श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७- ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमामहेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति
अध्याय १७ ] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य... शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७३
सत्रहवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमा-महेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति
| सूत उवाच<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः सद्यादीनां समुद्भवः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ १<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं प्रसादात्परमेष्ठिनः। | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! इस प्रकार मैंने शिवजीके सद्योजात आदि अवतारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को सुनाता है, वह शिवजीके अनुग्रहसे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है॥ १ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>कथं लिङ्गमभूल्लिङ्गे समभ्यर्च्यः स शङ्करः॥ २<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सूत वक्तुमिहार्हसि। | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! लिङ्गकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उस लिङ्गमें शंकरजीकी उपासना कैसे की जानी चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? यह आप हमें बताइये॥ २ १/२॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>एवं देवाश्च ऋषयः प्रणिपत्य पितामहम्॥ ३<br>अपृच्छन् भगवँल्लिङ्गं कथमासीदिति स्वयं।<br>लिङ्गे महेश्वरो रुद्रः समभ्यर्च्यः कथं त्विति॥ ४<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सोऽप्याह च पितामहः। | **रोमहर्षण [ सूतजी ] बोले—**हे ऋषियो! इसी प्रकार अत्यन्त निवेदनपूर्वक देवताओंने भी पितामह ब्रह्मासे पूछा था कि हे भगवन्! यह लिङ्ग कैसे उत्पन्न हुआ तथा लिङ्गमें महेश्वर रुद्रका किस प्रकार पूजन होना चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? इसपर वे ब्रह्मा बोले॥ ३-४ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>प्रधानं लिङ्गमाख्यातं लिङ्गी च परमेश्वरः॥ ५<br>रक्षार्थमम्बुधौ महां विष्णोस्तवासीत्सुरोत्तमाः। | **पितामह [ ब्रह्माजी ]-ने कहा—**प्रधानको लिङ्ग तथा परमेश्वरको लिङ्गी कहा गया है। हे उत्तम देवताओ! यह मेरी तथा विष्णुकी रक्षाके लिये समुद्रमें प्रकट हुआ था॥ ५ १/२॥ | | वैमानिके गते सर्गे जनलोकं सहर्षिभिः॥ ६<br>स्थितिकाले तदा पूर्णे ततः प्रत्याहृते तथा।<br>चतुर्युगसहस्रान्ते सत्यलोकं गते सुराः॥ ७ | जब देवताओंकी सृष्टि समाप्त हो गयी, तब वे देवता ऋषियोंके साथ जनलोक चले गये और पुनः स्थिति-कालके पूर्ण होनेपर और इसके बाद हजार चतुर्युगीके अन्तमें पुनः प्रलयके उपस्थित होनेपर वे सत्यलोक चले गये॥ ६-७॥ | | विनाधिपत्यं समतां गतेऽन्ते ब्रह्मणो मम।<br>शुष्के च स्थावरे सर्वे त्वनावृष्ट्या च सर्वशः॥ ८<br>पशवो मानुषा वृक्षाः पिशाचाः पिशिताशनाः।<br>गन्धर्वाद्याः क्रमेणैव निर्दग्धा भानुभानुभिः॥ ९ | उस समय मैं ब्रह्मा बिना किसी आधिपत्यके साम्य-अवस्थाको प्राप्त था। इस प्रकार अन्तमें अनावृष्टिके कारण सभी स्थावर पदार्थोंके सूख जानेपर सभी ओर समस्त पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस, गन्धर्व आदि क्रमसे सूर्यकी किरणोंसे दग्ध हो गये॥ ८-९॥ | | एकार्णवे महाघोरे तमोभूते समन्ततः।<br>सुष्वापाम्भसि योगात्मा निर्मलो निरुपप्लवः॥ १० | तत्पश्चात् चारों ओर समुद्र-ही-समुद्रके व्याप्त हो |
| ७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहस्रशीर्षा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञः सर्वदेवभवोद्भवः॥ ११<br><br>हिरण्यगर्भो रजसा तमसा शङ्करः स्वयम्।<br>सत्त्वेन सर्वगो विष्णुः सर्वात्मत्वे महेश्वरः॥ १२<br><br>कालात्मा कालनाभास्तु शुक्लः कृष्णस्तु निर्गुणः।<br>नारायणो महाबाहुः सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १३ | जाने तथा घोर अन्धकार छा जानेपर योगात्मा, निर्मल, उपद्रवरहित, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरोंवाले, हजार भुजाओंवाले, विश्वात्मा, सब कुछ जाननेवाले, सभी देवताओं तथा संसारकी उत्पत्ति करनेवाले, रजोगुणसे युक्त होनेके कारण ब्रह्मा, तमोगुणसे युक्त होनेके कारण स्वयं शंकर, सत्त्वगुणसे युक्त होनेके कारण सर्वव्यापी विष्णु, सबकी आत्मा होनेके कारण महेश्वर, कालात्मा, कालरूप नाभिवाले, शुक्ल, कृष्ण, गुणोंसे रहित, नारायण, महान् बाहुवाले तथा सत्-असत्से युक्त सर्वात्मा जलके मध्यमें शयन करने लगे॥ १०-१३॥ |
| तथाभूतमहं दृष्ट्वा शयानं पङ्कजेक्षणम्।<br>मायया मोहितस्तस्य तमवोचममर्षितः॥ १४ | उन्हें इस प्रकार जल-स्थित कमलपर सोते हुए देखकर मैं उस क्षण उनकी मायासे मोहित हो गया और उन सनातनको हाथसे पकड़कर उठाते हुए क्रोधपूर्वक मैंने उनसे कहा—तुम कौन हो, यह मुझे बताओ? ॥ १४ १/२ ॥ |
| कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम्।<br>तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण स दृढेन तु॥ १५ | तत्पश्चात् मेरे तेज तथा दृढ़ हस्त-प्रहारसे शेषनाग-रूपी शय्यासे उठकर इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले वे प्रभु उस क्षण बैठ गये॥ १५ १/२ ॥ |
| प्रबुद्धोऽहीशयनात्समासीनः क्षणं वशी।<br>ददर्श निद्राविक्किन्ननीरजामललोचनः॥ १६<br><br>मामग्रे संस्थितं भासाध्यासितो भगवान् हरिः।<br>आह चोत्थाय भगवान् हसन्मां मधुरं सकृत्॥ १७ | इसके बाद निद्रासे विक्किन्न स्वच्छ कमलसदृश नेत्रोंवाले प्रभावयुक्त भगवान् हरिने अपने सम्मुख विराजमान मुझ ब्रह्माको देखा और उन भगवान्ने शय्यासे उठकर थोड़ा हँसते हुए मुझसे मधुर-मधुर वाणीमें कहा—हे महाद्युते! हे वत्स! हे पितामह! तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है॥ १६-१७ १/२ ॥ |
| स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभाः॥ १८ | हे श्रेष्ठ देवताओ! उनका वह वचन सुनकर रजोगुणसे युक्त होनेके कारण शत्रुतापूर्ण भावसे मैंने मुसकराकर उन जनार्दनसे कहा—॥ १८ १/२ ॥ |
| रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम्।<br>भाषसे वत्स वत्सेति सर्गसंहारकारणम्॥ १९ | हे अनघ! सृजन तथा संहार करनेवाले मुझ ब्रह्माको तुम 'वत्स! वत्स!' इस प्रकार सम्बोधित करते हुए जैसे गुरु शिष्यसे कहता है, उस प्रकारसे मुसकराकर क्यों बोल रहे हो? ॥ १९ १/२ ॥ |
| मामिहान्तः स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ।<br>कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम्॥ २०<br><br>सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विश्वसम्भवम्।<br>विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम्॥ २१<br><br>किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम्।<br>सोऽपि मामाह जगतां कर्ताहमिति लोकप॥ २२ | जगत्के साक्षात् रचयिता, प्रकृतिके प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, पालनकर्ता, विश्वके उत्पत्तिकारक ब्रह्मा, विश्वात्मा, विधाता तथा धारणकर्ता मुझ कमलनयन पितामहसे मोहयुक्त होकर इस प्रकार क्यों बोल रहे हो? इसका |
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारण शीघ्र बताओ॥ २०-२१<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ | |
| भर्ता हर्ता भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात्।<br>विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम्॥ २३<br><br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्।<br>विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम्॥ २४ | इसपर उन्होंने भी मुझसे कहा—सम्पूर्ण जगत्का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता मैं (विष्णु) ही हूँ, ऐसा जानो और तुमने भी मुझ शाश्वत परमेश्वरके अंगसे ही अवतार ग्रहण किया है। फिर भी तुम मुझ जगत्पति, नारायण, रोग-विकाररहित, परम पुरुष, परमात्मा, सभीसे आवाहित होनेवाले, पुरुष्टुत, अच्युत, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा विश्वकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप मुझ विष्णुको भूल गये हो, किंतु इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। यह सब तो मेरी मायाद्वारा रचा गया है॥ २२—२४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तवापराधो नास्त्यत्र मम मायाकृतं त्विदम्।<br>शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम्॥ २५ | हे चार मुखवाले ब्रह्मन्! तुम यह सत्य जानो कि सृष्टिका कर्ता, पालक, संहारक तथा सभी देवताओंका स्वामी मैं ही हूँ। मेरे सदृश ऐश्वर्यवाला और कोई नहीं है॥ २५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| कर्ता नेता च हर्ता च न मयास्ति समो विभुः।<br>अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह॥ २६ | हे पितामह! मैं ही परम ब्रह्म हूँ, मैं ही परम तत्त्व हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ तथा मैं ही परम समर्थ परमात्मा हूँ॥ २६<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः।<br>यद्यद्दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिंश्चराचरम्॥ २७ | हे चतुर्मुख! इस जगत्में जो भी समस्त स्थावर-जंगम वस्तुएँ दिखायी पड़ रही हैं अथवा जिनके बारेमें सुना जाता है; उन सबको मुझसे व्याप्त किया हुआ जानो॥ २७<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमृत्यथ।<br>मया सृष्टं पुरा व्यक्तं चतुर्विंशतिकं स्वयम्॥ २८<br><br>नित्यान्ता ह्यणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधोद्भवादयः।<br>प्रसादाद्धि भवानण्डान्यनेकानीह लीलया॥ २९ | प्राचीन कालमें मैंने ही स्वयं चौबीस तत्त्वमय व्यक्त सृष्टि रची है। नित्य अन्तको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म बद्धजीव, क्रोधसे उत्पन्न अन्यान्य तामसी सृष्टि तथा आप (ब्रह्मा)-सहित अनेक ब्रह्माण्ड मेरी मायाके प्रभावसे ही विरचित हैं॥ २८-२९॥ |
