श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तदाप्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।<br>लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः ॥ १५<br><br>लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः।<br>यस्तु लैङ्गं पठेन्नित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ ॥ १६<br><br>स याति शिवतां विप्रो नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ | ऐसा कहकर वे भगवान् महादेव वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३-१४॥<br><br>उसी समयसे लोकोंमें शिवलिङ्गके पूजनकी प्रसिद्धि व्याप्त हो गयी। लिङ्गवेदीके रूपमें महादेवी पार्वती तथा लिङ्गरूपमें साक्षात् महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ १५॥<br><br>हे देवताओ! समग्र जगत्को अपनेमें लय करनेके कारण यह लिङ्ग कहा गया है। जो विप्र शिवलिङ्गके समक्ष लिङ्ग-आख्यानका प्रतिदिन पाठ करता है, वह शिवत्वको प्राप्त हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १६-१७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुप्रबोधो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुप्रबोध' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव, भगवान् शिवकी मायासे दोनोंका विमोहित होना, विष्णुद्वारा ब्रह्माके प्रति शिवमाहात्म्यका कथन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पाद्मे पुरा कल्पे ब्रह्मा पद्मोद्भवोऽभवत्।<br>भवं च दृष्टवांस्तेन ब्रह्मणा पुरुषोत्तमः ॥ १<br>एतत्सर्वं विशेषेण साम्प्रतं वक्तुमर्हसि।<br><br>सूत उवाच<br>आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम् ॥ २<br>मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः।<br>जीमूताम्भोऽम्बुजाक्षश्च किरीटी श्रीपतिर्हरिः ॥ ३<br>नारायणमुखोद्गीर्णसर्वात्मा पुरुषोत्तमः।<br>अष्टबाहुर्महावक्षा लोकानां योनिरुच्यते ॥ ४<br>किमप्यचिन्त्यं योगात्मा योगमास्थाय योगवित्।<br>फणासहस्रकलितं तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ५<br>महाभोगपतेर्भोगं साध्वास्तीर्य महोच्छ्रयम्।<br>तस्मिन् महति पर्यङ्के शेते चैकार्णवे प्रभुः ॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] प्राचीनकालमें पाद्म कल्पमें ब्रह्माजी कमलसे किस प्रकार जायमान हुए और पुरुषोत्तम विष्णुने उन ब्रह्माके साथ शिवका दर्शन कैसे किया? कृपया अब इन सब वृत्तान्तोंका आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— प्रलयके समय चारों ओर जल-ही-जल तथा घोर, घनीभूत अन्धकार व्याप्त था। उस प्रलयसागरके मध्य शंख-चक्र-गदा धारण किये, नील मेघके सदृश वर्णवाले, कमलके समान नेत्रवाले, मुकुट धारण किये, आठ भुजाओंवाले, विशाल वक्षःस्थलवाले, लोकोंकी योनि कहे जानेवाले, सभी जीवात्माएँ जिनके मुखसे निकली हैं—ऐसे योगात्मा तथा योगवित् सर्वात्मा नारायण पुरुषोत्तम लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु किसी अनिर्वचनीय योगमें स्थित होकर, हजार फणोंसे सुशोभित शेषनागके अप्रतिम ओजसम्पन्न, अति उन्नत तथा छायायुक्त फणरूप शय्याको भलीभाँति बिछाकर प्रलय-सागर-स्थित उस महान् पर्यंक (शेषशय्या)-पर शयन कर रहे थे॥ २–६॥ |