्यस्तु वर्तते मातृपितृषु॥ ३<br>यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च।<br>द्रुह्येण चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम्॥ ४<br>पुरुणा च कृतं वाक्यं मानितश्च विशेषतः।<br>कनीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम॥ ५<br>शुक्रेण मे समादिष्टा देवयान्याः कृते जरा।<br>प्रार्थितेन पुनस्तेन जरा सञ्चारिणी कृता॥ ६<br>शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम्।<br>पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स ते राज्यधरस्त्विति॥ ७<br>भवन्तोऽप्यनुजानन्तु पूरू राज्येऽभिषिच्यते।
प्रकृतय ऊचुःप्रजागण बोले—जो पुत्र गुणसम्पन्न, सर्वदा माता-पिताका हित करनेवाला तथा समस्त कल्याणके योग्य हो, वह छोटा होनेपर भी [राज्यका] उत्तराधिकारी होता है। अतः पुत्र पुरु ही राज्यके योग्य है, जिसने आपके वचनका पालन किया है; शुक्रके वरदानसे विपरीत [कार्य] नहीं किया जा सकता है॥ ८–९ १/२ ॥
यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा॥ ८<br>सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः।<br>अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतो वाक्यकृत्तव॥ ९<br>वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं कर्तुमन्यथा।
सूत उवाचसूतजी बोले—इस प्रकार जब प्रसन्न हुए नगरवासियोंने नहुषपुत्र [ययाति]-से कहा, तब उन्होंने अपने पुत्र पुरुको राज्यपर अभिषिक्त करके तुर्वसुको दक्षिण-पूर्व दिशामें रहनेकी आज्ञा प्रदान की। उसके बाद राजा [ययाति]-ने ज्येष्ठ पुत्र यदुको दक्षिण दिशामें
एवं जानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा॥ १०<br>अभिषिच्य ततो राज्ये पूरुं स सुतमात्मनः।<br>दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं पुत्रमादिशत्॥ ११<br>दक्षिणायामथो राजा यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्।<br>प्रतीच्यामुत्तरस्यां तु द्रुह्यं चानुं च तावुभौ॥ १२

अध्याय ६७] राजर्षि ययातिका आख्यान तथा ययातिगाथा २९३


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम्।<br>व्यभजच्च त्रिधा राज्यं पुत्रेभ्यो नहुषस्तदा॥ १३<br><br>पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तु हर्षनिर्भरमानसः।<br>प्रीतिमानभवद्राजा भारमावेश्य बन्धुषु॥ १४नियोजित कर दिया और उन दोनों द्रुह्यु तथा अनुको [क्रमशः] पश्चिम तथा उत्तर दिशामें नियुक्त कर दिया। नहुषपुत्र ययातिने सात द्वीपोंवाली सागरोंसहित पृथ्वीको जीतकर पुत्रोंमें राज्यको तीन भागोंमें बाँट दिया। इस प्रकार पुत्रोंमें राज्य संक्रमित करनेवाले तथा हर्षपूर्ण मनवाले राजा बन्धुओंपर उनका भार सौंपकर प्रसन्न हो गये॥ १०—१४॥
अत्र गाथा महाराज्ञा पुरा गीता ययातिना।<br>याभिः प्रत्याहरेत्कामान् सर्वतोऽङ्गानि कूर्मवत्॥ १५<br><br>ताभिरेव नरः श्रीमान्नान्यथा कर्मकोटिकृत्।<br>न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति॥ १६<br><br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।<br>यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः॥ १७<br><br>नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।<br>यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम॥ १८<br><br>कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा।<br>यदा परान्न बिभेति परे चास्मान्न बिभ्यति॥ १९<br><br>यदा न निन्देन्न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा।<br>या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः॥ २०<br><br>योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।<br>जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः॥ २१<br><br>चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका निरुपद्रवा।<br>जीर्यन्ति देहिनः सर्वे स्वभावादेव नान्यथा॥ २२<br><br>जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यते।<br>यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्॥ २३महाराज ययातिके द्वारा इस विषयमें पहले ये गाथाएँ गायी गयी थीं, जिनके द्वारा मनुष्य जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगोंको समेट लेता है, वैसे ही अपनी समस्त कामनाओंको समेट लेता है और उन्हींसे वह श्रीमान् हो जाता है, अन्यथा नहीं; चाहे वह करोड़ों कर्म करनेवाला ही क्यों न हो। कामनाओंके उपभोगसे इच्छा शान्त नहीं होती है; जैसे हविके द्वारा अग्नि बढ़ती है, उसी प्रकार यह निरन्तर बढ़ती ही जाती है। पृथ्वीपर जो भी व्रीहि, जौ, सोना, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब वस्तुएँ [किसी] एकके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं—यह मानकर [मनुष्यको] कामनामुक्त हो जाना चाहिये। जब मनुष्य सभी प्राणियोंके प्रति मन, वचन तथा कर्मसे पापमय भाव नहीं रखता है, तब वह ब्रह्मको प्राप्त होता है। जब वह दूसरेसे डरता नहीं, दूसरे लोग भी उससे नहीं डरते; जब वह [दूसरेकी] निन्दा नहीं करता तथा उससे द्वेष नहीं करता, तब वह ब्रह्मको प्राप्त होता है। जो तृष्णा दुष्ट बुद्धिवालोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे त्यागनेयोग्य है, जो [मनुष्यके] जीर्ण होनेपर भी [स्वयं] जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणका अन्त करनेवाला रोग है; उस तृष्णाका त्याग कर देनेवालेको सुख होता है। जीर्ण व्यक्तिके केश जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण व्यक्तिके दाँत जीर्ण हो जाते हैं और उसके नेत्र तथा कान भी जीर्ण हो जाते हैं; केवल तृष्णा ही [सदा] उपद्रवरहित रहती है अर्थात् यह सदा तरुण बनी रहती है। सभी प्राणी स्वभावतः ही जीर्ण होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है, किंतु [मनुष्यके] जीर्ण हो जानेपर भी जीवनकी आशा एवं धनकी आशा जीर्ण नहीं होती है। संसारमें जो कामसुख है तथा जो स्वर्गका महान् सुख

६८- ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन

२९४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| तृष्णाक्षयसुखस्यैतत्कलां नार्हति षोडशीम्।<br>एवमुक्त्वा स राजर्षिः सदारः प्राविशद्वनम्॥ २४<br><br>भृगुतुङ्गे तपस्तप्त्वा तत्रैव च महायशाः।<br>साधयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान्॥ २५<br><br>तस्य वंशास्तु पञ्चैते पुण्या देवर्षिसत्कृताः।<br>यैर्व्याप्ता पृथिवी कृत्स्ना सूर्यस्येव मरीचिभिः॥ २६<br><br>धनी प्रजावानायुष्मान् कीर्तिमांश्च भवेन्नरः।<br>ययातिचरितं पुण्यं पठञ्छृण्वंश्च बुद्धिमान्॥ २७<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते॥ २८ | है, वह तृष्णाके नाशके सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है॥ १५–२३ १/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर वे राजर्षि [ययाति] पत्नीके साथ वनमें चले गये। उन महायशस्वीने वहीं भृगुतुंग शिखरपर निराहार रहकर [महान्] तपस्या करके भार्यासहित स्वर्गको प्राप्त किया। उनके ये पवित्र तथा देवर्षियोंद्वारा सत्कृत पाँच वंश हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे वह सूर्यकी रश्मियोंसे व्याप्त है। ययातिके पुण्यप्रद चरित्रको पढ़ने तथा सुननेवाला मनुष्य धनी, सन्तानयुक्त, आयुष्मान्, कीर्तिशाली एवं बुद्धिमान् हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २४–२८॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशे ययातिचरितं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवंशमें ययातिचरित' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६७॥


अड़सठवाँ अध्याय

ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन

| सूत उवाच<br>यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः।<br>सङ्क्षेपेणानुपूर्व्याच्च गदतो मे निबोधत॥ १<br>यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः।<br>सहस्रजित्सुतो ज्येष्ठो क्रोष्टुर्नीलोऽजको लघुः॥ २<br>सहस्रजित्सुतस्तद्वच्छतजिन्नाम पार्थिवः।<br>सुताः शतजितः ख्यातास्त्रयः परमकीर्तयः॥ ३<br>हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहयश्च यः।<br>हैहयस्य तु दायादो धर्म इत्यभिविश्रुतः॥ ४<br>तस्य पुत्रोऽभवद्विप्रा धर्मनेत्र इति श्रुतः।<br>धर्मनेत्रस्य कीर्तिस्तु सञ्जयस्तस्य चात्मजः॥ ५<br>सञ्जयस्य तु दायादो महिष्मान्नाम धार्मिकः।<br>आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान्॥ ६<br>भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दमो नाम पार्थिवः।<br>दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम विश्रुतः॥ ७<br>धनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकसम्मताः।<br>कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च॥ ८<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत्कार्तवीर्यस्ततोऽर्जुनः।<br>जज्ञे बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरोत्तमः॥ ९ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं [ययातिके] उत्तम तेजवाले ज्येष्ठ पुत्र यदुके वंशका क्रमानुसार संक्षेपमें वर्णन करूँगा; मुझ कहनेवालेसे [आपलोग] सुनें। यदुके देवपुत्रतुल्य पाँच पुत्र हुए; उनमें सहस्रजित् ज्येष्ठ पुत्र था और क्रोष्टु, नील, अजक तथा लघु अन्य पुत्र थे। सहस्रजित्का पुत्र उन्हींके समान था। वह शतजित् नामक राजा हुआ। शतजित्के महाकीर्तिशाली तीन पुत्र कहे गये हैं; वे हैहय, हय तथा राजा वेणुहय नामवाले थे। हैहयका जो पुत्र हुआ, वह धर्म नामसे प्रसिद्ध है। हे विप्रो! उसका धर्मनेत्र [नामके] पुत्र हुआ—ऐसा सुना गया है। धर्मनेत्रका पुत्र कीर्ति था और उस [कीर्ति]-का पुत्र संजय था। संजयका महिष्मान् नामक धार्मिक पुत्र था और महिष्मान्का पुत्र भद्रश्रेण्य था; वह प्रतापशाली था। भद्रश्रेण्यका पुत्र दुर्दम नामक राजा था। दुर्दमका बुद्धिमान् पुत्र धनक नामसे प्रसिद्ध था॥ १–७॥<br><br>धनकके कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा कृतौजा—ये चार लोकमान्य पुत्र उत्पन्न हुए। उन कृतवीर्यसे कार्तवीर्यार्जुन (सहस्रार्जुन) उत्पन्न हुआ; वह [अपनी] |

