श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 90, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 90
| ८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणस्तूदरे दृष्ट्वा सर्वान् विष्णुर्महाभुजः।<br>अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा च पुनः पुनः॥ २२<br>अटित्वा विविधाँल्लोकान् विष्णुर्नानाविधाश्रयान्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते नान्तं हि ददृशे यदा॥ २३<br>तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।<br>नारायणो जगद्धाता पितामहमथाब्रवीत्॥ २४ | लेकर तृणपर्यन्त सभी स्थावर-जंगम पदार्थ देखकर महाभुज महातेजस्वी विष्णुभगवान् अत्यन्त विस्मित हुए। 'अहो! इनकी तपस्याका ऐसा प्रभाव'—ऐसा बार-बार कहते हुए विष्णुभगवान् उदरके अन्दर विविध लोकों तथा अनेक स्थानोंपर हजार वर्षोंतक भ्रमण करते रहे, किंतु जब उसका अन्त नहीं पा सके, तब वे शेषशायी जगदाधार नारायण उन ब्रह्माके मुखमार्गसे बाहर निकलकर उनसे कहने लगे॥ २०—२४॥ |
| भगवानादिरन्तश्च मध्यं कालो दिशो नभः।<br>नाहमन्तं प्रपश्यामि उदरस्य तवानघ॥ २५ | हे अनघ! आप भगवान् हैं। आप आदि, अन्त, मध्य, काल, दिशा, आकाश आदिसे युक्त हैं। मैं आपके उदरका अन्त नहीं देख पाया॥ २५॥ |
| एवमुक्त्वाब्रवीद्भूयः पितामहमिदं हरिः।<br>भगवानेवमेवाहं शाश्वतं हि ममोदरम्॥ २६<br>प्रविश्य लोकान् पश्यैताननौपम्यान् सुरोत्तम। | ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने ब्रह्मासे पुनः यह कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी इसी तरह भगवान् हूँ। अब आप भी मेरे शाश्वत उदरमें प्रवेश करके इन्हीं अनुपम लोकोंका दर्शन करें॥ २६ १/२॥ |
| ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च॥ २७<br>श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश पितामहः। | लक्ष्मीकान्त विष्णुकी यह आह्लादकारिणी वाणी सुनकर उन्हें प्रसन्न करते हुए ब्रह्माजी उनके उदरमें प्रविष्ट हुए॥ २७ १/२॥ |
| तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत्सत्यविक्रमः।<br>पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः॥ २८ | सत्य पराक्रमवाले ब्रह्माजीने विष्णुके उदरमें स्थित उन्हीं सब लोकोंको देखा और उसमें बहुत भ्रमण करनेके उपरान्त भी विष्णुदेवके उदरका अन्त नहीं पा सके॥ २८॥ |
| ज्ञात्वा गतिं तस्य पितामहस्य<br>द्वाराणि सर्वाणि विधाय विष्णुः।<br>विभुर्मनः कर्तुमियेष चाशु<br>सुखं प्रसुप्तोऽहमिति प्रचिन्त्य॥ २९ | सभी इन्द्रियद्वारोंको निरुद्ध करके मैं सुखपूर्वक सो लिया—ऐसा सोचकर और ब्रह्माजीकी गतिको जानकर सर्वव्यापक विष्णुजीने शीघ्र ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेकी इच्छा की॥ २९॥ |
| ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि समीक्ष्य वै।<br>सूक्ष्मं कृत्वात्मनो रूपं नाभ्यां द्वारमविन्दत॥ ३०<br>पद्मसूत्रानुसारेण चान्वपश्यत्पितामहः।<br>उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः॥ ३१<br><br>विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवाञ्जगद्योनिः पितामहः॥ ३२ | तत्पश्चात् सभी द्वारोंको बन्द देखकर पितामहने अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके नाभिमें मार्ग पाया तथा पद्मसूत्र (कमलनाल)-के सहारे पुष्कर (कमल)-से स्वयंको बाहर निकाला, तदनन्तर पद्मगर्भके समान कान्तिवाले जगद्योनि स्वयम्भू पितामह भगवान् ब्रह्मा कमलके ऊपर शोभित हुए॥ ३०—३२॥ |