| सृष्टा बुद्धिमया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः।<br>तन्मात्रापञ्चकं तस्मान्मनः षष्ठेन्द्रियाणि च॥ ३०<br><br>आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया।<br>इत्युक्तवति तस्मिंश्च मयि चापि वचस्तथा॥ ३१ | मैंने बुद्धिकी रचना की है तथा उसमें तीन प्रकारके अहंकारों (सात्त्विक, राजस, तामस)-का निर्माण किया है। इसी प्रकार अपनी मायासे पाँच तन्मात्राएँ एवं मन, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पाँच महाभूतोंकी सृष्टि मैंने ही की है॥ ३०<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| आवयोश्चाभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः॥ ३२ | यह वचन कहनेके अनन्तर रजोगुणकी वृद्धिसे परस्पर शत्रुता-भावको प्राप्त हम दोनोंमें उस प्रलय-सागरके मध्य भीषण रोमांचकारी संग्राम होने लगा॥ ३१-३२॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः।<br>विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं च भास्वरम्॥ ३३ | इसी बीच हम दोनोंके कलहको दूर करने तथा |
| ७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ३४<br><br>(चित्र)<br><br>अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम्। | ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त एक दीप्तिमान् लिङ्ग हमलोगोंके समक्ष प्रकट हुआ। वह लिङ्ग हजारों अग्नि-ज्वालाओंसे व्याप्त, सैकड़ों कालानिके सदृश, क्षय तथा वृद्धिसे रहित, आदि-मध्य-अन्तसे हीन, अतुलनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त तथा विश्वका उत्पत्तिकर्तरूप था॥ ३३-३४१/२॥ |
| तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान् हरिः ॥ ३५<br>मोहितं प्राह मामत्र परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।<br>अधोगमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥ ३६<br>भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम्। | उस लिङ्गकी हजारों ज्वालाओंसे भगवान् विष्णु तथा मैं—दोनों लोग मोहित हो गये। फिर विष्णुने मुझसे कहा कि हमें अग्नि-उद्भूत इस लिङ्गका पता लगाना चाहिये। एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्नि-स्तम्भके नीचे जाता हूँ और आप प्रयत्नपूर्वक शीघ्र इसके ऊपर जाइये॥ ३५-३६ १/२॥ |
| एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा॥ ३७<br>वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान् सुराः।<br>तदा प्रभृति मामाहुर्हसं हंसो विराडिति॥ ३८<br>हंस हंसेति यो ब्रूयान्मां हंसः स भविष्यति। | हे देवताओ! ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णुने वराहका रूप धारण कर लिया और मैं भी शीघ्र हंसके रूपको प्राप्त हो गया। उसी समयसे मुझ ब्रह्माको विराट् रूपवाले भगवान् विष्णु 'हंस' कहने लगे। जो प्राणी 'हंस-हंस' नामसे मेरा कीर्तन करता है, वह हंसत्वको प्राप्त हो जाता है॥ ३७-३८ १/२॥ |
| सुश्वेतो ह्यनलाक्षश्च विश्वतः पक्षसंयुतः॥ ३९<br>मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोऽहं चोर्ध्वतः सुराः। | हे देवताओ! उस समय मैं अत्यन्त श्वेत वर्णका था, मेरे नेत्र अग्निके समान थे और मैं सभी ओरसे पंखोंसे युक्त था—इस प्रकार हंसरूपमें मैं मनरूपी वायुके वेगसे उड़कर ऊपरकी ओर गया॥ ३९ १/२॥ |
| नारायणोऽपि विश्वात्मा नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ४०<br>दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।<br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्॥ ४१<br>कालादित्यसभाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्।<br>ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम्॥ ४२<br>वाराहमसितं रूपमास्थाय गतवानधः। | उधर विश्वात्मा नारायण विष्णु भी दस योजन चौड़े तथा शत योजन लम्बे और नीले अंजनके समूहसदृश, मेरुपर्वत-तुल्य शरीरवाले, श्वेत तथा तीक्ष्ण दंष्ट्रांकुर एवं विशाल थूथनवाले, छोटे-छोटे पैरोंवाले, विचित्र अंगोंवाले, प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान, दृढ़, अनुपमेय, भीषण शब्दवाले तथा सर्वथा अपराजेय कृष्णवाराहका रूप धारण करके उस अग्नि-स्तम्भ (लिङ्ग)-के नीचेकी ओर गये॥ ४०-४२ १/२॥ |
| एवं वर्षसहस्रं तु त्वरन् विष्णुरधोगतः॥ ४३<br>नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः। | इस प्रकार विष्णुभगवान् एक हजार वर्षतक वेगपूर्वक नीचेकी ओर जाते रहे, किंतु वाराहरूप विष्णु इस लिङ्गके मूलका अल्पांश भी नहीं देख सके॥ ४३ १/२॥ |
| तावत्कालं गतो ह्यूर्ध्वमहमप्यरिसूदनः॥ ४४<br>सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया।<br>श्रान्तो ह्यदृष्ट्वा तस्यान्तमहङ्कारादधोगतः॥ ४५ | शत्रुओंका दमन करनेवाला मैं ब्रह्मा भी उस लिङ्गका अन्त जाननेकी इच्छासे पूरे प्रयासके साथ शीघ्रतापूर्वक ऊपरकी ओर जाता रहा॥ ४४ १/२॥ |
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथैव भगवान् विष्णुः श्रान्तः सन्त्रस्तलोचनः।<br>सर्वदेवभवस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः॥ ४६ | तत्पश्चात् अहंकारपूर्वक ऊपर गया हुआ मैं उस लिङ्गका अन्त न देखकर अत्यन्त थका हुआ नीचे लौट आया और उसी प्रकार सभी देवताओंके उद्भवकर्ता तथा महान् शरीरवाले वे भगवान् विष्णु भी थकान एवं सन्त्रासभरे नेत्रोंके साथ लिङ्गका मूल न पाकर नीचेसे ऊपर आ गये॥ ४५-४६॥ |
| समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य महामनाः।<br>मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः॥ ४७ | शंकरकी मायासे मोहको प्राप्त वे महामना विष्णु मेरे साथ आकर परमेश्वरको प्रणाम करके व्याकुल मनसे खड़े हो गये। |
| पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव चाग्रतः परमेश्वरम्।<br>प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति॥ ४८ | इसके बाद मेरे साथ पुनः परमेश्वरको पीछेसे, बगलसे तथा आगेसे प्रणाम करके वे विचार करने लगे कि [आदि-अन्तहीन] यह क्या है?॥ ४७-४८॥ |
| तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः।<br>ओमोमिति सुरश्रेष्ठाः सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः॥ ४९ | हे श्रेष्ठ देवताओ! उसी समय वहाँ प्लुत स्वरसे युक्त ‘ओम्-ओम्’ ऐसा अत्यन्त स्पष्ट शब्दरूप नाद सुनायी पड़ा॥ ४९॥ |
| किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन् महास्वनम्।<br>लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तदापश्यत्सनातनम्॥ ५० | यह तीव्र शब्द क्या है— ऐसा मेरे साथ विचार करते हुए वे विष्णु खड़े रहे। तभी उन्होंने उस ‘ओम्’ नादके अन्तमें लिङ्गके दक्षिण भागमें सनातन आदि वर्ण |
| आद्यवर्णमकारं तु उकारं चोत्तरे ततः।<br>मकारं मध्यतश्चैव नादान्तं तस्य चोमिति॥ ५१ | अकार, उसके उत्तर भागमें उकार तथा उसके मध्यमें मकार देखा॥ ५०-५१॥ |
| सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे।<br>उत्तरे पावकप्रख्यमुकारं पुरुषर्षभः॥ ५२ | इस प्रकार सूर्यमण्डलके समान आदि वर्ण अकारको लिङ्गके दक्षिणमें, अग्निके सदृश प्रतीत होनेवाले उकारको उत्तरमें |
| शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं मध्यमं तथा।<br>तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकवत्प्रभुम्॥ ५३ | तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य मकारको मध्यमें देखनेके बाद उन पुरुषश्रेष्ठ विष्णुने उसके ऊपर |
| तुरीयातीतममृतं निष्कलं निरुपप्लवम्।<br>निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम्॥ ५४ | तुरीयातीत, अमृतरूप, कलारहित, विकारशून्य, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यस्वरूप, बाह्य तथा आभ्यन्तरसे रहित, |