अध्याय ६८ ] ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन २९५

तस्य रामस्तदा त्वासीनमृत्युर्नारायणात्मकः । तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः ॥ १०

कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः । शूरश्च शूरसेनश्च धृष्टः कृष्णस्तथैव च ॥ ११

जयध्वजश्च राजासीदावन्तीनां विशां पतिः । जयध्वजस्य पुत्रोऽभूत्तालजङ्घो महाबलः ॥ १२

शतं पुत्रास्तु तस्येह तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः । तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रोऽभवन्नृपः ॥ १३

वृषप्रभृतयश्चान्ये तत्सुताः पुण्यकर्मणः । वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः ॥ १४

मधोः पुत्रशतं चासीद् वृष्णिस्तस्य तु वंशभाक् । वृष्णेस्तु वृष्णयः सर्वे मधोर्वे माधवाः स्मृताः । यादवा यदुवंशेन निरुच्यन्ते तु हैहयाः ॥ १५

तेषां पञ्चगणा ह्येते हैहयानां महात्मनाम् ॥ १६

वीतिहोत्राश्च हर्य्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा । शूरसेनास्तु विख्यातास्तालजङ्घास्तथैव च ॥ १७

शूरश्च शूरसेनश्च वृषः कृष्णस्तथैव च । जयध्वजः पञ्चमस्तु विख्याता हैहयोत्तमाः ॥ १८

शूरश्च शूरवीरश्च शूरसेनस्य चानघाः । शूरसेना इति ख्याता देशास्तेषां महात्मनाम् ॥ १९


हजार भुजाओंके द्वारा सातों द्वीपोंका श्रेष्ठ स्वामी हो गया था। नारायणस्वरूपवाले परशुराम उस समय उसकी मृत्युका कारण बने। उसके सौ पुत्र थे; उनमेंसे पाँच पुत्र महारथी, अस्त्रोंके ज्ञाता, बलशाली वीर, धर्मात्मा तथा मनस्वी थे। वे शूर, शूरसेन, धृष्ट, कृष्ण तथा जयध्वज [नामवाले] थे। राजा जयध्वज अवन्तीयोंका स्वामी था। जयध्वजको तालजंघ नामक महाबली पुत्र हुआ। उस [तालजंघ]-के सौ पुत्र हुए, जो इस लोकमें 'तालजंघ' नामसे प्रसिद्ध हुए। उनमें ज्येष्ठ [पुत्र] वीतिहोत्र महापराक्रमी राजा हुआ। वृष आदि उसके जो अन्य पुत्र थे, वे पुण्यकर्मवाले थे। उनमें वृष ही वंशको चलानेवाला हुआ। उसका पुत्र मधु हुआ। मधुके सौ पुत्र थे। उस [मधु]-का पुत्र वृष्णि ही वंशप्रवर्तक हुआ। वृष्णिके सभी वंशज 'वृष्णि' तथा मधुके वंशज माधव कहे गये हैं। यदुवंशसे सम्बन्धित यादव हैहय कहे जाते हैं॥ ८–१५॥

उन महात्मा हैहयोंके ये पाँच वंश हैं—वीतिहोत्र, हर्य्यात, भोज, अवन्ति तथा शूरसेन; ये तालजंघ भी कहे गये हैं। शूर, शूरसेन, वृष, कृष्ण एवं पाँचवाँ जयध्वज—ये उत्तम हैहय कहे गये हैं। शूरसेनके वंशज शूर तथा शूरवीर नामवाले थे; हे अनघ [ऋषियो]! उन महात्माओंके

२९६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतोऽनर्त इत्युत।<br>दुर्जयः कृष्णपुत्रस्तु बभूवामित्रकर्षणः॥ २०<br><br>क्रोष्टोश्च शृणु राजर्षेर्वंशमुत्तमपौरुषम्।<br>यस्यान्वये तु सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः॥ २१<br><br>क्रोष्टोरेकोऽभवत्पुत्रो वृजिनीवान् महायशाः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्स्वाती कुशंकुस्तत्सुतोऽभवत्॥ २२<br><br>अथ प्रसूतिमिच्छन् वै कुशंकुः सुमहाबलः।<br>महाक्रतुभिरीजेऽसौ विविधैराप्तदक्षिणैः॥ २३<br><br>जज्ञे चित्ररथस्तस्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः।<br>अथ चैत्ररथो वीरो यज्वा विपुलदक्षिणः॥ २४<br><br>शशबिन्दुस्तु वै राजा अन्वयाद् व्रतमुत्तमम्।<br>चक्रवर्ती महासत्त्वो महावीर्यो बहुप्रजः॥ २५देश भी 'शूरसेन'—इस नामवाले कहे गये हैं। वीतिहोत्रका पुत्र अनर्त नामसे प्रसिद्ध हुआ। कृष्णका दुर्जय नामक पुत्र हुआ, वह शत्रुओंका दमन करनेवाला था। अब राजर्षि क्रोष्टुके उत्तम पौरुषवाले वंशका श्रवण कीजिये, जिसके कुलमें वृष्णिवंशको चलानेवाले विष्णु (कृष्ण) उत्पन्न हुए। क्रोष्टुका एक ही वृजिनीवान् नामक महायशस्वी पुत्र हुआ। उसका पुत्र स्वाती हुआ और उस [स्वाती]-का पुत्र कुशंकु हुआ। उसके बाद संतानकी इच्छा रखते हुए उन महाबली कुशंकुने अनेक प्रकारके पर्याप्त दक्षिणावाले महायज्ञोंके द्वारा यजन किया। [इसके परिणामस्वरूप] उसका चित्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो [शुभ] कर्मोंसे युक्त था। चित्ररथका पुत्र पराक्रमशाली शशबिन्दु था; उसने विपुल दक्षिणा देकर यज्ञ करके उत्तम तथा पवित्र व्रत आदि किया। [इस प्रकार] वह महाज्ञानी, महापराक्रमी तथा बहुत प्रजाओंवाला चक्रवर्ती राजा हो गया॥ १६–२५॥
शशबिन्दोस्तु पुत्राणां सहस्राणामभूच्छतम्।<br>शंसन्ति तस्य पुत्राणामनन्तकमनुत्तमम्॥ २६<br><br>अनन्तकात्सुतो यज्ञो यज्ञस्य तनयो धृतिः।<br>उशनास्तस्य तनयः सम्प्राप्य तु महीमिमाम्॥ २७<br><br>आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः।<br>स्मृतश्चोशनसः पुत्रः सितेषुर्नार्म पार्थिवः॥ २८<br><br>मरुतस्तस्य तनयो राजर्षिर्वंशवर्धनः।<br>वीरः कम्बलबर्हिंस्तु मरुतस्यात्मजः स्मृतः॥ २९<br><br>पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः।<br>निहत्य रुक्मकवचो वीरान् कवचिनो रणे॥ ३०<br><br>धन्विनो निशितैर्बाणैरवाप श्रियमुत्तमाम्।<br>अश्वमेधे तु धर्मात्मा ऋत्विग्भ्यः पृथिवीं ददौ॥ ३१शशबिन्दुके हजार पुत्र उत्पन्न हुए; लोग उनके पुत्रोंमें अनन्तकको सबसे उत्तम कहते हैं। अनन्तकसे यज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यज्ञका पुत्र धृति हुआ। उस [धृति]-का पुत्र उशना हुआ; उस परम धार्मिकने इस पृथ्वीको प्राप्त करके एक सौ अश्वमेध यज्ञ किया। उशनाका पुत्र सितेषु नामक राजा कहा गया है। उसका पुत्र मरुत था; वह वंशको बढ़ानेवाला राजर्षि हुआ। पराक्रमी कम्बलबर्हि [उस] मरुतका पुत्र बताया गया है। कम्बलबर्हिका पुत्र रुक्मकवच हुआ; वह विद्वान् था। रुक्मकवचने युद्धमें कवच तथा धनुष धारण करनेवाले वीरोंको [अपने] तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर उत्तम श्री प्राप्त कर ली थी। उस धर्मात्माने अश्वमेध-यज्ञमें [यज्ञ करानेवाले] ऋत्विजोंको पृथ्वीका दान किया था॥ २६–३१॥
जज्ञे तु रुक्मकवचात्परावृत्परवीरहा।<br>जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महासत्त्वाः परावृतः॥ ३२<br><br>रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः।<br>परिघं च हरिं चैव विदेहेषु पिता न्यसत्॥ ३३रुक्मकवचसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला परावृत् उत्पन्न हुआ। [उस] परावृत्से पाँच महाशक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुए—रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरि। पिताने परिघ तथा हरिको विदेहदेशोंमें स्थापित किया। रुक्मेषु राजा हुआ और पृथुरुक्म उसके आश्रयमें

