भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

अध्याय २० ] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव [ ८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं तत्र शयानेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आत्मारामेण क्रीडार्थं लीलयाक्लिष्टकर्मणा॥ ७<br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसन्निभम्।<br>वज्रदण्डं महोत्सेधं नाभ्यां सृष्टं तु पुष्करम्॥ ८इस प्रकार वहाँ शयन कर रहे गूढ़ रहस्योंवाले सर्वव्यापी आत्माराम विष्णुने अपनी क्रीड़ाके निमित्त अत्यन्त ऊँचे वज्रदण्डसे युक्त एक कमल, जो शतयोजन विस्तीर्ण तथा प्रखर सूर्यके समान था, अपनी नाभिसे लीलापूर्वक उत्पन्न किया॥ ७-८॥
तस्यैव क्रीडमानस्य समीपं देवमीढुषः।<br>हेमगर्भाण्डजो ब्रह्मा रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः॥ ९<br>चतुर्वक्त्रो विशालाक्षः समागम्य यदृच्छया।<br>श्रिया युक्तेन दिव्येन सुशुभेन सुगन्धिना॥ १०<br>क्रीडमानं च पद्मेन दृष्ट्वा ब्रह्मा शुभेक्षणम्।<br>सविस्मयमथागम्य सौम्यसम्पन्नया गिरा॥ ११<br>प्रोवाच को भवाञ्छेते ह्याश्रितो मध्यमम्भसाम्।कमलके साथ क्रीड़ारत उन देवश्रेष्ठ विष्णुके पास आकर हिरण्यगर्भ, अण्डज, सोनेके वर्णवाले, अतीन्द्रिय, चार मुखवाले तथा विशाल नेत्रोंवाले ब्रह्माने शोभासम्पन्न, दिव्य, सुन्दर तथा सुगन्धित कमलके साथ सुन्दर नयनोंवाले विष्णुको खेलते हुए देखा। तत्पश्चात् उनके सन्निकट पहुँचकर ब्रह्माजीने विस्मयपूर्ण भावसे विनम्रतायुक्त वाणीमें उनसे पूछा—आप कौन हैं और इस समुद्रके मध्य आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं?॥ ९—११ १/२॥
अथ तस्याच्युतः श्रुत्वा ब्रह्मणस्तु शुभं वचः॥ १२<br>उदतिष्ठत पर्यङ्काद्विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>प्रत्युवाचोत्तरं चैव कल्पे कल्पे प्रतिश्रयः॥ १३उन ब्रह्माका यह सुखद वचन सुनकर विष्णुजी पर्यंकसे उठकर बैठ गये और नेत्रोंमें प्रसन्नता भरकर उनके उत्तरमें कहने लगे कि मैं प्रत्येक कल्पमें इसी स्थानका आश्रय लेकर शयन करता हूँ॥ १२-१३॥
कर्तव्यं च कृतं चैव क्रियते यच्च किञ्चन।<br>द्यौरन्तरिक्षं भूश्चैव परं पदमहं भुवः॥ १४जो कुछ भी किया जाना है, किया गया है और किया जा रहा है तथा स्वर्गलोक, आकाश, पृथ्वी एवं भुवर्लोक—इन सबका परम पद मैं ही हूँ॥ १४॥
तमेवमुक्त्वा भगवान् विष्णुः पुनरथाब्रवीत्।<br>कस्त्वं खलु समायातः समीपं भगवान् कुतः॥ १५<br>क्व वा भूयश्च गन्तव्यं कश्च वा ते प्रतिश्रयः।<br>को भवान् विश्वमूर्तिर्वै कर्तव्यं किं च ते मया॥ १६उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने पुनः उनसे पूछा—ऐश्वर्यसम्पन्न आप कौन हैं तथा मेरे पास कहाँसे आये हैं? आप पुनः कहाँ जायँगे तथा आपका निवासस्थान कहाँ है? विश्वमूर्तिस्वरूप आप कौन हैं तथा मैं आपके लिये क्या करूँ?॥ १५-१६॥
एवं ब्रुवन्तं वैकुण्ठं प्रत्युवाच पितामहः।<br>मायया मोहितः शम्भोरविज्ञाय जनार्दनम्॥ १७<br>मायया मोहितं देवमविज्ञातं महात्मनः।<br>यथा भवांस्तथैवाहमादिकर्ता प्रजापतिः॥ १८विष्णुके ऐसा कहनेपर महात्मा शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण भगवान् जनार्दनको पहचाने बिना पितामह ब्रह्मा उन्हीं शिवकी मायासे मोहको प्राप्त अविज्ञात विष्णुदेवसे कहने लगे, जिस प्रकार आप इस जगत्के आदिकर्ता तथा प्रजापति हैं, वैसे ही मैं भी हूँ॥ १७-१८॥
सविस्मयं वचः श्रुत्वा ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>अनुज्ञातश्च ते नाथ वैकुण्ठो विश्वसम्भवः॥ १९<br>कौतूहलान्महायोगी प्रविष्टो ब्रह्मणो मुखम्।जगत्के रचयिता ब्रह्माजीका यह विस्मयकारी वचन सुनकर और उनकी आज्ञा लेकर विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले योगी महायोगी विष्णुभगवान् कौतूहलवश ब्रह्माके मुखमें प्रविष्ट हो गये॥ १९ १/२॥
इमानष्टादश द्वीपान् ससमुद्रान् सपर्वतान्॥ २०<br>प्रविश्य सुमहातेजाश्चातुर्वर्ण्यसमाकुलान्।<br>ब्रह्माण्डस्तम्बपर्यन्तं सप्तलोकान् सनातनान्॥ २१ब्रह्माजीके उदरमें प्रवेश करके वहाँपर अठारह द्वीपों, सभी समुद्रों, समस्त पर्वतों, ब्राह्मण आदि चार वर्णोंके जनसमूहों, सनातन सात लोकों तथा ब्रह्मासे