भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २०] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [८९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतस्मिन्नन्तरे ताभ्यामेकैकस्य तु कृत्स्नशः।<br>वर्तमाने तु सङ्घर्षे मध्ये तस्यार्णवस्य तु॥ ३३<br><br>कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां प्रभुरीश्वरः।<br>शूलपाणिर्महादेवो हेमवीराम्बरच्छदः॥ ३४<br><br>अगच्छद्यत्र सोऽनन्तो नागभोगपतिर्हरिः।उस समुद्रके मध्य ब्रह्मा और विष्णुमें अनेक प्रकारसे संघर्ष चल रहा था, उसी समय श्रेष्ठ स्वर्णके समान वस्त्रको धारण करनेवाले, अमेयात्मावाले, जीवोंके स्वामी शूलपाणि महादेव कहींसे वहाँपर पहुँच गये, जहाँ वे शेषशायी अनन्त विष्णुभगवान् थे॥ ३३-३४ १/२॥
शीघ्रं विक्रमदस्तस्य पद्भ्यामाक्रान्तपीडिताः॥ ३५<br><br>उद्भूतास्तूर्णामाकाशे पृथुलास्तोयबिन्दवः।<br>अत्युष्णश्चातिशीतश्च वायुस्तत्र ववौ पुनः॥ ३६उनके शीघ्रतापूर्वक चलनेसे चरणोंके प्रहारसे संपीड़ित होकर समुद्र-जलकी बड़ी-बड़ी बूँदें आकाशतक पहुँचने लगीं और वहाँ कभी अत्यन्त गर्म तथा कभी अत्यन्त शीतल वायु बहने लगी॥ ३५-३६॥
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं ब्रह्मा विष्णुमभाषत।<br>अब्बिन्दवश्च शीतोष्णाः कम्पयन्त्यम्बुजं भृशम्॥ ३७<br><br>एतन्मे संशयं ब्रूहि किं वा त्वन्यच्चिकीर्षसि।उस महान् आश्चर्यको देखकर ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि ये शीतल एवं उष्ण जलकी बूँदें इस कमलको अत्यधिक कम्पायमान कर रही हैं। इस विषयमें मेरी शंकाका समाधान कीजिये अथवा आप कुछ और करना तो नहीं चाहते?॥ ३७ १/२॥
एतदेवंविधं वाक्यं पितामहमुखोद्गतम्॥ ३८<br><br>श्रुत्वाप्रतिमकर्मा हि भगवानसुरान्तकृत्।<br>किं नु खल्वत्र मे नाभ्यां भूतमन्यत्कृतालयम्॥ ३९<br><br>वदति प्रियमत्यर्थं मन्युश्चास्य मया कृतः।<br>इत्येवं मनसा ध्यात्वा प्रत्युवाचेदमुत्तरम्॥ ४०ब्रह्माके मुखसे निर्गत इस प्रकारकी बात सुनकर अप्रतिम कर्मवाले असुरसंहारक भगवान् विष्णु सोचने लगे कि मेरी नाभिमें इस कौन-से जीवने अपना स्थान बना लिया है, जो इस तरह प्रेमपूर्वक मधुर-मधुर बोल रहा है; तथा मैंने इसके प्रति कहीं क्रोध किया है—ऐसा मनमें ध्यान करके विष्णुभगवान् यह उत्तर देने लगे॥ ३८-४०॥
किमत्र भगवानद्य पुष्करे जातसम्भ्रमः।<br>किं मया च कृतं देव यन्मां प्रियमनुत्तमम्॥ ४१<br><br>भाषसे पुरुषश्रेष्ठ किमर्थं ब्रूहि तत्त्वतः।आप भगवान् हैं और आपको यहाँ कमलके विषयमें व्याकुलता क्यों हो रही है? हे देव! मैंने कौन-सा श्रेष्ठ कार्य किया है, जो आप मुझसे प्रेमपूर्वक बोल रहे हैं? हे पुरुषश्रेष्ठ! इसका कारण मुझे यथार्थ रूपसे बताइये॥ ४१ १/२॥
एवं ब्रुवाणं देवेशं लोकयात्रानुगं ततः॥ ४२लोकयात्राका अनुवर्तन करनेवाले तथा कमलकी आभाके समान नेत्रवाले देवेश्वर विष्णुके इस प्रकार बोलनेपर वेदनिधि प्रभु ब्रह्माने उनसे कहा॥ ४२ १/२॥
प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>योऽसौ तवोदरं पूर्वं प्रविष्टोऽहं त्वदिच्छया॥ ४३<br><br>यथा ममोदरे लोकाः सर्वे दृष्टास्त्वया प्रभो।<br>तथैव दृष्टाः कात्स्न्येन मया लोकास्तवोदरे॥ ४४यह मैं आपकी ही इच्छासे पूर्वकालमें आपके उदरमें प्रविष्ट हुआ था। हे प्रभो! जिस प्रकार प्रथम मेरे उदरमें प्रवेश करके आपने सभी लोकोंको देखा था, उसी प्रकार मैंने भी आपके उदरमें उन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया है॥ ४३-४४॥