अध्याय ६८ ] ययातिपुत्र यदुके वंशका वर्णन [ २९७

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुक्मेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयात्।<br>तैस्तु प्रव्राजितो राजा ज्यामघोऽवसदाश्रमे ॥ ३४<br><br>प्रशान्तः स वनस्थोऽपि ब्राह्मणैरेव बोधितः।<br>जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी ॥ ३५<br><br>नर्मदातीरमेकाकी केवलं भार्यया युतः।<br>ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा त्यक्तमन्यैरुवास सः ॥ ३६रहने लगा। उन सबके द्वारा [राज्यसे] हटा दिया गया राजा ज्यामघ आश्रममें निवास करने लगा। ब्राह्मणोंने शान्त होकर वनमें निवास करनेवाले उस ज्यामघको ज्ञान प्रदान किया और ध्वजा तथा रथ धारण करनेवाला वह [अपना] धनुष लेकर दूसरे देशमें चला गया। अन्य लोगोंद्वारा त्यक्त वह ऋक्षवान्-पर्वतपर जाकर अपनी भार्याके साथ नर्मदा नदीके तटपर अकेला निवास करने लगा॥ ३२–३६॥
ज्यामघस्याभवद्भार्या शैब्या शीलवती सती।<br>सा चैव तपसोऽग्रेण शैब्या वै सम्प्रसूयत ॥ ३७<br><br>सुतं विदर्भं सुभगा वयःपरिणता सती।<br>राजपुत्रसुतायां तु विद्वांसौ क्रथकैशिकौ ॥ ३८<br><br>पुत्रौ विदर्भराजस्य शूरौ रणविशारदौ।<br>रोमपादस्तृतीयश्च बभ्रुस्तस्यात्मजः स्मृतः ॥ ३९<br><br>सुधृतिस्तनयस्तस्य विद्वान् परमधार्मिकः।<br>कैशिकस्तनयस्तस्मात्तस्माच्चैद्यान्वयः स्मृतः ॥ ४०<br><br>क्रथो विदर्भस्य सुतः कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>कुन्तेर्वृत्तस्ततो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् ॥ ४१ज्यामघकी पत्नी शैब्या शीलसम्पन्न तथा पतिव्रता थी। उस सौभाग्यशालिनी एवं पतिव्रता शैब्याने कठोर तपस्याके द्वारा [अपनी] वृद्धावस्थामें विदर्भ नामक पुत्रको जन्म दिया। राजकुमारीके गर्भसे राजा विदर्भके क्रथ तथा कैशिक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे विद्वान्, पराक्रमी एवं युद्धमें प्रवीण थे। उसका तीसरा पुत्र रोमपाद भी था; उसका पुत्र बभ्रु कहा गया है। उस [बभ्रु]-का पुत्र सुधृति था; वह विद्वान् तथा परम धार्मिक था। उस विदर्भसे जो कैशिक नामक पुत्र था, उसीसे चैद्यवंश कहा गया है। विदर्भका जो पुत्र क्रथ था, उसका पुत्र कुन्ति हुआ। कुन्तिसे वृत उत्पन्न हुआ और उस [वृत]-से प्रतापी रणधृष्ट उत्पन्न हुआ॥ ३७–४१॥
रणधृष्टस्य च सुतो निधृतिः परवीरहा।<br>दशार्हो नैधृतो नाम्ना महारिगणसूदनः ॥ ४२<br><br>दशार्हस्य सुतो व्याप्तो जीमूत इति तत्सुतः।<br>जीमूतपुत्रो विकृतिस्तस्य भीमरथः सुतः ॥ ४३<br><br>अथ भीमरथस्यासीत्पुत्रो नवरथः किल।<br>दानधर्मरतो नित्यं सत्यशीलपरायणः ॥ ४४<br><br>तस्य चासीद् दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।<br>तस्मात्करम्भः सम्भूतो देवरातोऽभवत्ततः ॥ ४५रणधृष्टका पुत्र निधृति था; वह शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला था। निधृतिका दशार्ह नामक पुत्र था, जो बड़े-बड़े शत्रुओंका वध करनेवाला था। दशार्हका पुत्र व्याप्त था और उसका पुत्र जीमूत था। जीमूतका पुत्र विकृति था और उस [विकृति]-का पुत्र भीमरथ था। उसके बाद भीमरथके नवरथ [नामक] पुत्र उत्पन्न हुआ; वह सदा दान तथा धर्ममें लगा रहता था और सत्य तथा सदाचारके प्रति परायण था। उसका पुत्र दृढरथ था और उस [दृढरथ]-का पुत्र शकुनि था। उस शकुनिसे करम्भ उत्पन्न हुआ और उस [करम्भ]-से देवरात उत्पन्न हुआ॥ ४२–४५॥
देवरातादभूद्राजा देवरातिर्महायशाः।<br>देवगर्भोपमो जज्ञे यो देवक्षत्रनामकः ॥ ४६<br><br>देवक्षत्रसुतः श्रीमान् मधुर्नाम महायशाः।<br>मधूनां वंशकृद्राजा मधोस्तु कुरुवंशकः ॥ ४७देवरातसे देवराति उत्पन्न हुआ; वह महायशस्वी राजा था। उससे देवपुत्रतुल्य देवक्षत्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। देवक्षत्रको मधु नामक पुत्र हुआ; जो ऐश्वर्यशाली,

६९- चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन

२९८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कुरुवंशादनुस्तस्मात्पुरुत्वान् पुरुषोत्तमः ।<br>अंशुर्जज्ञे च वैदर्भ्यां भद्रवत्यां पुरुत्वतः ॥ ४८<br>ऐक्ष्वाकीमवहच्चांशुः सत्त्वस्तस्मादजायत ।<br>सत्त्वात्सर्वगुणोपेतः सात्त्वतः कुलवर्धनः ॥ ४९ | महायशस्वी तथा मधुवंशकी वृद्धि करनेवाला राजा हुआ। मधुसे कुरुवंश नामक पुत्र हुआ। कुरुवंशसे अनु हुआ और उस [अनु]-से पुरुषश्रेष्ठ पुरुत्वान् उत्पन्न हुआ। पुरुत्वान्‌से वैदर्भी भद्रवतीके गर्भसे अंशुने जन्म लिया। अंशुने ऐक्ष्वाकीसे विवाह किया; उस [अंशु]-से सत्त्व उत्पन्न हुआ। सत्त्वसे सात्त्वत उत्पन्न हुआ; वह समस्त गुणोंसे सम्पन्न तथा कुलकी वृद्धि करनेवाला था ॥ ४८-४९ ॥ | | ज्यामघस्य मया प्रोक्ता सृष्टिर्वै विस्तरेण वः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि निसृष्टिं ज्यामघस्य तु ॥ ५०<br>प्रजीवत्येति वै स्वर्गं राज्यं सौख्यं च विन्दति ॥ ५१ | [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंसे ज्यामघकी सृष्टिका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। जो [व्यक्ति] ज्यामघकी सृष्टिको पढ़ता अथवा सुनता है; वह दीर्घकालतक जीवित रहता है, राज्य तथा सुख प्राप्त करता है और [अन्तमें] स्वर्गकी प्राप्ति करता है ॥ ५०-५१ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वंशानुवर्णनं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वंशानुवर्णन' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥


उनहत्तरवाँ अध्याय

चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
सात्त्वतः सत्यसम्पन्नः प्रजज्ञे चतुरः सुतान् ।<br>भजनं भ्राजमानं च दिव्यं देवावृधं नृपम् ॥ १<br>अन्धकं च महाभागं वृष्णिं च यदुनन्दनम् ।<br>तेषां निसर्गाश्चतुरः शृणुध्वं विस्तरेण वै ॥ २[हे ऋषियो!] सत्यसम्पन्न सात्त्वतने तेजस्वी भजन, दिव्य राजा देवावृध, महाभाग्यशाली अन्धक तथा यदुनन्दन वृष्णि—इन चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। अब उनके चारों वंशोंको विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥
सृञ्जयां भजनाच्चैव भ्राजमानाद्विजज्ञिरे ।<br>अयुतायुः शतायुश्च बलवान् हर्षकृत्स्मृतः ॥ ३तेजस्वी भजनके द्वारा सृंजयीसे अयुतायु, शतायु तथा बलवान् हर्षकृत् उत्पन्न हुए बताये गये हैं ॥ ३ ॥
तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः ।<br>पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्मरन् ॥ ४<br>तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोको नृपोत्तमः ।<br>अनुवंशपुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् ॥ ५<br>गुणान् देवावृधस्याथ कीर्तयन्तो महात्मनः ।<br>यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात् ॥ ६<br>बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।<br>पुरुषाः पञ्चषष्टिस्तु षट् सहस्त्राणि चाष्ट च ॥ ७[सात्त्वतके] उन पुत्रोंमें राजा देवावृधने 'मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो'—ऐसा स्मरण करते हुए घोर तपस्या की। तब उसे बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पवित्र यशवाला उत्तम राजा था। वंशपरम्पराके प्राचीन ज्ञाता महान् आत्मावाले देवावृधके गुणोंकी प्रशंसा करते हुए यह गाथा गाते हैं—बभ्रुके विषयमें हमलोग जैसा दूरसे सुनते हैं, वैसा ही समीपसे देखते हैं। देवताओंके समान देवावृधकी तरह बभ्रु मनुष्योंमें

अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... 'कृष्णचरितका वर्णन | २९९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि।<br>यज्वा दानमतिर्वीरो ब्रह्मण्यस्तु दृढव्रतः॥ ८<br>कीर्तिमांश्च महातेजाः सात्त्वतानां महारथः।<br>तस्यान्ववाये सम्भूता भोजा वै देवतोपमाः॥ ९श्रेष्ठ है। चौदह हजार पैंसठ [ऐसे] पुरुष थे, जिन्होंने देवावृधके पुत्र बभ्रुसे अमृतत्व प्राप्त किया था। वह यज्ञ करनेवाला, दानबुद्धिवाला, पराक्रमी, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाला, दृढव्रतसे युक्त, कीर्तिशाली, महातेजस्वी तथा सात्त्वतोंमें महारथी था। उसके वंशमें देवतुल्य भोजलोग उत्पन्न हुए॥ ४–९॥
गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।<br>गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥ १०<br>माद्री लेभे च तं पुत्रं ततः सा देवमीढुषम्।<br>अनमित्रं शिनिं चैव तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ११गान्धारी तथा माद्री—ये वृष्णिकी भार्याएँ थीं। गान्धारीने सुमित्र तथा मित्रनन्दनको जन्म दिया। माद्रीने देवमीढुष नामक पुत्रको उत्पन्न किया, उसके बाद उसने अनमित्र तथा शिनि नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे दोनों उत्तम पुरुष थे॥ १०-११॥
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।<br>प्रसेनश्च महाभागः सत्राजिच्च सुतावुभौ ॥ १२<br>तस्य सत्राजितः सूर्यः सखा प्राणसमोऽभवत्।<br>स्यमन्तको नाम मणिर्दत्तस्तस्मै विवस्वता ॥ १३<br>पृथिव्यां सर्वरत्नानामसौ राजाभवन्मणिः।<br>कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनेन सहैव सः॥ १४<br>वधं प्राप्तोऽसहायश्च सिंहादेव सुदारुणात्।अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके दो पुत्र हुए—प्रसेन तथा महाभाग्यशाली सत्राजित्। सूर्य उस सत्राजित्का प्राणतुल्य मित्र था। सूर्यने उसे स्यमन्तक नामक मणि दी थी। वह मणि पृथिवीपर सभी रत्नोंमें श्रेष्ठ थी। किसी समय वह प्रसेन मणिसे युक्त होकर आखेटके लिये गया हुआ था; एक महाभयंकर सिंहने उसका वध कर दिया, उस समय वह असहाय था॥ १२–१४१/२॥
अथ पुत्रः शिनेर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्॥ १५<br>सत्यवाक् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तस्य चात्मजः।<br>सात्यकिर्युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान् ॥ १६<br>असङ्गो युयुधानस्य कुणिस्तस्य सुतोऽभवत्।<br>कुणेर्युगन्धरः पुत्रः शैनेया इति कीर्तिताः॥ १७वृष्णिके कनिष्ठ पुत्र शिनिसे सत्यक नामक सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र युयुधान था; जो सात्यकि नामसे प्रसिद्ध था। वह शिनिका प्रतापशाली नप्ता (नाती) था। युयुधानका पुत्र असंग तथा उस [असंग]-का पुत्र कुणि हुआ। कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। ये शिनिके वंशज कहे गये हैं॥ १५–१७॥
माद्र्याः सुतस्य संजज्ञे सुतो वार्ष्णिर्युधाजितः।<br>श्वफल्क इति विख्यातस्त्रैलोक्यहितकारकः॥ १८<br>श्वफल्कश्च महाराजो धर्मात्मा यत्र वर्तते।<br>नास्ति व्याधिभयं तत्र नावष्टिभयमप्युत ॥ १९<br>श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामवाप सः।<br>गान्दिनीं नाम काश्यो हि ददौ तस्मै स्वकन्यकाम्॥ २०माद्री तथा वृष्णिसे पुत्र युधाजित् उत्पन्न हुआ; वह श्वफल्क नामसे विख्यात हुआ। वह तीनों लोकोंका हित करनेवाला था। धर्मात्मा महाराज श्वफल्क जहाँ रहते थे, वहाँ न व्याधिभय रहता था और न अनावृष्टिभय रहता था। उन श्वफल्कने काशिराजकी पुत्रीको भार्याके रूपमें प्राप्त किया था। काशिराजने अपनी गान्दिनी नामक कन्याको उन्हें प्रदान किया था॥ १८–२०॥
सा मातुरुदरस्था वै बहून् वर्षगणान् किल।<br>वसन्ती न च संजज्ञे गर्भस्थां तां पिताब्रवीत्॥ २१वह अपनी माताके गर्भमें बहुत वर्षोंतक स्थित रही और जब वहाँ निवास करती हुई उसने जन्म नहीं लिया,
३००श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जायस्व शीघ्रं भद्रं ते किमर्थं चाधितिष्ठसि।<br>प्रोवाच चैनं गर्भस्था सा कन्या गान्दिनी तदा॥ २२<br>वर्षत्रयं प्रतिदिनं गामेकां ब्राह्मणाय तु।<br>यदि दद्यास्ततः कुक्षेर्निर्गमिष्याम्यहं पितः॥ २३<br>तथेत्युवाच तस्या वै पिता काममपूरयत्।<br>दाता शूरश्च यज्वा च श्रुतवानतिथिप्रियः॥ २४<br>तस्याः पुत्रः स्मृतोऽक्रूरः श्वफल्काद्भूरिदक्षिणः।<br>रत्ना कन्या च शैवस्य ह्यक्रूरस्तामवाप्तवान्॥ २५<br>अस्यामुत्पादयामास तनयांस्तान्निबोधत।<br>उपमन्युस्तथा मागुर्वृतस्तु जनमेजयः॥ २६<br>गिरिरक्षस्तथोपेश्र्वः शत्रुघ्नो योऽरिमर्दनः।<br>धर्मभृद् दृष्टधर्मा च गोधनोऽथ वरस्तथा॥ २७<br>आवाहप्रतिवाहौ च सुधारा च वराङ्गना।<br>अक्रूरस्योग्रसेन्यां तु पुत्रौ द्वौ कुलन्दनौ॥ २८<br>देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसम्मतौ।तब पिताने गर्भमें विद्यमान उस [कन्या]-से कहा था—'तुम शीघ्र जन्म ग्रहण करो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम [गर्भमें ही] क्यों रुकी हुई हो?' तब गर्भमें स्थित उस कन्या गान्दिनीने उनसे कहा—'हे पितः! यदि आप तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक गाय ब्राह्मणको दानमें दें, तब मैं गर्भसे बाहर निकलूँगी।' इसपर पिताने कहा—'वैसा ही होगा।' इसके बाद पिताने उसकी कामना पूर्ण की। उसी कन्यासे श्वफल्कके द्वारा अक्रूर उत्पन्न कहा गया है, जो दानी, पराक्रमी, यज्ञ करनेवाला, विद्वान्, अतिथिप्रिय तथा विपुल दक्षिणा देनेवाला था। शैवकी रत्ना नामक कन्या थी, उसीको अक्रूरने [भार्यारूपमें] प्राप्त किया था। [हे ऋषियो!] उसने इस [कन्या]-से जिन पुत्रोंको उत्पन्न किया, उन्हें आप सुनिये—वे उपमन्यु, मागु, वृत, जनमेजय, गिरिरक्ष, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मभृत्, दृष्टधर्मा, गोधन, वर, आवाह तथा प्रतिवाह [नामवाले] थे और सुधारा नामक एक सुन्दर कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अक्रूरको उग्रसेनकी कन्यासे देववान् तथा उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले एवं देवतुल्य थे॥ २१—२८ १/२ ॥
सुमित्रस्य सुतो जज्ञे चित्रकश्च महायशाः॥ २९<br>चित्रकस्याभवन् पुत्रा विपृथुः पृथुरेव च।<br>अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुधासूकगवेक्षणौ॥ ३०<br>अरिष्टनेमिरश्वश्च धर्मो धर्मभृदेव च।<br>सुभूमिर्बहुभूमिश्च श्रविष्ठाश्रवणे स्त्रियौ॥ ३१<br>अन्धकात्काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।<br>कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलबर्हिषम्॥ ३२<br>कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णोः शूरस्ततोऽभवत्।<br>कपोतरोमातिबलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥ ३३<br>तस्यासीत्तुम्बुरुसखो विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते स सुनाम्ना तु चन्दनानकदुन्दुभिः॥ ३४सुमित्रको चित्रक नामक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। चित्रकके विपृथु, पृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुधासूक, गवेक्षण, अरिष्टनेमि, अश्व, धर्म, धर्मभृत्, सुभूमि, बहुभूमि [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए और श्रविष्ठ तथा श्रवणा [नामक] दो कन्याएँ उत्पन्न हुईं। काशिराजकी पुत्रीने अन्धकसे कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हि नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और उस वृष्णिसे शूर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र कपोतरोमा हुआ; वह महाबलवान् था। उस [कपोतरोमा]-का पुत्र विलोमक हुआ। उसका पुत्र नल हुआ; वह तुम्बुरु (गन्धर्व)-का मित्र और विद्वान् था। वह चन्दनानकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ २९—३४॥
तस्मादप्यभिजित्पुत्र उत्पन्नोऽस्य पुनर्वसुः।<br>अश्वमेधं स पुत्रार्थमाजहार नरोत्तमः॥ ३५<br>तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सदोमध्यात्समुत्थितः।<br>ततस्तु विद्वान् सर्वज्ञो दाता यज्वा पुनर्वसुः॥ ३६उससे अभिजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस [अभिजित्]-का पुत्र पुनर्वसु हुआ। उस श्रेष्ठ राजाने पुत्रके लिये अश्वमेधयज्ञ किया था। उस यज्ञमें जब मन्त्रोंका उच्चारण हो रहा था, तब पूजनकर्ताओंके मध्य