| सबाह्याभ्यन्तरं चैव सबाह्याभ्यन्तरस्थितम्।<br>आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यापि कारणम्॥ ५५ | बाह्य तथा आभ्यन्तरसे युक्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों रूपोंमें स्थित, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा आनन्दके भी कारणस्वरूप शुद्ध स्फटिकके सदृश प्रकाशमान प्रभुको देखा॥ ५२—५५॥ |
| मात्रास्तिस्रस्त्वर्धमात्रं नादाख्यं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>ऋग्यजुःसामवेदा वै मात्रारूपेण माधवः॥ ५६ | अकार, उकार और मकाररूप तीन मात्राएँ तथा बिन्दुरूप अर्धमात्रास्वरूपवाला प्रणव ही नाद कहलाता है और वही ब्रह्मसंज्ञावाला है। ऋक्-यजुः तथा सामवेद उन तीनों मात्राओंके रूपमें विष्णु ही हैं॥ ५६॥ |
| वेदशब्दैभ्य एवेशं विश्वात्मानमचिन्तयत्।<br>तदाभवदृषिर्वेद ऋषेः सारतमं शुभम्॥ ५७ | उसी वेदरूप शब्दके द्वारा विष्णुने विश्वात्मा |
| [ पूर्वभाग | श्रीलिङ्गमहापुराण | ७८ ] | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान् परमेश्वरम्। | ईश्वर शिवका चिन्तन किया। उसी समयसे अतीन्द्रिय-दर्शक, परम-तत्त्वरूप कल्याणकारी वेद हुआ और उसी ऋषि (वेद)-से विष्णुने परमेश्वर शिवको जाना॥ ५७^{१/२} ॥ |
| देव उवाच<br>चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ॥ ५८<br>अप्राप्य तं निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः।<br>एकाक्षरेण तद्वाच्यमृतं परमकारणम्॥ ५९<br>सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम्।<br>एकाक्षरादकाराख्यो भगवान् कनकाण्डजः॥ ६० | देव (ब्रह्मा) बोले—वाणी भी मनके साथ जिन्हें प्राप्त न करके लौट आती है, उन चिन्तारहित भगवान् रुद्रका वाचक एकाक्षर प्रणव ही है और यही एकाक्षर प्रणव उस सृष्टिके परम कारणरूप, सत्य-आनन्द तथा अमृतरूप परात्पर परम ब्रह्मका भी वाचक है*॥ ५८-५९^{१/२}॥ |
| एकाक्षरादुकाराख्यो हरिः परमकारणम्।<br>एकाक्षरान्मकाराख्यो भगवान्नीललोहितः॥ ६१ | उसी एकाक्षर प्रणवसे अकारसंज्ञक भगवान् ब्रह्मा, उकारसंज्ञक परमकारणस्वरूप विष्णु तथा मकारसंज्ञक परमेश्वर नीललोहितका प्रादुर्भाव हुआ है॥ ६०-६१॥ |
| सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः।<br>मकाराख्यस्तयोर्नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् ॥ ६२ | अकारसंज्ञक ब्रह्मा सृष्टिके निर्माता, उकारसंज्ञक विष्णु मोह करनेवाले तथा मकारसंज्ञक शिव उन दोनों ब्रह्मा तथा विष्णुपर सदा अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६२॥ |
| मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीजमुच्यते।<br>उकाराख्यो हरियोंनिः प्रधानपुरुषेश्वरः॥ ६३ | मकाररूप भगवान् शिव बीजवान्, अकाररूप ब्रह्मा बीज तथा उकाररूप प्रधानपुरुषेश्वर विष्णु योनि कहे जाते हैं॥ ६३॥ |
| बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः।<br>बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः॥ ६४ | नादरूप महेश्वर शिव ही स्वयं बीजी, बीज तथा योनि—तीनों हैं। वे बीजीरूप महेश्वर स्वेच्छासे अपनेको विभाजित करके प्रतिष्ठित हैं॥ ६४॥ |
| अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः।<br>उकारयोनौ निक्षिप्तमवर्धत समन्ततः॥ ६५<br>सौवर्णमभवच्चाण्डमावेष्ट्याद्यं तदक्षरम्।<br>अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम्॥ ६६ | इन बीजीरूप परमेश्वर शिवके लिङ्गसे अकाररूप बीज (ब्रह्मा), उकाररूप योनि (विष्णु)-में गिरकर चारों ओर वृद्धिको प्राप्त होने लगा और वह फिर स्वर्णका अण्ड हो गया। इसके बाद एकाक्षर प्रणवको आदि-अन्तसे आवेष्टित करके वह दिव्य अण्ड बहुत वर्षोंतक जलमें स्थित रहा॥ ६५-६६॥ |
| ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम्।<br>अण्डमप्सु स्थितं साक्षादाद्याख्येनेश्वरेण तु॥ ६७ | तदनन्तर हजार वर्षोंके बाद साक्षात् आदिरूप परमेश्वरने जलमें स्थित उस अजोद्भूत अण्डको दो भागोंमें कर दिया॥ ६७॥ |
| तस्याण्डस्य शुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम्।<br>जज्ञे यद् द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा॥ ६८ | उस अण्डके ऊर्ध्वस्थित हेममय पवित्र कपालसे आकाश तथा नीचेके भागसे पाँच लक्षणोंसे सम्पन्न पृथ्विकी उत्पत्ति हुई॥ ६८॥ |
* यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। (तैत्ति० २।४।१)
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तस्मादण्डोद्भवो जज्ञे त्वकाराख्यश्चतुर्मुखः।<br>स स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः॥ ६९॥ | उसी अण्डसे अकारसंज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। अतएव वही लिङ्गरूप प्रणव सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाला है तथा वही प्रणव अकार-उकार-मकाररूप तीन प्रकारका ईश्वर है॥ ६९॥ |
| एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः।<br>यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम्॥ ७०<br><br>एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुः श्रुतयस्तदा।<br>ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छ्रुतिसम्भवैः॥ ७१ | इस प्रकार वह प्रणव ओम्-ओमरूप ब्रह्म कहा गया है—ऐसा यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ मनीषियोंने कहा है और उन यजुर्वेद-ज्ञाताओंके वचन सुनकर उसे ऋग्वेदकी ऋचाओं तथा साममन्त्रोंने भी आदरपूर्वक स्वीकार किया है और इसी तरह सभी श्रुतियोंने उसी 'ओम्' को सदा हे हरे! हे ब्रह्मन्! के रूपमें सम्बोधित किया है॥ ७०½॥<br><br>इस वेद-वाक्य आदिसे शिवको यथावत् जानकर हम दोनों वैदिक मन्त्रोंसे महोदय देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे॥ ७१½॥ |
| मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम्।<br>आवयोः स्तुतिसन्तुष्टो लिङ्गे तस्मिनिरञ्जनः॥ ७२ | हम दोनोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर मायाके आवरणसे रहित महेश्वर दिव्य शब्दमय रूप धारणकर हँसते हुए उस लिङ्गमें प्रकट हुए॥ ७२½॥ |
| दिव्यं शब्दमयं रूपमास्थाय प्रहसन् स्थितः।<br>अकारस्तस्य मूर्द्धा तु ललाटं दीर्घमुच्यते॥ ७३<br><br>इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम्।<br>उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाममुच्यते॥ ७४<br><br>ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः।<br>वामं कपोलमॄकारो लॢलॄ नासापुटे उभे॥ ७५<br><br>एकारमोष्ठमूर्ध्वञ्च ऐकारस्त्वधरो विभोः।<br>ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात्॥ ७६<br><br>अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्च हस्तानि दक्षिणे॥ ७७<br><br>चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तानि वामतः।<br>टादिपञ्चाक्षरं पादस्तादिपञ्चाक्षरं तथा॥ ७८<br><br>पकारमुदरं तस्य फकारः पार्श्वमुच्यते।<br>बकारो वामपार्श्वं वै भकारं स्कन्धमस्य तत्॥ ७९<br><br>मकारं हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः।<br>यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः॥ ८०<br><br>हकार आत्मरूपं वै क्षकारः क्रोध उच्यते।<br>तं दृष्ट्वा उमया सार्द्धं भगवन्तं महेश्वरम्॥ ८१ | अकार उनका मस्तक तथा दीर्घ (आकार) उनका ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र, ईकार बायाँ नेत्र, उकार दाहिना कान, ऊकार बायाँ कान, ऋकार उन परमेष्ठी महेश्वरका दायाँ कपोल, ॠकार उनका बायाँ कपोल, लृ तथा लॄ क्रमशः उनके दाहिने तथा बायें—दोनों नासापुट, एकार ऊपरी ओष्ठ, ऐकार उन प्रभुका नीचेका ओष्ठ, ओकार तथा औकार क्रमशः ऊपर तथा नीचेकी दन्त-पंक्तियाँ, अं तथा अः उन धीमान् देवदेवके क्रमशः ऊपर तथा नीचेके तालु, ककार आदि पाँच अक्षर (क, ख, ग, घ, ङ) उनके दाहिनी ओरके पाँच हाथ, इसी प्रकार चकार आदि पाँच अक्षर बायीं ओरके पाँच हाथ, टकार आदि पाँच अक्षर दायाँ पैर, तकार आदि पाँच अक्षर बायाँ पैर, पकार उन परमेश्वरका उदर, फकार दाहिना पार्श्व, बकार बायाँ पार्श्व, भकार उनका स्कन्ध, मकार परम योगी महादेव शंकरका हृदय, यकारसे लेकर सकारपर्यन्त सात वर्ण (य, र, ल, व, श, ष, स) उन प्रभुके सातों धातु*, हकार उनकी आत्मा तथा क्षकार उनका क्रोध कहा गया है॥ ७३–८०½॥ |
* रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—ये सात शरीरस्थ धातुएँ हैं।
