श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 92, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 92
| ९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो वर्षसहस्रात्तु उपावृत्तस्य मेऽनघ।<br>त्वया मत्सरभावेन मां वशीकर्तुमिच्छता॥ ४५<br><br>आशु द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समन्ततः। | हे अनघ! वहाँ मैं हजार वर्षोंतक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद ईर्ष्याभावसे युक्त होकर आपने मुझे वशमें करनेकी इच्छासे चारों ओरसे सभी इन्द्रियद्वार शीघ्रतापूर्वक बन्द कर लिये॥ ४५ १/२ ॥ |
| ततो मया महाभाग सञ्चिन्त्य स्वेन तेजसा॥ ४६<br><br>लब्धो नाभिप्रदेशेन पद्मसूत्राद्विनिर्गमः।<br>मा भूत्ते मनसोऽल्पोऽपि व्याघातोऽयं कथञ्चन॥ ४७ | तदनन्तर हे महाभाग! मैं अपने तेजके प्रभावसे विवेकपूर्वक अतिसूक्ष्मरूप धारणकर आपके नाभि-स्थलसे कमलनालके सहारे बाहर निकल आया। इसके लिये आपके मनमें थोड़ा भी विषाद नहीं होना चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| इत्येषानुगतिर्विष्णो कार्याणामौपसर्पिणी।<br>यन्मयानन्तरं कार्यं ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ४८ | हे विष्णो! जो यह मेरा बाहर निकलना हुआ है, वह किसी विशेष कार्यके लिये है। अब आप मुझे यह बताइये कि मैं क्या करूँ?॥ ४८॥ |
| ततः परममेयात्मा हिरण्यकशिपो रिपुः।<br>अनवद्यां प्रियामिष्टां शिवां वाणीं पितामहात्॥ ४९<br><br>श्रुत्वा विगतमात्सर्य वाक्यमस्मै ददौ हरिः।<br>न ह्येवमीदृशं कार्यं मयाध्यक्षवसितं तव॥ ५० | तदनन्तर पितामह ब्रह्माकी प्रिय, मधुर, पवित्र तथा कल्याणमयी वाणी सुनकर हिरण्यकशिपुके शत्रु अप्रमेयात्मा भगवान् विष्णुने ईर्ष्यारहित होकर उनसे यह वचन कहा कि आपके नाभिकमलोद्भावरूप इस कार्यके लिये मैंने कोई प्रयास नहीं किया है॥ ४९-५०॥ |
| त्वां बोधयितुकामेन क्रीडापूर्वं यदृच्छया।<br>आशु द्वाराणि सर्वाणि घटितानि मयात्मनः॥ ५१<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यः पूज्यश्च मे भवान्।<br>सर्वं मर्षय कल्याण यन्मयापकृतं तव॥ ५२ | आपको बोध करानेकी इच्छासे मैंने तो क्रीड़ापूर्वक दैवयोगसे यों ही अपने सभी दरवाजे शीघ्र बन्द कर लिये थे। इसे आप कुछ भी अन्यथा न समझें। हे कल्याणकारक! आप मेरे मान्य तथा पूज्य हैं, अतएव मैंने आपका जो भी अपकार किया है, वह सब आप क्षमा करें॥ ५१-५२॥ |
| अस्मान् मयोह्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।<br>नाहं भवन्तं शक्नोमि सोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ५३ | हे प्रभो! मेरे द्वारा वहन किये जाते हुए आप अब कमलसे उतर आइये; क्योंकि आपके अत्यन्त गुरुतर तथा तेजसम्पन्न होनेके कारण मैं आपका भार सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५३॥ |
| स होवाच वरं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>पुत्रो भव ममारिघ्न मुदं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ५४ | तब ब्रह्माने कहा कि आप मुझसे वरदान माँगिये। इसपर विष्णु कहने लगे—हे प्रभो! आप कमलसे नीचे उतर आइये और यही वर दीजिये कि आप मेरे पुत्र बनेंगे। हे शत्रुदलन! इससे आपको भी अपार हर्ष प्राप्त होगा॥ ५४॥ |
| सद्भाववचनं ब्रूहि पद्मादवतर प्रभो।<br>स त्वं च नो महायोगी त्वमीड्यः प्रणवात्मकः॥ ५५<br><br>अद्यप्रभृति सर्वेशः श्वेतोष्णीषविभूषितः।<br>पद्मयोनिरिति ह्येवं ख्यातो नाम्ना भविष्यसि॥ ५६ | हे प्रभो! आप सद्भावनापूर्ण वचन बोलिये और कमलसे नीचे उतर आइये। आप महायोगी तथा प्रणवरूप हैं। आप हमारे पूज्य हैं। आजसे आप सबके |