अध्याय ६९ ] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा कृष्णचरितका वर्णन ३०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्यापि पुत्रमिथुनं बभूवाभिजितः किल।<br>आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातौ कीर्तिमतां वरौ॥ ३७<br>आहुकात्काश्यदुहितुर्द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः।<br>देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ॥ ३८<br>देवकस्य सुता राज्ञो जज्ञिरे त्रिदशोपमाः।<br>देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः॥ ३९<br>तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ।<br>वृषदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता॥ ४०<br>श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा तथापरा।<br>देवकी चापि तासां च वरिष्ठाऽभूत्सुमध्यमा॥ ४१पुनर्वसुने जन्म लिया था। वह विद्वान्, सर्वज्ञ, दानी तथा यज्ञ करनेवाला हुआ। उस अभिजित्‌के जुड़वाँ पुत्र भी उत्पन्न हुए; कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आहुक तथा आहुकि नामवाले कहे गये हैं। आहुकसे काश्यकी पुत्रीको देवक एवं उग्रसेन नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे दोनों देवताओंके पुत्रोंके समान थे। राजा देवकके देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित—ये देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी सात बहनें थीं। राजाने उन्हें वसुदेवको दे दिया। वे वृषदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा तथा देवकी [नामवाली] थीं। उनमें देवकी वरिष्ठ एवं परम सुन्दरी थी॥ ३५—४१॥
नवोग्रसेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ ४२<br>देवकस्य सुता पत्नी वसुदेवस्य धीमतः।<br>बभूव वन्द्या पूज्या च देवैरपि पतिव्रता॥ ४३<br>रोहिणी च महाभागा पत्नी चानकदुन्दुभेः।<br>पौरवी बाह्निकसुता सम्पूज्यासीत्सुरैरपि॥ ४४उग्रसेनके नौ पुत्र थे; कंस उनमें ज्येष्ठ था। उन सबके सैकड़ों-हजारों पुत्र तथा पौत्र थे। देवककी पुत्री [देवकी] बुद्धिमान् वसुदेवकी भार्या हुई; वह देवताओंकी भी वन्दनीया तथा पूजनीया और पतिव्रता थी। बाह्निकपुत्री पौरवी महाभाग्यशालिनी रोहिणी भी आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-की पत्नी थी; वह देवताओंके द्वारा भी पूजाके योग्य थी॥ ४२—४४॥
असूत रोहिणी रामं बलश्रेष्ठं हलायुधम्।<br>आश्रितं कंसभीत्या च स्वात्मानं शान्ततेजसम्॥ ४५<br>जाते रामेऽथ निहते षड्गर्भे चातिदक्षिणे।<br><br>वसुदेवो हरिं धीमान् देवक्यामुदपादयत्॥ ४६<br>स एव परमात्मासौ देवदेवो जनार्दनः।<br>हलायुधश्च भगवाननन्तो रजतप्रभः॥४७<br>भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।<br>बभूव तस्यां देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः॥४८कंसके भयसे [स्वयं देवकीके गर्भसे निकलकर] रोहिणीके गर्भका आश्रय लेनेवाले, बलशालियोंमें श्रेष्ठ, हलका आयुध धारण करनेवाले तथा शान्त तेजवाले बलरामको रोहिणीने उत्पन्न किया; परम सुन्दर छः गर्भोंके [कंसद्वारा] वध कर दिये जानेके बाद और बलरामके जन्म लेनेके बाद बुद्धिमान् वसुदेवने देवकीसे श्रीकृष्णको उत्पन्न किया। वे ही परमात्मा, देवदेव तथा जनार्दन हैं और रजत (चाँदी)-के समान कान्तिवाले हलायुध (बलराम) भगवान् अनन्त (शेष) हैं। वे जनार्दन (श्रीविष्णु) भृगुके शापके बहाने मानवशरीर धारण करना स्वीकार करते हुए उस देवकीसे वसुदेवके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे॥ ४५—४८॥
उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।<br>नियोगाद्देवदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥ ४९<br>सा चैव प्रकृतिः साक्षात्सर्वदेवनमस्कृता।<br>पुरुषो भगवान् कृष्णो धर्ममोक्षफलप्रदः॥ ५०उसी समय देवदेव [श्रीविष्णु]-की आज्ञासे उमाके देहसे उत्पन्न योगनिद्रा [भगवती] कौशिकीने यशोदाकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया था। वे ही सभी देवताओंसे नमस्कृत साक्षात् प्रकृति हैं और धर्म तथा मोक्षका फल देनेवाले भगवान् कृष्ण पुरुष हैं॥ ४९-५०॥
३०२श्रीलिङ्गमहापुराण[पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तां कन्यां जगृहे रक्षन् कंसात्स्वात्यात्मजं तदा।<br>चतुर्भुजं विशालाक्षं श्रीवत्सकृतलाञ्छनम् ॥ ५१<br>शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।<br>यशोदायै प्रदत्त्वा तु वसुदेवश्च बुद्धिमान् ॥ ५२<br>दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्षतामिति चाब्रवीत्।<br>रक्षकं जगतां विष्णुं स्वेच्छया धृतविग्रहम् ॥ ५३<br>प्रसादाच्चैव देवस्य शिवस्यामिततेजसः।<br>रामेण सार्धं तं दत्त्वा वरदं परमेश्वरम् ॥ ५४<br>भूभारनिग्रहार्थं च ह्यवतीर्णं जगद्गुरुम्।<br>अतो वै सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति ॥ ५५उस समय कंससे अपने पुत्रकी रक्षा करते हुए बुद्धिमान् वसुदेवने चार भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले श्रीवत्सके चिह्नसे युक्त, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले जनार्दनको यशोदाको देकर उस कन्याको ले लिया। लोकोंके रक्षक तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले इन विष्णुको देकर उन्होंने नन्दगोपसे कहा—'इसकी रक्षा कीजिये।' अमित तेजवाले देवदेव शिवकी कृपासे बलरामके साथ उन वरदायक, परमेश्वर, पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अवतीर्ण तथा जगत्के गुरु [श्रीकृष्ण]-को प्रदान करके कहा था—'इससे यादवोंका सब प्रकारका कल्याण होगा। यह देवकीका वही पुत्र है, जो हम लोगोंके कष्टोंको दूर करेगा'॥ ५१—५५ ½ ॥
अयं स गर्भो देवक्या यो नः क्लेशान् हरिष्यति।<br>उग्रसेनात्मजायाथ कंसायानकदुन्दुभिः ॥ ५६<br>निवेदयामास तदा जातां कन्यां सुलक्षणाम्।<br>अस्यास्तवाष्टमो गर्भो देवक्याः कंस सुव्रत ॥ ५७<br>मृत्युरेव न सन्देह इति वाणी पुरातनी।<br>ततस्तां हन्तुमारेभे कंसः सोल्लङ्घ्य चाम्बरम् ॥ ५८<br><br>उवाचाष्टभुजा देवी मेघगम्भीरया गिरा।<br>रक्षस्व तत्स्वकं देहमायातो मृत्युरेव ते ॥ ५९<br>रक्षमाणस्य देहस्य मायावी कंसरूपिणः।<br>किं कृतं दुष्कृतं मूर्ख जातः खलु तवान्तकृत् ॥ ६०उसके बाद वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंससे सुन्दर लक्षणोंवाली उस उत्पन्न हुई कन्याके विषयमें बताया—हे कंस! हे सुव्रत! यह देवकीका आठवाँ गर्भ ही तुम्हारा मृत्युरूप होगा; इसमें सन्देह नहीं—यह पुरातन वाणी है। तब कंसने उसे मारना आरम्भ किया। किंतु [उसके हाथसे छूटकर] आकाशमें जाकर उस अष्टभुजा देवीने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'[हे कंस!] अब तुम अपने देहकी रक्षा करो। मायावी कंसके स्वरूपमें रहनेवाले इस देहकी रक्षा करते हुए तुम्हारी मृत्यु आ गयी है; अरे, मूर्ख! तुमने कैसा अपराध कर डाला, तुम्हारा अन्त करनेवाला तो उत्पन्न हो चुका है'॥ ५६—६०॥
देवक्याः स भयात्कंसो जघानैवाष्टमं त्विति।<br>स्मरन्ति विहितो मृत्युर्देवक्यास्तनयोऽष्टमः ॥ ६१<br>यस्तत्प्रतिकृतौ यत्नो भोजस्यासीद् वृथा हरेः।<br>प्रभावान्मुनिशार्दूलास्तया चैव जडीकृतः ॥ ६२<br>कंसोऽपि निहतस्तेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निहता बहवश्चान्ये देवब्राह्मणघातिनः ॥ ६३उस कंसने भयसे देवकीके आठवें गर्भको मार डालनेका प्रयत्न किया था; क्योंकि उसने स्मरण कर रखा था कि जिससे उसकी मृत्यु निर्धारित है, वह देवकीका आठवाँ पुत्र है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रतीकार करनेमें कंसका जो भी प्रयास था, वह व्यर्थ हो गया और [भगवान्] श्रीहरिके प्रभावसे उस वाणीके द्वारा वह कंस जड़ कर दिया गया था। [अन्तमें] अक्लिष्ट कर्म करनेवाले उन श्रीकृष्णने कंसको भी मार डाला और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका वध करनेवाले अन्य बहुत-से दुष्टोंको भी मार डाला॥ ६१—६३॥

अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... श्रीकृष्णचरितका वर्णन ३०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य कृष्णस्य तनयाः प्रद्युम्नप्रमुखास्तथा।<br>बहवः परिसंख्याताः सर्वे युद्धविशारदाः॥ ६४<br>कृष्णपुत्राः समाख्याताः कृष्णेन सदृशाः सुताः।<br>पुत्रेष्वेतेषु सर्वेषु चारुदेष्णादयो हरेः॥ ६५<br>विशिष्टा बलवन्तश्च रौक्मिणेयारिसूदनाः।<br>षोडशस्त्रीसहस्त्राणि शतमकं तथाधिकम्॥ ६६<br>कृष्णस्य तासु सर्वासु प्रिया ज्येष्ठा च रुक्मिणी।<br>तया द्वादशवर्षाणि कृष्णोनाक्लिष्टकर्मणा ॥ ६७<br>उष्यता वायुभक्षेण पुत्रार्थं पूजितो हरः।<br>चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः ॥ ६८<br>चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः साम्ब एव च।<br>एते लब्धास्तु कृष्णेन शूलपाणिप्रसादतः ॥ ६९उन श्रीकृष्णके प्रद्युम्न आदि बहुत-से पुत्र बताये गये हैं; वे सब युद्धमें प्रवीण थे। कृष्णके पुत्र कृष्णके ही समान थे। श्रीकृष्णके इन सभी पुत्रोंमें चारुदेष्ण आदि पुत्र विशिष्ट तथा बलवान् थे; वे रुक्मिणीके पुत्र शत्रुओंका विनाश करनेवाले थे। कृष्णकी सोलह हजार एक सौ भार्याएँ थीं; उन सबमें रुक्मिणी [उनकी] ज्येष्ठ पत्नी थी। अक्लिष्ट कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने उस [रुक्मिणी]-के साथ बारह वर्षोंतक उपवास करते हुए [केवल] वायुभक्षणसे पुत्रहेतु [भगवान्] शिवका पूजन किया था। [परिणामस्वरूप] श्रीकृष्णने शूलपाणि (शिव)-की कृपासे चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयश, प्रद्युम्न तथा साम्ब—इन पुत्रोंको प्राप्त किया था॥ ६४–६९॥
तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् रौक्मिणेयांश्च रुक्मिणीम्।<br>जाम्बवत्यब्रवीत्कृष्णं भार्या कृष्णस्य धीमतः ॥ ७०<br>मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तरम्।<br>सुरेशसम्मितं पुत्रं प्रसन्नो दातुमर्हसि ॥ ७१<br>जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथस्ततो हरिः।<br>तपस्तप्तुं समारेभे तपोनिधिरनिन्दितः ॥ ७२रुक्मिणीके उन वीर पुत्रोंको तथा रुक्मिणीको देखकर बुद्धिमान् कृष्णकी पत्नी जाम्बवतीने कृष्णसे कहा—'हे कमलनयन! आप प्रसन्न होकर मुझे विशिष्ट, महान् गुणी तथा शिवजीको प्रिय पुत्र प्रदान कीजिये। तदनन्तर जाम्बवतीका वचन सुनकर अनिन्द्य एवं तपोनिधि जगन्नाथ श्रीहरिने तप करना प्रारम्भ किया॥ ७०–७२॥
सोऽथ नारायणः कृष्णः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>व्याघ्रपादस्य च मुनेर्गत्वा चैवाश्रमोत्तमम् ॥ ७३<br>ऋषिं दृष्ट्वा त्वङ्गिरसं प्रणिपत्य जनार्दनः।<br>दिव्यं पाशुपतं योगं लब्ध्वांस्तस्य चाज्ञया ॥ ७४शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले उन जनार्दन नारायण श्रीकृष्णने मुनि व्याघ्रपादके श्रेष्ठ आश्रममें जाकर उन अंगिरागोत्रीय ऋषिको देखकर उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञासे दिव्य पाशुपतयोग प्राप्त किया॥ ७३–७४॥
प्रलुप्तश्मश्रुकेशश्च घृताक्तो मुञ्जमेखली।<br>दीक्षितो भगवान् कृष्णस्तताप च परंतपः ॥ ७५<br>ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितः।<br>फलाम्ब्वनिलभोजी च ऋतुत्रयमधोक्षजः ॥ ७६दाढ़ी तथा सिरको मुण्डित कराकर, शरीरको घृतसे अनुलिप्तकर तथा मूँजकी मेखला धारण करके [व्रतमें] दीक्षित होकर परंतप भगवान् श्रीकृष्ण तपस्या करने लगे। उन श्रीकृष्णने हाथोंको ऊपर उठाकर, आश्रयरहित होकर तथा पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित होकर क्रमशः फल, जल एवं वायुका आहार ग्रहण करते हुए तीन ऋतुओं तक तपस्या की॥ ७५–७६॥
तपसा तस्य सन्तुष्टो ददौ रुद्रो बहून् वरान्।<br>साम्बं जाम्बवतीपुत्रं कृष्णाय च महात्मने ॥ ७७<br>तथा जाम्बवती चैव साम्बं भार्या हरेः सुतम्।<br>प्रहर्षमतुलं लेभे लब्ध्वादित्यं यथादितिः ॥ ७८उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर [भगवान्] रुद्रने महात्मा कृष्णको अनेक वर प्रदान किया तथा जाम्बवतीसे साम्ब नामक पुत्र प्राप्त होनेका वर प्रदान किया। तब श्रीकृष्णकी भार्या जाम्बवती पुत्र साम्बको प्राप्त करके
३०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उसी प्रकार परम हर्षित हुई, जैसे अदिति आदित्यको प्राप्त करके हर्षित हुई थीं॥ ७७-७८॥
बाणस्य च तदा तेन च्छेदितं मुनिपुङ्गवाः।<br>भुजानां चैव साहस्त्रं शापाद्रुद्रस्य धीमतः॥ ७९<br>अथ दैत्यवधं चक्रे हलायुधसहायवान्।<br>तथा दुष्टक्षितीशानां लीलयैव रणाजिरे॥ ८०हे मुनिश्रेष्ठो! उन श्रीकृष्णने बुद्धिमान् रुद्रके शापके कारण बाणासुरकी हजार भुजाओंको काट डाला था। इसके बाद बलरामको सहायक बनाकर उन्होंने युद्धक्षेत्रमें लीलापूर्वक [अनेक] दैत्योंका तथा दुष्ट राजाओंका वध किया॥ ७९-८०॥
स हत्वा देवसम्भूतं नरकं दैत्यपुङ्गवम्।<br>ब्राह्मणस्योर्ध्वचक्रस्य वरदानान्महात्मनः॥ ८१<br>स्वोपभोग्यानि कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि जग्राह सहस्त्राणि महाबलः॥ ८२यज्ञवराहसे उत्पन्न दैत्यश्रेष्ठ नरकासुरका वध करके अतुलनीय पराक्रमवाले तथा महाबली उन श्रीकृष्णने ऊर्ध्वचक्रवाले वायुदेव तथा ब्रह्मापुत्र महात्मा नारदके वरदानसे अपने उपभोगके योग्य सोलह हजार एक सौ कन्याओंको ग्रहण किया था॥ ८१-८२॥
शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान् कुलम्।<br>संहृत्य तत्कुलं चैव प्रभासेऽतिष्ठदच्युतः॥ ८३<br>तदा तस्यैव तु गतं वर्षाणामधिकं शतम्।<br>कृष्णस्य द्वारकायां वै जराक्लेशापहारिणः॥ ८४उन्होंने विप्रोंके शापके बहाने अपने कुलका संहार कर डाला और उस कुलका संहरण करके वे अच्युत (श्रीकृष्ण) प्रभासक्षेत्रमें रहने लगे। तदनन्तर वृद्धावस्थाके कष्टका हरण करनेवाले उन श्रीकृष्णका द्वारकामें रहते हुए सौ वर्षसे अधिक समय व्यतीत हुआ॥ ८३-८४॥
विश्वामित्रस्य कण्वस्य नारदस्य च धीमतः।<br>शापं पिण्डारकेऽरक्षद्वच्यो दुर्वाससतस्तदा॥ ८५<br>त्यक्त्वा च मानुषं रूपं जरकास्त्रच्छलेन तु।<br>अनुगृह्य च कृष्णोऽपि लुब्धकं प्रययौ दिवम्॥ ८६उन्होंने [द्वारकाके समीपवर्ती] पिण्डारकक्षेत्रमें निवास करनेवाले विश्वामित्र, कण्व, बुद्धिमान् नारद तथा दुर्वासाके शाप तथा वचनकी रक्षा की। [व्याधके द्वारा बनाये गये] जरकास्त्रके बहाने अपने मानवशरीरका परित्याग करके उस व्याधपर कृपा* करके वे श्रीकृष्ण द्युलोक [अपने धाम]-को चले गये॥ ८५-८६॥
अष्टावक्रस्य शापेन भार्याः कृष्णस्य धीमतः।<br>चौरैश्चापहृताः सर्वास्तस्य मायाबलेन च॥ ८७<br>बलभद्रोऽपि सन्त्यज्य नागो भूत्वा जगाम च।<br>महिष्यस्तस्य कृष्णस्य रुक्मिणीप्रमुखाः शुभाः॥ ८८<br>सहाग्निं विविशुः सर्वाः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>रेवती च तथा देवी बलभद्रेण धीमता॥ ८९<br>प्रविष्टा पावकं विप्राः सा च भर्तृपथं गता।<br>प्रेतकार्यं हरेः कृत्वा पार्थः परमवीर्यवान्॥ ९०अष्टावक्रमुनिके शापसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णकी सभी भार्याएँ उनकी मायाके प्रभावसे चोरोंद्वारा अपहृत कर ली गयीं। बलराम भी अपने शरीरका त्याग करके शेषनागका रूप धारणकर [अपने लोक] चले गये। उन श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि प्रमुख कल्याणमयी सभी पटरानियाँ अक्लिष्ट कर्मवाले श्रीकृष्णके साथ अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं। हे विप्रो! देवी रेवतीने भी बुद्धिमान् बलभद्रजीके साथ अग्निमें प्रवेश किया और उन्होंने अपने पतिके मार्गका अनुगमन किया॥ ८७-८९ १/२॥

* मा भैर्जै त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे। याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३०।३९)
[भगवान् श्रीकृष्णने कहा—] हे जेरे! तू डर मत, उठ-उठ! यह तो तूने मेरे मनका काम किया है। जा, मेरी आज्ञासे तू उस स्वर्गमें निवास कर, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानोंको होती है।

७०- महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविध-सर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव३०५
रामस्य च तथान्येषां वृष्णीनामपि सुव्रतः।<br>कन्दमूलफलैस्तस्य बलिकार्यं चकार सः॥ ९१<br><br>द्रव्याभावात्स्वयं पार्थो भ्रातृभिश्च दिवं गतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ९२तत्पश्चात् महाशक्तिशाली तथा उत्तम व्रतवाले उन अर्जुनने श्रीकृष्ण, बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशियोंका और्ध्वदेहिक कृत्य करके द्रव्योंके अभावके कारण कन्द-मूल-फलोंके द्वारा बलि-कार्य (पिण्डदानादि श्राद्धकार्य) किया; इसके बाद वे अर्जुन अपने भाइयोंके साथ स्वयं स्वर्गलोक चले गये॥ ९०-९१ १/२॥
प्रभावो विलयश्चैव स्वेच्छयैव महात्मनः।<br>इत्येतत्सोमवंशानां नृपाणां चरितं द्विजाः॥ ९३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मणान् श्रावयेदपि।<br>स याति वैष्णवं लोकं नात्र कार्या विचारणा॥ ९४इस प्रकार मैंने अक्लिष्ट कर्मवाले महात्मा श्रीकृष्णके प्रभाव तथा अपनी इच्छासे उनके तिरोधानका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। हे द्विजो! जो [मनुष्य] सोमवंशीय राजाओंके इस चरित्रको पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णुलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९२-९४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशानुकीर्तनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवंशानुकीर्तन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६९॥