८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| प्रणम्य भगवान् विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः।<br>ॐकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम्॥ ८२<br><br>शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम्।<br>मेधाकरमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम्॥ ८३<br><br>गायत्रीप्रभवं मन्त्रं हरितं वश्यकारकम्।<br>चतुर्विंशति वर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम्॥ ८४<br><br>अथर्वमसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम्।<br>अभिचारिकमत्यर्थं त्रयस्त्रिंशच्छुभाक्षरम्॥ ८५<br><br>यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चत्रिंशच्छुभाक्षरम्।<br>कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा॥ ८६<br><br>त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लोहितम्।<br>सामोद्भवं जगत्याद्यं वृद्धिसंहारकारणम्॥ ८७<br><br>वर्णाः षडधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु।<br>पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान् हरिः॥ ८८ | उमाके साथ उन भगवान् महेश्वरको देखकर पुनः उन्हें प्रणाम करके जब भगवान् विष्णुने ऊपरकी ओर देखा तब उन्हें ॐकारसे उत्पन्न, पाँच कलाओंसे युक्त, बुद्धिविवर्धक तथा सभी धर्म-अर्थको सिद्ध करनेवाला शुद्ध स्फटिक-तुल्य अत्यन्त शुभ्र तथा अड़तीस शुभ अक्षरोंवाला पवित्र मन्त्र (ईशानः सर्वविद्यानाम् ०)¹ दृष्टिगोचर हुआ। साथ ही गायत्रीसे उत्पन्न, चार कलाओंवाला, चौबीस अक्षरोंसे युक्त तथा वश्यकारक हरित वर्ण अत्युत्तम मन्त्र (तत्पुरुषाय विद्महे ०)²; अथर्ववेदसे उत्पन्न आठ कलाओंसे युक्त तैंतीस शुभ अक्षरोंवाला कृष्णवर्ण तथा अत्यन्त अभिचारिक अघोर-मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्य ०)³; यजुर्वेदसे प्रादुर्भूत, आठ कलाओंवाला, श्वेतवर्णवाला, शान्तिकारक पैंतीस अक्षरोंसे युक्त पवित्र सद्योजात मन्त्र (सद्योजातं प्रपद्यामि ०)⁴ एवं सामवेदसे उत्पन्न, रक्तवर्ण, बाल आदि तेरह कलाओंसे युक्त, जगत्का आदि स्वरूप तथा वृद्धि-संहारका कारणरूप छाछठ अक्षरोंवाला उत्तम मन्त्र (वामदेवाय नमो ०)⁵ दृष्टिगत हुए। इन पाँचों मन्त्रोंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुने इनका जप करना आरम्भ कर दिया॥ ८१—८८॥ | | अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम्।<br>ईशानमीशमुकुटं पुरुषास्यं पुरातनम्॥ ८९<br><br>अघोरहृदयं हृद्यं वामगुह्यं सदाशिवम्।<br>सद्यः पादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम्॥ ९०<br><br>विश्वतः पादवदनं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम्॥ ९१<br><br>तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्वरदमीश्वरम्॥ ९२ | तत्पश्चात् समस्त कलाओंकी कान्तिसे युक्त, ऋक्-यजुः-सामस्वरूप, ईशान मन्त्ररूप मुकुटवाले, तत्पुरुष मन्त्ररूप मुखवाले, अघोर मन्त्ररूप करुणामय हृदयवाले, वामदेव मन्त्र-रूप सदा कल्याणकर गुह्यस्थान-वाले तथा सद्योजात मन्त्ररूप चरणोंवाले, विशाल सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले, चारों ओर पैर-मुख-आँख धारण किये हुए, सृष्टि-पालन-संहारके कारणस्वरूप, पुरातन पुरुष महादेव ब्रह्माधिपति शिवको देखकर भगवान् विष्णु अभीष्ट स्तुतियोंसे उन वरदाता परमेश्वर ईशानका पुनः स्तवन करने लगे॥ ८९—९२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गोद्भवो नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गोद्भव' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥
१. ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥ (नारायणोपनिषद्)
२. तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (नारायणोपनिषद्)
३. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (नारायणोपनिषद्)
४. सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमोनमः। भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)
५. वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)
१८- विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य
अध्याय १८ ] विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य [ ८१
अठारहवाँ अध्याय
विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य
| विष्णुरुवाच | |
|---|---|
| एकाक्षराय रुद्राय अकारायात्मरूपिणे।<br>उकारायादिदेवाय विद्यादेहाय वै नमः॥ १ | भगवान् विष्णु बोले—अद्वितीय तथा नाशरहित प्रणवरूप रुद्रको नमस्कार है। अकाररूप परमात्मा तथा उकाररूप आदिदेव विद्यादेहको नमस्कार है॥ १॥ |
| तृतीयाय मकाराय शिवाय परमात्मने।<br>सूर्याग्निसोमवर्णाय यजमानाय वै नमः॥ २ | तीसरे मकाररूप परमात्मा शिव और सूर्य-अग्नि-चन्द्रवर्णवाले रुद्र तथा यजमानरूपवाले महादेवको नमस्कार है॥ २॥ |
| अग्नये रुद्ररूपाय रुद्राणां पतये नमः।<br>शिवाय शिवमन्त्राय सद्योजाताय वेधसे॥ ३ | रुद्ररूप अग्निको तथा रुद्रोंके पतिको नमस्कार है। शिवको, शिवमन्त्रको, सद्योजात-रूप वेधाको नमस्कार है॥ ३॥ |
| वामाय वामदेवाय वरदायामृताय ते।<br>अघोराय्यातिघोराय सद्योजाताय रंहसे॥ ४ | सुन्दर वामदेवको, वरदाताको तथा अमृतरूप आप शिवको नमस्कार है। अघोरको, अतिघोरको तथा वेगरूप सद्योजातको नमस्कार है॥ ४॥ |
| ईशानाय श्मशानाय अतिवेगाय वेगिने।<br>नमोऽस्तु श्रुतिपादाय ऊर्ध्वलिङ्गाय लिङ्गिने॥ ५ | ईशानको, श्मशान (काशीक्षेत्र)-को, अतिवेगशालीको, वेगवान्को, श्रुतिपाद (वेदोंसे ज्ञेय)-को, ऊर्ध्व लिङ्गको तथा लिङ्गीको नमस्कार है॥ ५॥ |
| हेमलिङ्गाय हेमाय वारिलिङ्गाय चाम्भसे।<br>शिवाय शिवलिङ्गाय व्यापिने व्योमव्यापिने॥ ६ | हेमलिङ्गको, हेमको, जललिङ्गको, जलको, शिवको, शिवलिङ्गको, व्यापीको तथा व्योममें व्याप्त रहनेवाले रुद्रको नमस्कार है॥ ६॥ |
| वायवे वायुवेगाय नमस्ते वायुव्यापिने।<br>तेजसे तेजसां भर्त्रे नमस्तेजोऽधिव्यापिने॥ ७ | वायुको, वायुवेगको तथा वायुव्यापीको नमस्कार है। तेजोंके भी तेज तथा तेजको पूर्णतः व्याप्त करनेवाले भरणकर्ता आप रुद्रको नमस्कार है॥ ७॥ |
| जलाय जलभूताय नमस्ते जलव्यापिने।<br>पृथिव्यै चान्तरिक्षाय पृथिवीव्यापिने नमः॥ ८ | जलको, जलभूत तथा जलमें व्याप्त रहनेवाले आप शिवको नमस्कार है। पृथिवीको, अन्तरिक्षको तथा पृथ्वीमें व्याप्त रहनेवाले महेश्वरको नमस्कार है॥ ८॥ |
| शब्दस्पर्शस्वरूपाय रसगन्धाय गन्धिने।<br>गणाधिपतये तुभ्यं गुह्याद् गुह्यतमाय ते॥ ९ | शब्द तथा स्पर्शस्वरूपको, रस तथा गन्धस्वरूपको, गन्धीको, गणोंके अधिपतिको तथा गुह्यसे भी गुह्यतम आप रुद्रको नमस्कार है॥ ९॥ |
| अनन्ताय विरूपाय अनन्तानामयाय च।<br>शाश्वताय वरिष्ठाय वारिगर्भाय योगिने॥ १० | शेषरूप अनन्तको, गरुडरूप विरूपको, रोग-विकारशून्य अनन्त शिवको, शाश्वत, वरिष्ठ, वारिगर्भको तथा महायोगी महेश्वरको नमस्कार है॥ १०॥ |
| संस्थितायाम्भसां मध्ये आवयोर्मध्यवर्चसे।<br>गोप्त्रे हर्त्रे सदा कर्त्रे निधनायेश्वराय च॥ ११ | जलके मध्य स्थित रहनेवाले, हम दोनों (विष्णु तथा ब्रह्मा)-के मध्य प्रकाशमान, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, |
८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| संहारकर्ता तथा मृत्युस्वरूप ईश्वरको नमस्कार है॥ ११॥ | |
| अचेतनाय चिन्त्याय चेतनायासहारिणे।<br>अरूपाय सुरूपाय अनङ्गायाङ्गहारिणे॥ १२ | चित्तजन्य ज्ञानसे रहित, चिन्तनके योग्य, जीवोंके जन्म-मरणरूप कष्टोंका हरण करनेवाले, रूपरहित तथा सुन्दर रूपवाले, अंगोंसे रहित कामदेवरूप तथा अंगोंका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है॥ १२॥ |
| भस्मदिग्धशरीराय भानुसोमाग्निहेतवे।<br>श्वेताय श्वेतवर्णाय तुहिनाद्रिचराय च॥ १३<br><br>सुश्वेताय सुवक्त्राय नमः श्वेतशिखाय च।<br>श्वेतास्याय महास्याय नमस्ते श्वेतलोहित॥ १४ | भस्मसे भूषित शरीरवाले, सूर्य-चन्द्र-अग्निके कारणरूप, श्वेतरूप, श्वेत वर्णवाले, हिमाद्रिपर विचरण करनेवाले, अति श्वेतरूपसम्पन्न, सुन्दर वक्त्रवाले तथा श्वेत शिखाधारी, श्वेत मुखवाले, महान् मुखवाले हे श्वेतलोहित! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥ |
| सुताराय विशिष्टाय नमो दुन्दुभिने हर।<br>शतरूपविरूपाय नमः केतुमते सदा॥ १५ | सुन्दर कान्तिवाले, विशिष्टतासम्पन्न तथा दुन्दुभि धारण करनेवाले, सैकड़ों रूपोंवाले, विशिष्ट रूपवाले तथा केतुमान् हे हर! आपको सर्वदा नमस्कार है॥ १५॥ |
| ऋद्धिशोकविशोकाय पिनाकाय कपर्दिने।<br>विपाशाय सुपाशाय नमस्ते पाशनाशिने॥ १६ | ऋद्धि-शोक-विशोकस्वरूप, पिनाक धारण करनेवाले, जटाजूट धारण करनेवाले, बन्धनमुक्त, सुन्दर पाश धारण करनेवाले तथा पाशहर आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६॥ |
| सुहोत्राय हविष्याय सुब्रह्मण्याय सूरिणे।<br>सुमुखाय सुवक्त्राय दुर्दम्याय दमाय च॥ १७<br>कङ्काय कङ्करूपाय कङ्कणीकृतपन्नग।<br>सनकाय नमस्तुभ्यं सनातन सनन्दन॥ १८<br>सनत्कुमार सारङ्गमारणाय महात्मने।<br>लोकाक्षिणे त्रिधामाय नमो विरजसे सदा॥ १९ | हे भुजंगरूप कंकण (कंगन) धारण करनेवाले! आप श्रेष्ठ यजनकर्ता, हविष्यरूप, सुब्रह्मण्य, महाविद्या-सम्पन्न, सुन्दर मुखवाले, शुभ वक्त्रवाले, दुर्दमनीय, दमन करनेवाले, कंक (कपटद्विजरूप), कंकरूप (यम-स्वरूप)-को नमस्कार है। आप सनकको नमस्कार है। हे सनातनरूप! हे सनन्दनरूप! हे सनत्कुमाररूप! पशु-पक्षियोंको मारनेके लिये किरातरूप! महात्मा, संसारके नेत्ररूप, तीन धामोंवाले तथा आप विरजको सदा नमस्कार है॥ १७-१९॥ |
