भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव ९१


| पुत्रो मे त्वं भव ब्रह्मन् सप्तलोकाधिपः प्रभो।<br>ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने॥ ५७<br><br>एवं भवतु चेत्युक्त्वा प्रीतात्मा गतमत्सरः।<br>प्रत्यासन्नमथायान्तं बालार्कभं महाननम्॥ ५८ | स्वामी हैं तथा श्वेत पगड़ीसे सदा शोभायमान रहेंगे और इस प्रकार 'पद्मयोनि' नामसे लोकमें प्रसिद्ध होंगे। हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! आप मेरे पुत्र तथा सात लोकोंके स्वामी हों॥ ५५-५६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् किरीटधारी विष्णुसे 'ऐसा ही होगा' कहकर अर्थात् वर देकर ब्रह्माजी प्रसन्नतायुक्त तथा द्वेषरहित हो गये। इसके बाद पितामहने उदीयमान सूर्यकी आभाके समान विशाल मुखवाले तथा अत्यन्त अद्भुत रूपवाले शिवको अति समीप आते हुए देखकर भगवान् विष्णुसे कहा—॥ ५७-५८ १/२॥ | | भवमत्यद्भुतं दृष्ट्वा नारायणमथाब्रवीत्।<br>अप्रमेयो महावक्त्रो दंष्ट्री ध्वस्तशिरोरुहः॥ ५९<br><br>दशबाहुस्त्रिशूलाङ्को नयनैर्विश्वतः स्थितः।<br>लोकप्रभुः स्वयं साक्षाद्विकृतो मुञ्जमेखली॥ ६०<br><br>मेढ्रेणोर्ध्वेेन महता नर्दमानोऽतिभैरवम्।<br>कः खल्वेष पुमान् विष्णो तेजोरशिर्महाद्युतिः॥ ६१ | हे विष्णो! अप्रमेय, विशाल वक्त्रसम्पन्न, वाराहके समान दाढ़ोंवाला, फैले हुए केशोंवाला, दश भुजाओंवाला, त्रिशूलधारी, नेत्रोंसे हर जगह स्थित अर्थात् सर्वदर्शी, मुंजकी मेखला धारण किये, विकृत रूपवाला, उन्नत तथा विशाल मेढ्रवाला, अत्यन्त भयंकर ध्वनि करता हुआ साक्षात् लोक-प्रभुतुल्य, महान् कान्तिसम्पन्न तथा तेजपुंज-सा यह कौन प्राणी सभी दिशाओं तथा आकाशको व्याप्त करके इधर ही चला आ रहा है?॥ ५९—६१ १/२॥ | | व्याप्य सर्वा दिशो द्यां च इत एवाभिवर्तते।<br>तेनैवमुक्तो भगवान् विष्णुर्ब्रह्माणमब्रवीत्॥ ६२<br><br>पद्भ्यां तलनिपातेन यस्य विक्रमतोऽर्णवे।<br>वेगेन महताकाशोऽप्युत्थिताश्च जलाशयाः॥ ६३<br><br>स्थूलाद्भिर्विश्वतोऽत्यर्थं सिच्यसे पद्मसम्भव।<br>घ्राणजेन च वातेन कम्प्यमानं त्वया सह॥ ६४<br><br>दोधूयते महापद्मं स्वच्छन्दं मम नाभिजम्।<br>समागतो भवानीशो ह्यनादिश्चान्तकृत्प्रभुः॥ ६५<br><br>भवानहं च स्तोत्रेण उपतिष्ठाव गोध्वजम्।<br>ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्॥ ६६ | ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णुने उनसे कहा—इस सागरमें चलनेके कारण जिनके दोनों पैरोंके आघातसे आकाशमें महान् वेगसे जलाशय उठ रहे हैं, सभी ओर उठी हुई विशाल जल-बूँदोंसे आप सिक्त हो चुके हैं, जिनकी नासिकासे निकली वायुसे आपके साथ कम्पायमान यह महापद्म—जो मेरी नाभिसे उत्पन्न है, स्वच्छन्दतापूर्वक दोलायमान हो रहा है, वे ही आदि-अन्तरहित पार्वतीनाथ प्रभु शिव आ रहे हैं। अब हम दोनों मिलकर स्तोत्रके द्वारा इन वृषध्वज महादेवकी प्रार्थना करें॥ ६२—६५ १/२॥ | | भवान् नूनमात्मानं वेत्ति लोकप्रभुं विभुम्।<br>ब्रह्माणं लोककर्तारं मां न वेत्सि सनातनम्॥ ६७<br><br>को ह्यसौ शङ्करो नाम आवयोर्व्यतिरिच्यते।<br>तस्य तत्क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा हरिरभाषत॥ ६८ | तत्पश्चात् कमलकी आभाके समान नेत्रोंवाले भगवान् विष्णुसे ब्रह्माजीने कुपित होकर कहा कि लोकोंके स्वामी तथा सर्वव्यापी स्वयं अपनेको एवं जगत्के कर्ता मुझ सनातन ब्रह्माको आप नहीं जानते। हम दोनोंसे बढ़कर यह शंकर नामवाला कौन है?॥ ६६-६७ १/२॥ | | मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>महायोगेन्धनो धर्मो दुराधर्षो वरप्रदः॥ ६९ | उन ब्रह्माका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—हे कल्याणकारक! महात्मा शिवके लिये |