सत्तरवाँ अध्याय

महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविधसर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव

ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गस्त्वया सूत सूचितो न प्रकाशितः।<br>साम्प्रतं विस्तरेणैव वक्तुमर्हसि सुव्रत॥ १**ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे सुव्रत! आपने आदिसृष्टिका परिचयमात्र दिया, उसपर प्रकाश नहीं डाला; अब आप [इसे] विस्तारसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>महेश्वरो महादेवः प्रकृतेः पुरुषस्य च।<br>परत्वे संस्थितो देवः परमात्मा मुनीश्वराः॥ २<br><br>अव्यक्तं चेश्वरात्तस्माद्भवत्कारणं परम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ३<br><br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ४<br><br>जगद्योनिं महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामीश्वराज्ञाप्रचोदितम्॥ ५<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभावव्ययम्।<br>अप्रकाशमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे समवर्तत॥ ६<br><br>अस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तं त्वासीच्छिवेच्छया।<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभागे तमोमये॥ ७**सूतजी बोले—**हे मुनीश्वरो! परमात्मा देव महेश्वर महादेव प्रकृति तथा पुरुषसे परे हैं। उन्हीं ईश्वरसे परम कारणस्वरूप अव्यक्त उत्पन्न हुआ, जिसे तत्त्वचिन्तक प्रधान तथा प्रकृति कहते हैं। यह गन्ध-वर्ण-रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, स्थिर, अविनाशी, शाश्वत, अपनी आत्मामें स्थित, जगत्की उत्पत्तिका स्रोत, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंका विग्रह (शरीर), ईश्वरकी आज्ञासे प्रेरित, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, सूक्ष्म, तीनों गुणोंसे युक्त, उत्पत्तिका स्रोत तथा अव्यय है; सर्गके आदि कालमें अव्यक्त तथा अविज्ञेय यह ब्रह्मरूप ही था। उस समय तमोमय अविभागके रहनेपर एवं गुणोंके समभावमें रहनेपर शिवकी इच्छासे इस
३०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
[अव्यक्त]-के स्वरूपसे यह सम्पूर्ण [उत्पद्यमान] जगत् व्याप्त था॥ २-७॥
सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्य वै।<br>गुणभावाद् व्यज्यमानो महान् प्रादुर्बभूव ह॥ ८<br><br>सूक्ष्मेण महता चाथ अव्यक्तेन समावृतम्।<br>सत्त्वोद्रिक्तो महानग्रे सत्तामात्रप्रकाशकः॥ ९<br><br>मनो महांस्तु विज्ञेयमेकं तत्कारणं स्मृतम्।<br>समुत्पन्नं लिङ्गमात्रं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं हि तत्॥ १०सृष्टिकालमें क्षेत्रज्ञ (पुरुष)-के द्वारा अधिष्ठित प्रधानके गुणभावसे प्रेरित होता हुआ महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। पहले यह जगत् सूक्ष्म तथा महान् अव्यक्तसे आच्छादित था। इसके बाद सत्तामात्रका प्रकाशक सत्त्वगुण-प्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुआ। महत्तत्त्वको मनके रूपमें जानना चाहिये; यह सृष्टिका कारण कहा गया है। लिङ्ग-मात्र यह [महत्तत्त्व] जीवोंसे अधिष्ठित होकर उत्पन्न हुआ॥ ८-१०॥
धर्मादीनि च रूपाणि लोकतत्त्वार्थहेतवः।<br>महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया॥ ११यह महान् (महत्तत्त्व) सृष्टिकी इच्छासे ईश्वरके द्वारा प्रेरित होकर सृष्टिको तथा सृष्ट जीवोंके परमार्थ कारणभूत वेदों, धर्म आदि रूपोंको विस्तारित करता है॥ ११॥
मनो महान् मतिर्ब्रह्म पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा चितिः स्मृतिः संविद्विश्वेशश्चेति स स्मृतः॥ १२वे महेश्वर ही मन, महान्, मति, ब्रह्म, पूः, बुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, चिति, स्मृति, संविद् तथा विश्वेश कहे गये हैं॥ १२॥
मनुते सर्वभूतानां यस्माच्चेष्टा फलं ततः।<br>सौक्ष्म्यात्तेन विभक्तं तु येन तन्मन उच्यते॥ १३वे समस्त जीवोंका कर्मफल जानते हैं और इस मनके द्वारा सूक्ष्मताके कारण उस कर्मफलसे जगत् विभक्त है, इसलिये इन्हें ‘मन’ कहा जाता है॥ १३॥
तत्त्वानांमग्रजो यस्मान्महांश्च परिमाणतः।<br>विशेषेभ्यो गुणेभ्योऽपि महानिति ततः स्मृतः॥ १४ये सभी तत्त्वोंसे पहले उत्पन्न हुए हैं और परिमाणमें सत्त्व आदि गुणोंसे भी अधिक महान् हैं, इसलिये वे ‘महान्’ कहे गये हैं॥ १४॥
बिभर्ति मानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि च।<br>पुरुषो भोगसम्बन्धात्तेन चासौ मतिः स्मृतः॥ १५वे पुरुष [ईश्वर] भोगसम्बन्धके कारण सबका पोषण करते हैं, सम्पूर्ण प्रमाणको जानते हैं तथा समस्त भेद मानते हैं, इसलिये वे ‘मति’ कहे गये हैं॥ १५॥
बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च भावानां सकलाश्रयात्।<br>यस्माद्धारयते भावान् ब्रह्म तेन निरुच्यते॥ १६वे [महेश्वर] बृहत् होने, सबके पोषक होने तथा भावोंका सम्पूर्ण आश्रय होनेके कारण [समस्त] भावोंको धारण करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ब्रह्म’ कहा जाता है॥ १६॥
यः पूरयति यस्माच्च कृत्स्नान् देवाननुग्रहैः।<br>नयते तत्त्वभावं च तेन पूरिति चोच्यते॥ १७वे [महेश्वर] सभी देवताओंको [अपने] अनुग्रहोंसे परिपूर्ण करते हैं तथा उन्हें तत्त्वभाव प्राप्त कराते हैं, इसलिये वे ‘पूः’ कहे जाते हैं॥ १७॥
बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान् हितं तथा।<br>यस्माद् बोधयते चैव बुद्धिस्तेन निरुच्यते॥ १८वे ईश्वर इस ब्रह्माण्डमें समस्त भावों तथा हित (धर्म)-को [स्वयं] जानते हैं एवं [जीवोंको] बोध