| शङ्खपालाय शङ्खाय रजसे तमसे नमः।<br>सारस्वताय मेघाय मेघवाहन ते नमः॥ २० | शंखपाल, शंखरूप, रज तथा तम गुणोंसे युक्त शिवको नमस्कार है। हे मेघवाहन! आप मेघरूप तथा सारस्वतको नमस्कार है॥ २०॥ |
| सुवाहाय विवाहाय विवादवरदाय च।<br>नमः शिवाय रुद्राय प्रधानाय नमो नमः॥ २१ | भलीभाँति सबको वहन करनेवाले, विशिष्ट वाहनवाले, वाद (तर्क-वितर्क)-से रहित भक्तोंको वर देनेवाले, प्रधानरूप, कल्याणप्रद रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २१॥ |
| त्रिगुणाय नमस्तुभ्यं चतुर्व्यूहात्मने नमः।<br>संसाराय नमस्तुभ्यं नमः संसारहेतवे॥ २२ | तीन गुणोंवाले आपको नमस्कार है। चतुर्व्यूहरूप आपको नमस्कार है। संसारस्वरूप तथा संसारके कारण-रूप आपको बार-बार नमस्कार है॥ २२॥ |
अध्याय १८] विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति तथा उसका माहात्म्य ८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मोक्षाय मोक्षरूपाय मोक्षकर्त्रे नमो नमः।<br>आत्मने ऋषये तुभ्यं स्वामिने विष्णवे नमः॥ २३ | मोक्ष, मोक्षरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आत्मास्वरूप, ऋषि, स्वामी तथा व्यापक शिवको नमस्कार है॥ २३॥ |
| नमो भगवते तुभ्यं नागानां पतये नमः।<br>ओङ्काराय नमस्तुभ्यं सर्वज्ञाय नमो नमः॥ २४ | आप भगवान्को नमस्कार है। आप सर्पोंके पतिको नमस्कार है। आप ओंकारको नमस्कार है। सर्वज्ञको बार-बार नमस्कार है॥ २४॥ |
| सर्वाय च नमस्तुभ्यं नमो नारायणाय च।<br>नमो हिरण्यगर्भाय आदिदेवाय ते नमः॥ २५ | आप सर्व (पूर्णस्वरूप)-को नमस्कार है और नारायणको नमस्कार है। हिरण्यगर्भको नमस्कार है। आप आदिदेवको नमस्कार है॥ २५॥ |
| नमोस्त्वजाय पतये प्रजानां व्यूहहेतवे।<br>महादेवाय देवानामीश्वराय नमो नमः॥ २६ | अज, प्रजापति, व्यूहहेतु, महादेव तथा देवताओंके ईश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २६॥ |
| शर्वाय च नमस्तुभ्यं सत्याय शमनाय च।<br>ब्रह्मणे चैव भूतानां सर्वज्ञाय नमो नमः॥ २७ | आप शर्वको नमस्कार है। सत्यरूप, शान्तिरूप, ब्रह्मस्वरूप तथा सर्वज्ञाताको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २७॥ |
| महात्मने नमस्तुभ्यं प्रज्ञारूपाय वै नमः।<br>चितये चितिरूपाय स्मृतिरूपाय वै नमः॥ २८ | आप महात्माको नमस्कार है। आप प्रज्ञारूपको नमस्कार है। चिति, चितिरूप तथा स्मृतिरूप आपको नमस्कार है॥ २८॥ |
| ज्ञानाय ज्ञानगम्याय नमस्ते संविदे सदा।<br>शिखराय नमस्तुभ्यं नीलकण्ठाय वै नमः॥ २९ | आप ज्ञानरूप, ज्ञानगम्य तथा चैतन्यरूपको सर्वदा नमस्कार है। आप शिखरको नमस्कार है तथा नीलकण्ठको नमस्कार है॥ २९॥ |
| अर्धनारीशरीराय अव्यक्ताय नमो नमः।<br>एकादशविभेदाय स्थाणवे ते नमः सदा॥ ३० | अर्धनारीका शरीर धारण करनेवाले तथा अव्यक्तको बार-बार नमस्कार है। ग्यारह रूपोंमें परिवर्तित होनेवाले आप स्थाणुको सदा नमस्कार है॥ ३०॥ |
| नमः सोमाय सूर्याय भवाय भवहारिणे।<br>यशस्कराय देवाय शङ्करायेश्वराय च॥ ३१ | सोम, सूर्य, भव, भवहारी, यशस्कर, देव, शंकर तथा ईश्वरको नमस्कार है॥ ३१॥ |
| नमोऽम्बिकाधिपतये उमायाः पतये नमः।<br>हिरण्यबाहवे तुभ्यं नमस्ते हेमरेतसे॥ ३२ | पार्वतीपतिको नमस्कार है। उमापतिको नमस्कार है। आप हिरण्यबाहु तथा सुवर्णवीर्यको नमस्कार है॥ ३२॥ |
| नीलकेशाय वित्ताय शितिकण्ठाय वै नमः।<br>कपर्दिने नमस्तुभ्यं नागाङ्गाभरणाय च॥ ३३ | नीलकेश, वित्त तथा शितिकण्ठको नमस्कार है। कपर्दी (जटाजूट धारण करनेवाले) तथा अंगोंके आभूषण-रूपमें सर्पोंको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३३॥ |
| वृषारूढाय सर्वस्य हर्त्रे कर्त्रे नमो नमः।<br>वीररामातिरामाय रामनाथाय ते विभो॥ ३४ | वृषारूढ़ (बैलपर सवार होनेवाले) तथा सभीके कर्ता और हर्ताको बार-बार नमस्कार है। हे विभो! आप वीरराम, अतिराम तथा रामनाथको नमस्कार है॥ ३४॥ |
| नमो राजाधिराजाय राज्ञामधिगताय ते।<br>नमः पालाधिपतये पालाशाकृन्तते नमः॥ ३५ | राजाओंके भी अधिराज तथा राजाओंके द्वारा प्राप्त |
१९- महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ
८४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| नमः केयूरभूषाय गोपते ते नमो नमः।<br>नमः श्रीकण्ठनाथाय नमो लिकुचपाणये॥ ३६ | किये जानेयोग्य आपको नमस्कार है। पालाशाकृन्त एवं पालाधिपतिको नमस्कार है॥ ३५॥<br>आभूषणके रूपमें सर्पका बाजूबन्द धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। हे गोपते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। श्रीकंठनाथको नमस्कार है। श्रीदण्डपाणिको नमस्कार है॥ ३६॥ |
|---|---|
| भुवनेशाय देवाय वेदशास्त्र नमोऽस्तु ते।<br>सारङ्गाय नमस्तुभ्यं राजहंसाय ते नमः॥ ३७ | हे वेदशास्त्रस्वरूप! आप भुवनेशदेवको नमस्कार है। आप सारंग तथा राजहंसको नमस्कार है॥ ३७॥ |
| कनकाङ्गदहाराय नमः सर्पोपवीतिने।<br>सर्पकुण्डलमालाय कटिसूत्रीकृताहिने॥ ३८ | धतूरेका बाजूबन्द तथा हार धारण करनेवाले एवं सर्पका जनेऊ धारण करनेवाले, सर्पोंका कुण्डल तथा माला पहननेवाले, सर्पका कटिसूत्र (करधनी) धारण करनेवाले, वेदगर्भ, गर्भरूप तथा विश्वगर्भ हे शिव! आपको नमस्कार है॥ ३८^{१}/_२॥ |
| वेदगर्भाय गर्भाय विश्वगर्भाय ते शिव। | |
| ब्रह्मोवाच<br>विरामेति संस्तुत्वा ब्रह्मणा सहितो हरिः॥ ३९ | ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार [मुझ] ब्रह्माके साथ विष्णुभगवान् स्तुति करके शान्त हो गये। पुण्य प्रदान करनेवाले तथा सभी पापोंका नाश करनेवाले इस उत्तम स्तोत्रका जो प्राणी पाठ करता है अथवा इसे वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह पापकर्ममें लिप्त रहनेपर भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। अतएव सभी पापोंकी शुद्धिहेतु मनुष्यको विष्णुद्वारा कहे गये इस स्तोत्रका नित्य जप करना चाहिये, पाठ करना चाहिये तथा इसे धर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाना चाहिये॥ ३९—४२॥ |
| एतत्स्तोत्रवरं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छ्रावयेद्वापि ब्राह्मणान् वेदपारगान्॥ ४० | |
| स याति ब्रह्मणो लोके पापकर्मरतोऽपि वै।<br>तस्माज्जपेतद्वेनित्यं श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छुभान्॥ ४१ | |
| सर्वपापविशुद्ध्यर्थं विष्णुना परिभाषितम्॥ ४२ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुस्तवो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुस्तव' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ
| सूत उवाच<br>अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ।<br>पश्यतां मां महादेवं भयं सर्वं विमुच्यताम्॥ १ | सूतजी बोले—तदनन्तर महादेवजीने कहा—हे श्रेष्ठ देवद्वय (ब्रह्मा, विष्णु)! मैं आप दोनोंपर प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवका दर्शन करो और सभी प्रकारके भयका त्याग कर दो॥ १॥ |
|---|---|
| युवां प्रसूतौ गात्राभ्यां मम पूर्वं महाबलौ।<br>अयं मे दक्षिणे पार्श्वे ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २ | आप दोनों महाबली देवता पूर्वकालमें मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ये ब्रह्मा मेरे दक्षिण (दायें) अंगसे तथा विश्वात्मा और हृदयोद्भव |
अध्याय १९] महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वरप्रदान तथा लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ ८५
| वामे पार्श्वे च मे विष्णुर्विश्वात्मा हृदयोद्भवः।<br>प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्मि यथेप्सितम्॥ ३ | ये विष्णु मेरे बायें अंगसे उत्पन्न हुए हैं। मैं आप दोनोंपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। अतएव यथेच्छ वर माँगो; मैं उसे अभी दूँगा॥ २-३॥ | | एवमुक्त्वा तु तं विष्णुं कराभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श सुभागाभ्यां तु कृपया तु कृपानिधिः॥ ४ | इतना कहकर कृपानिधि परमेश्वर महादेवने अपने दोनों सुन्दर हाथोंसे प्रीतिपूर्वक उन विष्णुका स्पर्श किया॥ ४॥ | | ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>प्राह नारायणो नाथं लिङ्गस्थं लिङ्गवर्जितम्॥ ५ | तब लिङ्गमें विराजित तथा लिङ्गदेहशून्य स्वेच्छासे विग्रह धारण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे नारायण विष्णुने कहा॥ ५॥ | | यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ।<br>भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी॥ ६ | यदि आपके हृदयमें हमारे प्रति प्रीति-भाव उत्पन्न हुआ है और यदि हमें वरदान देना चाहते हैं, तो यही वर दीजिये कि आपके प्रति हम दोनोंकी सदा दृढ़ भक्ति बनी रहे॥ ६॥ | | देवः प्रदत्तवान् देवाः स्वात्मन्यव्यभिचारिणीम्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे चैव श्रद्धां शीतांशुभूषणः॥ ७ | हे देवताओ! चन्द्रमाको आभूषणस्वरूप धारण करनेवाले महादेवने ब्रह्मा तथा विष्णुको अपनी अचल श्रद्धा-भक्ति प्रदान की॥ ७॥ | | जानुभ्यामवनीं गत्वा पुनर्नारायणः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी॥ ८ | पुनः जमीनपर घुटना टेककर प्रणाम करते हुए इन्द्रियजित् नारायण विष्णुने साक्षात् विश्वेश्वर महादेवसे अत्यन्त मधुरतासे कहा॥ ८॥ | | आवयोर्देवदेवेश विवादमतिशोभनम्।<br>इहागतो भवान् यस्माद्विवादशमनाय नौ॥ ९ | हे देवदेवेश! हम दोनोंका यह विवाद तो अत्यन्त मङ्गलकारी सिद्ध हुआ; क्योंकि हम दोनोंके इसी विवादको समाप्त करनेके निमित्त आप यहाँ प्रकट हुए हैं॥ ९॥ | | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम्।<br>प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटं स्मयन्॥ १० | उनका यह वचन सुनकर भगवान् शम्भुने दोनों हाथ जोड़े तथा सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए वहाँ स्थित विष्णुसे मुसकराकर पुनः कहा॥ १०॥ | | श्रीमहादेव उवाच<br>प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते।<br>वत्स वत्स हरे विष्णो पालयैतच्चराचरम्॥ ११ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पृथ्वीपते! उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारके कर्ता आप हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे हरे! हे विष्णो! आप इस चराचर जगत्का पालन कीजिये॥ ११॥ | | त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया।<br>सर्गर्क्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ १२ | हे विष्णो! मैं निष्कल परमेश्वर ही ब्रह्मा, विष्णु तथा भव (रुद्र) नामोंसे अलग-अलग तीन प्रकारके रूपोंमें सृजन, पालन तथा संहारके गुणोंसे युक्त हूँ॥ १२॥ | | सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम्।<br>पाद्मे भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः॥ १३ | हे विष्णो! आप मोहका त्याग करें और इन पितामहका पालन करें। ये पितामह पाद्म कल्पमें आपके पुत्र होंगे। | | तदा द्रक्ष्यसि मां चैवं सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मजः।<br>एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १४ | उस समय आप तथा आपके पुत्ररूप वे कमलोद्भव ब्रह्मा—दोनों लोग मेरा दर्शन प्राप्त करेंगे। |
२०- शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिव-माहात्म्यका कथन
| ८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तदाप्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।<br>लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः ॥ १५<br><br>लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः।<br>यस्तु लैङ्गं पठेन्नित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ ॥ १६<br><br>स याति शिवतां विप्रो नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ | ऐसा कहकर वे भगवान् महादेव वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३-१४॥<br><br>उसी समयसे लोकोंमें शिवलिङ्गके पूजनकी प्रसिद्धि व्याप्त हो गयी। लिङ्गवेदीके रूपमें महादेवी पार्वती तथा लिङ्गरूपमें साक्षात् महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ १५॥<br><br>हे देवताओ! समग्र जगत्को अपनेमें लय करनेके कारण यह लिङ्ग कहा गया है। जो विप्र शिवलिङ्गके समक्ष लिङ्ग-आख्यानका प्रतिदिन पाठ करता है, वह शिवत्वको प्राप्त हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १६-१७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुप्रबोधो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुप्रबोध' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिवमाहात्म्यका कथन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पाद्मे पुरा कल्पे ब्रह्मा पद्मोद्भवोऽभवत्।<br>भवं च दृष्टवांस्तेन ब्रह्मणा पुरुषोत्तमः ॥ १<br>एतत्सर्वं विशेषेण साम्प्रतं वक्तुमर्हसि।<br><br>सूत उवाच<br>आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम् ॥ २<br>मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः।<br>जीमूताम्भोऽम्बुजाक्षश्च किरीटी श्रीपतिर्हरिः ॥ ३<br>नारायणमुखोद्गीर्णसर्वात्मा पुरुषोत्तमः।<br>अष्टबाहुर्महावक्षा लोकानां योनिरुच्यते ॥ ४<br>किमप्यचिन्त्यं योगात्मा योगमास्थाय योगवित्।<br>फणासहस्रकलितं तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ५<br>महाभोगपतेर्भोगं साध्वास्तीर्य महोच्छ्रयम्।<br>तस्मिन् महति पर्यङ्के शेते चैकार्णवे प्रभुः ॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] प्राचीनकालमें पाद्म कल्पमें ब्रह्माजी कमलसे किस प्रकार जायमान हुए और पुरुषोत्तम विष्णुने उन ब्रह्माके साथ शिवका दर्शन कैसे किया? कृपया अब इन सब वृत्तान्तोंका आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— प्रलयके समय चारों ओर जल-ही-जल तथा घोर, घनीभूत अन्धकार व्याप्त था। उस प्रलयसागरके मध्य शंख-चक्र-गदा धारण किये, नील मेघके सदृश वर्णवाले, कमलके समान नेत्रवाले, मुकुट धारण किये, आठ भुजाओंवाले, विशाल वक्षःस्थलवाले, लोकोंकी योनि कहे जानेवाले, सभी जीवात्माएँ जिनके मुखसे निकली हैं—ऐसे योगात्मा तथा योगवित् सर्वात्मा नारायण पुरुषोत्तम लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु किसी अनिर्वचनीय योगमें स्थित होकर, हजार फणोंसे सुशोभित शेषनागके अप्रतिम ओजसम्पन्न, अति उन्नत तथा छायायुक्त फणरूप शय्याको भलीभाँति बिछाकर प्रलय-सागर-स्थित उस महान् पर्यंक (शेषशय्या)-पर शयन कर रहे थे॥ २–६॥ |
अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [ ८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं तत्र शयानेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आत्मारामेण क्रीडार्थं लीलयाक्लिष्टकर्मणा॥ ७<br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसन्निभम्।<br>वज्रदण्डं महोत्सेधं नाभ्यां सृष्टं तु पुष्करम्॥ ८ | इस प्रकार वहाँ शयन कर रहे गूढ़ रहस्योंवाले सर्वव्यापी आत्माराम विष्णुने अपनी क्रीड़ाके निमित्त अत्यन्त ऊँचे वज्रदण्डसे युक्त एक कमल, जो शतयोजन विस्तीर्ण तथा प्रखर सूर्यके समान था, अपनी नाभिसे लीलापूर्वक उत्पन्न किया॥ ७-८॥ |
| तस्यैव क्रीडमानस्य समीपं देवमीढुषः।<br>हेमगर्भाण्डजो ब्रह्मा रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः॥ ९<br>चतुर्वक्त्रो विशालाक्षः समागम्य यदृच्छया।<br>श्रिया युक्तेन दिव्येन सुशुभेन सुगन्धिना॥ १०<br>क्रीडमानं च पद्मेन दृष्ट्वा ब्रह्मा शुभेक्षणम्।<br>सविस्मयमथागम्य सौम्यसम्पन्नया गिरा॥ ११<br>प्रोवाच को भवाञ्छेते ह्याश्रितो मध्यमम्भसाम्। | कमलके साथ क्रीड़ारत उन देवश्रेष्ठ विष्णुके पास आकर हिरण्यगर्भ, अण्डज, सोनेके वर्णवाले, अतीन्द्रिय, चार मुखवाले तथा विशाल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शोभासम्पन्न, दिव्य, सुन्दर तथा सुगन्धित कमलके साथ सुन्दर नयनोंवाले विष्णुको खेलते हुए देखा। तत्पश्चात् उनके सन्निकट पहुँचकर ब्रह्माजीने विस्मयपूर्ण भावसे विनम्रतायुक्त वाणीमें उनसे पूछा—आप कौन हैं और इस समुद्रके मध्य आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं?॥ ९—११ १/२॥ |
| अथ तस्याच्युतः श्रुत्वा ब्रह्मणस्तु शुभं वचः॥ १२<br>उदतिष्ठत पर्यङ्काद्विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>प्रत्युवाचोत्तरं चैव कल्पे कल्पे प्रतिश्रयः॥ १३ | उन ब्रह्माका यह सुखद वचन सुनकर विष्णुजी पर्यंकसे उठकर बैठ गये और नेत्रोंमें प्रसन्नता भरकर उनके उत्तरमें कहने लगे कि मैं प्रत्येक कल्पमें इसी स्थानका आश्रय लेकर शयन करता हूँ॥ १२-१३॥ |
| कर्तव्यं च कृतं चैव क्रियते यच्च किञ्चन।<br>द्यौरन्तरिक्षं भूश्चैव परं पदमहं भुवः॥ १४ | जो कुछ भी किया जाना है, किया गया है और किया जा रहा है तथा स्वर्गलोक, आकाश, पृथ्वी एवं भुवर्लोक—इन सबका परम पद मैं ही हूँ॥ १४॥ |
| तमेवमुक्त्वा भगवान् विष्णुः पुनरथाब्रवीत्।<br>कस्त्वं खलु समायातः समीपं भगवान् कुतः॥ १५<br>क्व वा भूयश्च गन्तव्यं कश्च वा ते प्रतिश्रयः।<br>को भवान् विश्वमूर्तिर्वै कर्तव्यं किं च ते मया॥ १६ | उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने पुनः उनसे पूछा—ऐश्वर्यसम्पन्न आप कौन हैं तथा मेरे पास कहाँसे आये हैं? आप पुनः कहाँ जायँगे तथा आपका निवासस्थान कहाँ है? विश्वमूर्तिस्वरूप आप कौन हैं तथा मैं आपके लिये क्या करूँ?॥ १५-१६॥ |
| एवं ब्रुवन्तं वैकुण्ठं प्रत्युवाच पितामहः।<br>मायया मोहितः शम्भोरविज्ञाय जनार्दनम्॥ १७<br>मायया मोहितं देवमविज्ञातं महात्मनः।<br>यथा भवांस्तथैवाहमादिकर्ता प्रजापतिः॥ १८ | विष्णुके ऐसा कहनेपर महात्मा शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण भगवान् जनार्दनको पहचाने बिना पितामह ब्रह्मा उन्हीं शिवकी मायासे मोहको प्राप्त अविज्ञात विष्णुदेवसे कहने लगे, जिस प्रकार आप इस जगत्के आदिकर्ता तथा प्रजापति हैं, वैसे ही मैं भी हूँ॥ १७-१८॥ |
| सविस्मयं वचः श्रुत्वा ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>अनुज्ञातश्च ते नाथ वैकुण्ठो विश्वसम्भवः॥ १९<br>कौतूहलान्महायोगी प्रविष्टो ब्रह्मणो मुखम्। | जगत्के रचयिता ब्रह्माजीका यह विस्मयकारी वचन सुनकर और उनकी आज्ञा लेकर विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले योगी महायोगी विष्णुभगवान् कौतूहलवश ब्रह्माके मुखमें प्रविष्ट हो गये॥ १९ १/२॥ |
| इमानष्टादश द्वीपान् ससमुद्रान् सपर्वतान्॥ २०<br>प्रविश्य सुमहातेजाश्चातुर्वर्ण्यसमाकुलान्।<br>ब्रह्माण्डस्तम्बपर्यन्तं सप्तलोकान् सनातनान्॥ २१ | ब्रह्माजीके उदरमें प्रवेश करके वहाँपर अठारह द्वीपों, सभी समुद्रों, समस्त पर्वतों, ब्राह्मण आदि चार वर्णोंके जनसमूहों, सनातन सात लोकों तथा ब्रह्मासे |
| ८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणस्तूदरे दृष्ट्वा सर्वान् विष्णुर्महाभुजः।<br>अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा च पुनः पुनः॥ २२<br>अटित्वा विविधाँल्लोकान् विष्णुर्नानाविधाश्रयान्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते नान्तं हि ददृशे यदा॥ २३<br>तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।<br>नारायणो जगद्धाता पितामहमथाब्रवीत्॥ २४ | लेकर तृणपर्यन्त सभी स्थावर-जंगम पदार्थ देखकर महाभुज महातेजस्वी विष्णुभगवान् अत्यन्त विस्मित हुए। 'अहो! इनकी तपस्याका ऐसा प्रभाव'—ऐसा बार-बार कहते हुए विष्णुभगवान् उदरके अन्दर विविध लोकों तथा अनेक स्थानोंपर हजार वर्षोंतक भ्रमण करते रहे, किंतु जब उसका अन्त नहीं पा सके, तब वे शेषशायी जगदाधार नारायण उन ब्रह्माके मुखमार्गसे बाहर निकलकर उनसे कहने लगे॥ २०—२४॥ |
| भगवानादिरन्तश्च मध्यं कालो दिशो नभः।<br>नाहमन्तं प्रपश्यामि उदरस्य तवानघ॥ २५ | हे अनघ! आप भगवान् हैं। आप आदि, अन्त, मध्य, काल, दिशा, आकाश आदिसे युक्त हैं। मैं आपके उदरका अन्त नहीं देख पाया॥ २५॥ |
| एवमुक्त्वाब्रवीद्भूयः पितामहमिदं हरिः।<br>भगवानेवमेवाहं शाश्वतं हि ममोदरम्॥ २६<br>प्रविश्य लोकान् पश्यैताननौपम्यान् सुरोत्तम। | ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने ब्रह्मासे पुनः यह कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी इसी तरह भगवान् हूँ। अब आप भी मेरे शाश्वत उदरमें प्रवेश करके इन्हीं अनुपम लोकोंका दर्शन करें॥ २६ १/२॥ |
| ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च॥ २७<br>श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश पितामहः। | लक्ष्मीकान्त विष्णुकी यह आह्लादकारिणी वाणी सुनकर उन्हें प्रसन्न करते हुए ब्रह्माजी उनके उदरमें प्रविष्ट हुए॥ २७ १/२॥ |
| तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत्सत्यविक्रमः।<br>पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः॥ २८ | सत्य पराक्रमवाले ब्रह्माजीने विष्णुके उदरमें स्थित उन्हीं सब लोकोंको देखा और उसमें बहुत भ्रमण करनेके उपरान्त भी विष्णुदेवके उदरका अन्त नहीं पा सके॥ २८॥ |
| ज्ञात्वा गतिं तस्य पितामहस्य<br>द्वाराणि सर्वाणि विधाय विष्णुः।<br>विभुर्मनः कर्तुमियेष चाशु<br>सुखं प्रसुप्तोऽहमिति प्रचिन्त्य॥ २९ | सभी इन्द्रियद्वारोंको निरुद्ध करके मैं सुखपूर्वक सो लिया—ऐसा सोचकर और ब्रह्माजीकी गतिको जानकर सर्वव्यापक विष्णुजीने शीघ्र ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेकी इच्छा की॥ २९॥ |
| ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समीक्ष्य वै।<br>सूक्ष्मं कृत्वात्मनो रूपं नाभ्यां द्वारमविन्दत॥ ३०<br>पद्मसूत्रानुसारेण चान्वपश्यत्पितामहः।<br>उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः॥ ३१<br><br>विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवाञ्जगद्योनिः पितामहः॥ ३२ | तत्पश्चात् सभी द्वारोंको बन्द देखकर पितामहने अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके नाभिमें मार्ग पाया तथा पद्मसूत्र (कमलनाल)-के सहारे पुष्कर (कमल)-से स्वयंको बाहर निकाला, तदनन्तर पद्मगर्भके समान कान्तिवाले जगद्योनि स्वयम्भू पितामह भगवान् ब्रह्मा कमलके ऊपर शोभित हुए॥ ३०—३२॥ |
अध्याय २०] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतस्मिन्नन्तरे ताभ्यामेकैकस्य तु कृत्स्नशः।<br>वर्तमाने तु सङ्घर्षे मध्ये तस्यार्णवस्य तु॥ ३३<br><br>कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां प्रभुरीश्वरः।<br>शूलपाणिर्महादेवो हेमवीराम्बरच्छदः॥ ३४<br><br>अगच्छद्यत्र सोऽनन्तो नागभोगपतिर्हरिः। | उस समुद्रके मध्य ब्रह्मा और विष्णुमें अनेक प्रकारसे संघर्ष चल रहा था, उसी समय श्रेष्ठ स्वर्णके समान वस्त्रको धारण करनेवाले, अमेयात्मावाले, जीवोंके स्वामी शूलपाणि महादेव कहींसे वहाँपर पहुँच गये, जहाँ वे शेषशायी अनन्त विष्णुभगवान् थे॥ ३३-३४ १/२॥ |
| शीघ्रं विक्रमदस्तस्य पद्भ्यामाक्रान्तपीडिताः॥ ३५<br><br>उद्भूतास्तूर्णामाकाशे पृथुलास्तोयबिन्दवः।<br>अत्युष्णश्चातिशीतश्च वायुस्तत्र ववौ पुनः॥ ३६ | उनके शीघ्रतापूर्वक चलनेसे चरणोंके प्रहारसे संपीड़ित होकर समुद्र-जलकी बड़ी-बड़ी बूँदें आकाशतक पहुँचने लगीं और वहाँ कभी अत्यन्त गर्म तथा कभी अत्यन्त शीतल वायु बहने लगी॥ ३५-३६॥ |
| तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं ब्रह्मा विष्णुमभाषत।<br>अब्बिन्दवश्च शीतोष्णाः कम्पयन्त्यम्बुजं भृशम्॥ ३७<br><br>एतन्मे संशयं ब्रूहि किं वा त्वन्यच्चिकीर्षसि। | उस महान् आश्चर्यको देखकर ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि ये शीतल एवं उष्ण जलकी बूँदें इस कमलको अत्यधिक कम्पायमान कर रही हैं। इस विषयमें मेरी शंकाका समाधान कीजिये अथवा आप कुछ और करना तो नहीं चाहते?॥ ३७ १/२॥ |
| एतदेवंविधं वाक्यं पितामहमुखोद्गतम्॥ ३८<br><br>श्रुत्वाप्रतिमकर्मा हि भगवानसुरान्तकृत्।<br>किं नु खल्वत्र मे नाभ्यां भूतमन्यत्कृतालयम्॥ ३९<br><br>वदति प्रियमत्यर्थं मन्युश्चास्य मया कृतः।<br>इत्येवं मनसा ध्यात्वा प्रत्युवाचेदमुत्तरम्॥ ४० | ब्रह्माके मुखसे निर्गत इस प्रकारकी बात सुनकर अप्रतिम कर्मवाले असुरसंहारक भगवान् विष्णु सोचने लगे कि मेरी नाभिमें इस कौन-से जीवने अपना स्थान बना लिया है, जो इस तरह प्रेमपूर्वक मधुर-मधुर बोल रहा है; तथा मैंने इसके प्रति कहीं क्रोध किया है—ऐसा मनमें ध्यान करके विष्णुभगवान् यह उत्तर देने लगे॥ ३८-४०॥ |
| किमत्र भगवानद्य पुष्करे जातसम्भ्रमः।<br>किं मया च कृतं देव यन्मां प्रियमनुत्तमम्॥ ४१<br><br>भाषसे पुरुषश्रेष्ठ किमर्थं ब्रूहि तत्त्वतः। | आप भगवान् हैं और आपको यहाँ कमलके विषयमें व्याकुलता क्यों हो रही है? हे देव! मैंने कौन-सा श्रेष्ठ कार्य किया है, जो आप मुझसे प्रेमपूर्वक बोल रहे हैं? हे पुरुषश्रेष्ठ! इसका कारण मुझे यथार्थ रूपसे बताइये॥ ४१ १/२॥ |
| एवं ब्रुवाणं देवेशं लोकयात्रानुगं ततः॥ ४२ | लोकयात्राका अनुवर्तन करनेवाले तथा कमलकी आभाके समान नेत्रवाले देवेश्वर विष्णुके इस प्रकार बोलनेपर वेदनिधि प्रभु ब्रह्माने उनसे कहा॥ ४२ १/२॥ |
| प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>योऽसौ तवोदरं पूर्वं प्रविष्टोऽहं त्वदिच्छया॥ ४३<br><br>यथा ममोदरे लोकाः सर्वे दृष्टास्त्वया प्रभो।<br>तथैव दृष्टाः कात्स्न्येन मया लोकास्तवोदरे॥ ४४ | यह मैं आपकी ही इच्छासे पूर्वकालमें आपके उदरमें प्रविष्ट हुआ था। हे प्रभो! जिस प्रकार प्रथम मेरे उदरमें प्रवेश करके आपने सभी लोकोंको देखा था, उसी प्रकार मैंने भी आपके उदरमें उन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया है॥ ४३-४४॥ |
| ९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो वर्षसहस्रात्तु उपावृत्तस्य मेऽनघ।<br>त्वया मत्सरभावेन मां वशीकर्तुमिच्छता॥ ४५<br><br>आशु द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समन्ततः। | हे अनघ! वहाँ मैं हजार वर्षोंतक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद ईर्ष्याभावसे युक्त होकर आपने मुझे वशमें करनेकी इच्छासे चारों ओरसे सभी इन्द्रियद्वार शीघ्रतापूर्वक बन्द कर लिये॥ ४५ १/२ ॥ |
| ततो मया महाभाग सञ्चिन्त्य स्वेन तेजसा॥ ४६<br><br>लब्धो नाभिप्रदेशेन पद्मसूत्राद्विनिर्गमः।<br>मा भूत्ते मनसोऽल्पोऽपि व्याघातोऽयं कथञ्चन॥ ४७ | तदनन्तर हे महाभाग! मैं अपने तेजके प्रभावसे विवेकपूर्वक अतिसूक्ष्मरूप धारणकर आपके नाभि-स्थलसे कमलनालके सहारे बाहर निकल आया। इसके लिये आपके मनमें थोड़ा भी विषाद नहीं होना चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| इत्येषानुगतिर्विष्णो कार्याणामौपसर्पिणी।<br>यन्मयानन्तरं कार्यं ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ४८ | हे विष्णो! जो यह मेरा बाहर निकलना हुआ है, वह किसी विशेष कार्यके लिये है। अब आप मुझे यह बताइये कि मैं क्या करूँ?॥ ४८॥ |