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०७

कराते हैं, इसलिये उन्हें 'बुद्धि' कहा जाता है॥ १८॥
ख्यातिः प्रत्युपभोगश्च यस्मात्संवर्तते ततः।<br>भोगस्य ज्ञाननिष्ठत्वात्तेन ख्यातिरिति स्मृतः॥ १९<br><br>ख्यायते तद्गुणैर्वापि ज्ञानादिभिरनेकंशः।<br>तस्माच्च महतः संज्ञा ख्यातिरितृत्यभिधीयते॥ २०ज्ञाननिष्ठाके कारण [विषय-सम्बन्धी] सुखकी ख्याति (प्रशंसा) तथा भोगकी प्राप्ति उन्हीं ईश्वरसे प्रवर्तित होती है, इसलिये वे 'ख्याति' कहे गये हैं। [आकाश आदिके शब्द आदि] गुणोंके द्वारा तथा ज्ञान आदिके द्वारा सत्पुरुष उनकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये भी उन महान् (पूज्य) ईश्वरका नाम 'ख्याति' कहा जाता है॥ १९-२०॥
साक्षात्सर्वं विजानाति महात्मा तेन चेश्वरः।<br>यस्माज्ज्ञानानुगश्चैव प्रज्ञा तेन स उच्यते॥ २१वे महात्मा शिव सम्पूर्ण जगत्‌को प्रत्यक्ष रूपसे जानते हैं, इसलिये 'ईश्वर' कहे जाते हैं और [स्वयं] ज्ञानरूप हैं, इसलिये 'प्रज्ञा' कहे जाते हैं॥ २१॥
ज्ञानादीनि च रूपाणि बहुकर्मफलानि च।<br>चिनोति यस्माद्भोगार्थं तेनासौ चितिरुच्यते॥ २२वे [जीवोंको] भोगोंकी प्राप्तिके लिये ज्ञान आदि रूपों तथा अनेकविध कर्मफलोंका विस्तार करते हैं, इसलिये वे 'चिति' कहे जाते हैं॥ २२॥
वर्तमानव्यतीतानि तथैवानागतान्यपि।<br>स्मरते सर्वकार्याणि तेनासौ स्मृतिरुच्यते॥ २३वे [महेश्वर] वर्तमान, भूत तथा भविष्यके भी समस्त कार्योंका स्मरण करते हैं अर्थात् उनका ज्ञान रखते हैं, इसलिये वे 'स्मृति' कहे जाते हैं॥ २३॥
कृत्स्नं च विन्दते ज्ञानं यस्मान्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तस्माद्विन्देर्विदेश्चैव संविदित्युभिधीयते॥ २४<br><br>विद्यतेऽपि च सर्वत्र तस्मिन् सर्वं च विन्दति।<br>तस्मात्संविदिति प्रोक्तो महद्भिर्मु निसत्तमाः॥ २५वे सम्पूर्ण ज्ञान तथा उत्तम माहात्म्यको जानते हैं, इसलिये वे 'विन्द्' तथा 'विद्' धातुसे व्युत्पन्न 'संविद्' रूप भी कहे जाते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे सर्वत्र विद्यमान हैं और भक्त उन [शिव]-में ही सब कुछ प्राप्त करता है, इसलिये वे महात्माओं‌द्वारा 'संविद्' कहे गये हैं॥ २४-२५॥
जानातेर्ज्ञानमित्याहुर्भगवान् ज्ञानसन्निधिः।<br>बन्धनादिपरीभावादीश्वरः प्रोच्यते बुधैः॥ २६'ज्ञा' धातुसे 'ज्ञान' शब्द कहा गया है। ज्ञानसमुद्र भगवान् शिव बन्धन आदिका तिरस्कार करनेके कारण विद्वानोंद्वारा 'ईश्वर' कहे गये हैं॥ २६॥
पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम्।<br>व्याख्यातं तत्त्वभावज्ञैर्देवस्सद्भावचिन्तकैः॥ २७इस प्रकार महेश्वरके उत्तम भावोंका चिन्तन करनेवाले तत्त्ववेत्ताओंने अनेक अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाले शब्दोंके द्वारा आदि (सबसे पहले उत्पन्न) सर्वोत्तम 'शिव' नामक तत्त्वका वर्णन किया है॥ २७॥
महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया।<br>सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम्॥ २८सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर 'महत्' सृष्टिकार्यको विस्तारित करता है। संकल्प तथा अध्यवसाय—ये उसकी दो वृत्तियाँ कही गयी हैं॥ २८॥
त्रिगुणाद्रजसोद्रिक्तादहङ्कारस्ततोऽभवत् ।<br>महता च वृतः सर्गो भूतादिर्बाह्यतस्तु सः॥ २९रजोगुणप्रधान त्रिगुणके कारण वह [उत्पद्यमान] सर्ग, भूत आदि तथा अहंकार महत्के द्वारा बाहरसे ढके
३०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादेव तमोद्रिक्तादहङ्कारादजायत।<br>भूततन्मात्रसर्गस्तु भूतादिस्तामसस्तु सः॥ ३०<br><br>भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह।<br>आकाशं सुशिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम्॥ ३१<br><br>आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्।<br>वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ३२<br><br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते।<br>स्पर्शमात्रस्तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ३३<br><br>ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह।<br>सम्भवन्ति ततो ह्यापस्ता वै सर्वरसात्मिकाः॥ ३४<br><br>रसमात्रास्तु ता ह्यापो रूपमात्रोऽग्निरावृणोत्।<br>आपश्चापि विकुर्वत्यो गन्धमात्रं ससर्जिरे॥ ३५<br><br>सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः।<br>तस्मिंस्तस्मिंश्च तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता॥ ३६हुए थे। उसी तमोगुणप्रधान अहंकारसे शब्द-स्पर्श आदि तन्मात्राओंका आकाश आदि तामस सर्ग हुआ। सृष्टिका विस्तार करते हुए भूतादिने शब्दमात्र आकाशका सृजन किया; उससे शब्दलक्षणवाला सुषिर (पुष्कर नामक) आकाश उत्पन्न हुआ। शब्दतन्मात्रावाले आकाशने स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया। सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए वायुने रूपतन्मात्रावाले अग्निको उत्पन्न किया। वायुसे जो ज्योति [अग्नि] उत्पन्न होती है, वह वायुके ही रूप तथा गुणवाली कही जाती है। इस प्रकार स्पर्शतन्मात्रावाले वायुने रूपतन्मात्रावाली अग्निको आच्छादित किया। सृष्टिको विस्तारित करती हुई ज्योति [अग्नि]ने रसतन्मात्राको उत्पन्न किया; उससे सर्वरसमय जल उत्पन्न हुआ। रूपतन्मात्रावाली अग्निने उस रसतन्मात्रात्मक जलको आच्छादित किया। पुनः सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए जलने गन्धतन्मात्राका सृजन किया, उससे पृथिवी उत्पन्न हुई; उसका गुण गन्ध माना गया है। वे शब्द आदि गुण अपने-अपने धर्मियोंमात्रमें ही स्थित रहते हैं। अतः उनमें तन्मात्रता कही गयी है॥ २९-३६॥
अविशेषवाचकत्वादविशेषास्ततस्तु ते।<br>प्रशान्तघोरमूढत्वादविशेषास्ततः पुनः॥ ३७<br><br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं विज्ञेयस्तु परस्परम्।<br>वैकारिकादहङ्कारात्सत्त्वोद्रिक्तात्तु सात्त्विकात्॥ ३८वे [शब्द आदि] अविशेषके वाचक होनेके कारण तन्मात्र शब्दका प्रतिपादक होनेके कारण तथा प्रशान्त (सात्त्विक), घोर (राजस) और मूढ़ (तामस) होनेके कारण अविशेष कहे गये हैं। इसे परस्पर (पंच) भूतोंकी तन्मात्राओंका सर्ग (सृष्टि) जानना चाहिये। वैकारिक [राजस] अहंकारसे और सत्त्वप्रधान सात्त्विक अहंकारसे वह वैकारिक सर्ग एक साथ प्रवर्तित होता है॥ ३७-३८ १/२॥
वैकारिकः स सर्गस्तु युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च॥ ३९<br><br>साधकानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश।<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम्॥ ४०<br><br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि तानि वै॥ ४१<br><br>पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत्।<br>गतिर्विसर्गो ह्यानन्दः शिल्पं वाक्यं च कर्म तत्॥ ४२पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये इन्द्रियाँ साधनस्वरूप हैं और उनके दस राजस अधिष्ठाता देवता हैं। जो ग्यारहवाँ मन है, वह अपने गुणसे उभयात्मक (ज्ञान-कर्मेन्द्रियात्मक) है। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा पाँचवीं नासिका—ये इन्द्रियाँ शब्द आदिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानयुक्त होती हैं। दोनों पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, दोनों हाथ तथा दसवीं वाणी है; क्रमशः गति, विसर्ग (मलत्याग), आनन्द, शिल्प तथा बोलना उनका कार्य है॥ ३९-४२॥

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आकाशं शब्दमात्रं च स्पर्शमात्रं समाविशत्।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत्॥ ४३<br>रूपं तथैव विशतः शब्दस्पर्शगुणावुभौ।<br>त्रिगुणस्तु ततस्त्वग्निः सशब्दस्पर्शरूपवान्॥ ४४<br>सशब्दस्पर्शरूपं च रसमात्रं समाविशत्।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः॥ ४५<br>शब्दस्पर्शं च रूपं च रसो वै गन्धमाविशत्।<br>सङ्गता गन्धमात्रेण आविशन्तो महीमिमाम्॥ ४६<br>तस्मात्पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शस्यते।<br>शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः॥ ४७<br>परस्परानुपवेशाद्धारयन्ति परस्परम्।<br>भूमेरन्तस्त्विदं सर्वं लोकालोकाचलावृतम्॥ ४८शब्दतन्मात्रावाला आकाश स्पर्शतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुणवाला हुआ। शब्द एवं स्पर्श—ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, अतः शब्द-स्पर्श-रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणोंवाला हुआ। शब्द-स्पर्श-रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जलको चार गुणोंवाला जानना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये गन्धतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए। अतः गन्धतन्मात्राके साथ इस पृथ्वीमें इनके प्रवेश करनेपर पृथ्वी पाँच गुणोंवाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [पाँचों] भूतोंमें श्रेष्ठ कही जाती है। अतः [अधिक गुणके कारण] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुणवाले हैं; इसी कारणसे वे विशेष कहे गये हैं। परस्पर प्रवेश करनेके कारण वे एक-दूसरेको धारण करते हैं। भूमिके भीतर यह सब लोकालोकपर्वतसे आवृत है॥ ४३-४८॥
विशेषाश्चेन्द्रियग्राह्या नियतत्वाच्च ते स्मृताः।<br>गुणं पूर्वस्य सर्गस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तराः॥ ४९<br>तेषां यावच्च तद्यच्च यच्च तावद् गुणं स्मृतम्।<br>उपलभ्याप्सु वै गन्धं केचिद् ब्रूयुरपां गुणम्॥ ५०<br>पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रयात्।<br>एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्॥ ५१<br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महादयो विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते॥ ५२वे विशेष (शब्द आदि) नियतत्वके कारण इन्द्रिय-ग्राह्य कहे गये हैं। पूर्व सर्ग (आकाश आदि)-के गुणको उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं। उन शब्द आदिमें जितनी मात्रामें जो गुण होता है, उतनी ही मात्रामें उसे कहा गया है। जलमें गन्धका अनुभव होनेपर कुछ लोग कहते हैं कि यह जलका गुण है। पृथ्वीमें उस गन्धको जल तथा वायुके संयोगसे जानना चाहिये। महान् आत्मावाले ये सातों [महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण] एक-दूसरेके आश्रयसे रहते हैं। महत्तत्त्वसे लेकर [शब्द आदि] विशेषतक पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण तथा अव्यक्त [परमेश्वर]-के अनुग्रहसे ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ४९-५२॥
एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवन्महत्तदुदकेशयम् ॥५३<br>अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैतास्तेजसा बाह्यतो वृताः॥ ५४<br>तेजो दशगुणेनैव वायुना बाह्यतो वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ५५<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम्।<br>भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान्॥ ५६जलमें बुलबुलेकी भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों (शब्द आदि)-से एक ही बारमें उत्पन्न हुआ; वह जलमें स्थित था। वह अण्ड [अपनेसे] दस गुना विस्तारवाले जलसे बाहरसे घिरा था; यह जल दस गुना विस्तारवाले तेज (अग्नि)-से बाहरसे घिरा था, तेज दस गुना विस्तारवाले वायुसे बाहरसे घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तारवाले आकाशसे बाहरसे घिरा था, जिस आकाशसे वायु आवृत था, वह आकाश