| ततः परममेयात्मा हिरण्यकशिपो रिपुः।<br>अनवद्यां प्रियामिष्टां शिवां वाणीं पितामहात्॥ ४९<br><br>श्रुत्वा विगतमात्सर्य वाक्यमस्मै ददौ हरिः।<br>न ह्येवमीदृशं कार्यं मयाध्यक्षवसितं तव॥ ५० | तदनन्तर पितामह ब्रह्माकी प्रिय, मधुर, पवित्र तथा कल्याणमयी वाणी सुनकर हिरण्यकशिपुके शत्रु अप्रमेयात्मा भगवान् विष्णुने ईर्ष्यारहित होकर उनसे यह वचन कहा कि आपके नाभिकमलोद्भावरूप इस कार्यके लिये मैंने कोई प्रयास नहीं किया है॥ ४९-५०॥ |
| त्वां बोधयितुकामेन क्रीडापूर्वं यदृच्छया।<br>आशु द्वाराणि सर्वाणि घटितानि मयात्मनः॥ ५१<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यः पूज्यश्च मे भवान्।<br>सर्वं मर्षय कल्याण यन्मयापकृतं तव॥ ५२ | आपको बोध करानेकी इच्छासे मैंने तो क्रीड़ापूर्वक दैवयोगसे यों ही अपने सभी दरवाजे शीघ्र बन्द कर लिये थे। इसे आप कुछ भी अन्यथा न समझें। हे कल्याणकारक! आप मेरे मान्य तथा पूज्य हैं, अतएव मैंने आपका जो भी अपकार किया है, वह सब आप क्षमा करें॥ ५१-५२॥ |
| अस्मान् मयोह्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।<br>नाहं भवन्तं शक्नोमि सोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ५३ | हे प्रभो! मेरे द्वारा वहन किये जाते हुए आप अब कमलसे उतर आइये; क्योंकि आपके अत्यन्त गुरुतर तथा तेजसम्पन्न होनेके कारण मैं आपका भार सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५३॥ |
| स होवाच वरं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>पुत्रो भव ममारिघ्न मुदं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ५४ | तब ब्रह्माने कहा कि आप मुझसे वरदान माँगिये। इसपर विष्णु कहने लगे—हे प्रभो! आप कमलसे नीचे उतर आइये और यही वर दीजिये कि आप मेरे पुत्र बनेंगे। हे शत्रुदलन! इससे आपको भी अपार हर्ष प्राप्त होगा॥ ५४॥ |
| सद्भाववचनं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>स त्वं च नो महायोगी त्वमीड्यः प्रणवात्मकः॥ ५५<br><br>अद्यप्रभृति सर्वेशः श्वेतोष्णीषविभूषितः।<br>पद्मयोनिरिति ह्येवं ख्यातो नाम्ना भविष्यसि॥ ५६ | हे प्रभो! आप सद्भावनापूर्ण वचन बोलिये और कमलसे नीचे उतर आइये। आप महायोगी तथा प्रणवरूप हैं। आप हमारे पूज्य हैं। आजसे आप सबके |
अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव ९१
| पुत्रो मे त्वं भव ब्रह्मन् सप्तलोकाधिपः प्रभो।<br>ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने॥ ५७<br><br>एवं भवतु चेत्युक्त्वा प्रीतात्मा गतमत्सरः।<br>प्रत्यासन्नमथायान्तं बालार्कभं महाननम्॥ ५८ | स्वामी हैं तथा श्वेत पगड़ीसे सदा शोभायमान रहेंगे और इस प्रकार 'पद्मयोनि' नामसे लोकमें प्रसिद्ध होंगे। हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! आप मेरे पुत्र तथा सात लोकोंके स्वामी हों॥ ५५-५६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् किरीटधारी विष्णुसे 'ऐसा ही होगा' कहकर अर्थात् वर देकर ब्रह्माजी प्रसन्नतायुक्त तथा द्वेषरहित हो गये। इसके बाद पितामहने उदीयमान सूर्यकी आभाके समान विशाल मुखवाले तथा अत्यन्त अद्भुत रूपवाले शिवको अति समीप आते हुए देखकर भगवान् विष्णुसे कहा—॥ ५७-५८ १/२॥ | | भवमत्यद्भुतं दृष्ट्वा नारायणमथाब्रवीत्।<br>अप्रमेयो महावक्त्रो दंष्ट्री ध्वस्तशिरोरुहः॥ ५९<br><br>दशबाहुस्त्रिशूलाङ्को नयनैर्विश्वतः स्थितः।<br>लोकप्रभुः स्वयं साक्षाद्विकृतो मुञ्जमेखली॥ ६०<br><br>मेढ्रेणोर्ध्वेेन महता नर्दमानोऽतिभैरवम्।<br>कः खल्वेष पुमान् विष्णो तेजोरशिर्महाद्युतिः॥ ६१ | हे विष्णो! अप्रमेय, विशाल वक्त्रसम्पन्न, वाराहके समान दाढ़ोंवाला, फैले हुए केशोंवाला, दश भुजाओंवाला, त्रिशूलधारी, नेत्रोंसे हर जगह स्थित अर्थात् सर्वदर्शी, मुंजकी मेखला धारण किये, विकृत रूपवाला, उन्नत तथा विशाल मेढ्रवाला, अत्यन्त भयंकर ध्वनि करता हुआ साक्षात् लोक-प्रभुतुल्य, महान् कान्तिसम्पन्न तथा तेजपुंज-सा यह कौन प्राणी सभी दिशाओं तथा आकाशको व्याप्त करके इधर ही चला आ रहा है?॥ ५९—६१ १/२॥ | | व्याप्य सर्वा दिशो द्यां च इत एवाभिवर्तते।<br>तेनैवमुक्तो भगवान् विष्णुर्ब्रह्माणमब्रवीत्॥ ६२<br><br>पद्भ्यां तलनिपातेन यस्य विक्रमतोऽर्णवे।<br>वेगेन महताकाशोऽप्युत्थिताश्च जलाशयाः॥ ६३<br><br>स्थूलाद्भिर्विश्वतोऽत्यर्थं सिच्यसे पद्मसम्भव।<br>घ्राणजेन च वातेन कम्प्यमानं त्वया सह॥ ६४<br><br>दोधूयते महापद्मं स्वच्छन्दं मम नाभिजम्।<br>समागतो भवानीशो ह्यनादिश्चान्तकृत्प्रभुः॥ ६५<br><br>भवानहं च स्तोत्रेण उपतिष्ठाव गोध्वजम्।<br>ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्॥ ६६ | ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णुने उनसे कहा—इस सागरमें चलनेके कारण जिनके दोनों पैरोंके आघातसे आकाशमें महान् वेगसे जलाशय उठ रहे हैं, सभी ओर उठी हुई विशाल जल-बूँदोंसे आप सिक्त हो चुके हैं, जिनकी नासिकासे निकली वायुसे आपके साथ कम्पायमान यह महापद्म—जो मेरी नाभिसे उत्पन्न है, स्वच्छन्दतापूर्वक दोलायमान हो रहा है, वे ही आदि-अन्तरहित पार्वतीनाथ प्रभु शिव आ रहे हैं। अब हम दोनों मिलकर स्तोत्रके द्वारा इन वृषध्वज महादेवकी प्रार्थना करें॥ ६२—६५ १/२॥ | | भवान् नूनमात्मानं वेत्ति लोकप्रभुं विभुम्।<br>ब्रह्माणं लोककर्तारं मां न वेत्सि सनातनम्॥ ६७<br><br>को ह्यसौ शङ्करो नाम आवयोर्व्यतिरिच्यते।<br>तस्य तत्क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा हरिरभाषत॥ ६८ | तत्पश्चात् कमलकी आभाके समान नेत्रोंवाले भगवान् विष्णुसे ब्रह्माजीने कुपित होकर कहा कि लोकोंके स्वामी तथा सर्वव्यापी स्वयं अपनेको एवं जगत्के कर्ता मुझ सनातन ब्रह्माको आप नहीं जानते। हम दोनोंसे बढ़कर यह शंकर नामवाला कौन है?॥ ६६-६७ १/२॥ | | मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>महायोगेन्धनो धर्मो दुराधर्षो वरप्रदः॥ ६९ | उन ब्रह्माका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—हे कल्याणकारक! महात्मा शिवके लिये |
| ९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हेतुरस्याथ जगतः पुराणपुरुषोऽव्ययः।<br>बीजी खल्वेष बीजानां ज्योतिरेकः प्रकाशते॥ ७० | ऐसा निन्दित वचन मत बोलिये। ये महादेव साक्षात् धर्मस्वरूप हैं, अत्यन्त प्रचण्ड हैं, महायोग प्रदीप्त करनेवाले तथा वर प्रदान करनेवाले हैं॥ ६८-६९॥<br>ये शिव ही इस जगत्के कारण हैं। ये प्राचीन पुरुष हैं, समस्त बीजों अर्थात् कारणोंके मूल बीज अर्थात् परम कारण हैं, निर्विकार हैं एवं एकमात्र ज्योतिके रूपमें जगत्को प्रकाशित कर रहे हैं। जिस प्रकार बच्चे खिलौनोंसे खेलते हैं, उसी प्रकार ये महादेव स्वयं जगत्के साथ खेलते रहते हैं अर्थात् नानाविध लीलाएँ रचते रहते हैं॥ ७० १/२॥ |
| बालक्रीडनकैर्देवः क्रीडते शङ्करः स्वयम्।<br>प्रधानमव्ययो योनिरव्यक्तं प्रकृतिस्तमः॥ ७१<br><br>मम चैतानि नामानि नित्यं प्रसवधर्मिणः।<br>यः कः स इति दुःखार्तैर्दृश्यते यतिभिः शिवः॥ ७२ | प्रधान, अव्यय, योनि, अव्यक्त, प्रकृति, तम, नित्य आदि ये नाम मुझ प्रसवधर्मीके हैं और जिनके विषयमें आपने पूछा है कि ये कौन हैं, वे शिव जन्म-मरण आदि दुःखोंका भलीभाँति अनुभव करके वैराग्यको प्राप्त यतियोंद्वारा दृष्टिगत किये जाते हैं। ये शिव बीजवान् हैं, आप (ब्रह्मा) बीज हैं तथा सनातनरूप मैं (विष्णु) योनि हूँ॥ ७१-७२ १/२॥ |
| एष बीजी भवान् बीजमहं योनिः सनातनः।<br>स एवमुक्तो विश्वात्मा ब्रह्मा विष्णुमपृच्छत॥ ७३<br><br>भवान् योनिरहं बीजं कथं बीजी महेश्वरः।<br>एतन्मे सूक्ष्ममव्यक्तं संशयं छेत्तुमर्हसि॥ ७४ | विष्णुके इस प्रकार कहनेपर विश्वात्मा ब्रह्माने उनसे पूछा—आप योनि, मैं बीज तथा महेश्वर शिव बीजी (बीजवान्) किस प्रकार हैं? आप मेरे इस सूक्ष्म तथा अव्यक्त संदेहका निवारण करनेकी कृपा करें॥ ७३-७४॥ |
| ज्ञात्वा च विविधोत्पत्तिं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>इमं परमसादृश्यं प्रश्नमभ्यवदद्धरिः॥ ७५<br><br>अस्मान्महत्तरं भूतं गुह्यमन्यन्न विद्यते।<br>महतः परमं धाम शिवमध्यात्मिनां पदम्॥ ७६ | अनेक प्रकारसे लोकतन्त्री ब्रह्माकी उत्पत्ति जानकर भगवान् विष्णुने उनके इस परम निगूढ़ प्रश्नका उत्तर दिया। इन महादेवसे बढ़कर अन्य कोई भी गूढ़ तत्त्व नहीं है। महत्तत्त्वका सर्वोत्कृष्ट स्थान अध्यात्मज्ञानियोंका कल्याणमय पद है॥ ७५-७६॥ |
| द्विविधं चैवमात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः।<br>निष्कलस्तत्र योऽव्यक्तः सकलश्च महेश्वरः॥ ७७ | उन्होंने अपनेको सगुण तथा निर्गुण—इन दो रूपोंमें विभाजित किया। उनमें जो निर्गुण हैं, वे अव्यक्तरूपमें तथा जो सगुण हैं, वे महेश्वररूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ७७॥ |
| यस्य मायाविधिज्ञस्य अगम्यगहनस्य च।<br>पुरा लिङ्गोद्भवं बीजं प्रथमं त्वादिसर्गिकम्॥ ७८<br><br>मम योनौ समायुक्तं तद् बीजं कालपर्ययात्।<br>हिरण्मयमकूपारे योन्यामण्डमजायत॥ ७९ | प्राचीनकालमें सृष्टिके आदिमें मायाकी विधिको भी जाननेवाले, अगम्य तथा दुर्बोध उन्हीं महादेवके लिङ्गसे प्रादुर्भूत बीज सर्वप्रथम मेरी योनिमें गिरा। पुनः कालान्तरमें उस सागररूप योनिमें वह बीज स्वर्णके |