भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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९२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हेतुरस्याथ जगतः पुराणपुरुषोऽव्ययः।<br>बीजी खल्वेष बीजानां ज्योतिरेकः प्रकाशते॥ ७०ऐसा निन्दित वचन मत बोलिये। ये महादेव साक्षात् धर्मस्वरूप हैं, अत्यन्त प्रचण्ड हैं, महायोग प्रदीप्त करनेवाले तथा वर प्रदान करनेवाले हैं॥ ६८-६९॥<br>ये शिव ही इस जगत्के कारण हैं। ये प्राचीन पुरुष हैं, समस्त बीजों अर्थात् कारणोंके मूल बीज अर्थात् परम कारण हैं, निर्विकार हैं एवं एकमात्र ज्योतिके रूपमें जगत्को प्रकाशित कर रहे हैं। जिस प्रकार बच्चे खिलौनोंसे खेलते हैं, उसी प्रकार ये महादेव स्वयं जगत्के साथ खेलते रहते हैं अर्थात् नानाविध लीलाएँ रचते रहते हैं॥ ७० १/२॥
बालक्रीडनकैर्देवः क्रीडते शङ्करः स्वयम्।<br>प्रधानमव्ययो योनिरव्यक्तं प्रकृतिस्तमः॥ ७१<br><br>मम चैतानि नामानि नित्यं प्रसवधर्मिणः।<br>यः कः स इति दुःखार्तैर्दृश्यते यतिभिः शिवः॥ ७२प्रधान, अव्यय, योनि, अव्यक्त, प्रकृति, तम, नित्य आदि ये नाम मुझ प्रसवधर्मीके हैं और जिनके विषयमें आपने पूछा है कि ये कौन हैं, वे शिव जन्म-मरण आदि दुःखोंका भलीभाँति अनुभव करके वैराग्यको प्राप्त यतियोंद्वारा दृष्टिगत किये जाते हैं। ये शिव बीजवान् हैं, आप (ब्रह्मा) बीज हैं तथा सनातनरूप मैं (विष्णु) योनि हूँ॥ ७१-७२ १/२॥
एष बीजी भवान् बीजमहं योनिः सनातनः।<br>स एवमुक्तो विश्वात्मा ब्रह्मा विष्णुमपृच्छत॥ ७३<br><br>भवान् योनिरहं बीजं कथं बीजी महेश्वरः।<br>एतन्मे सूक्ष्ममव्यक्तं संशयं छेत्तुमर्हसि॥ ७४विष्णुके इस प्रकार कहनेपर विश्वात्मा ब्रह्माने उनसे पूछा—आप योनि, मैं बीज तथा महेश्वर शिव बीजी (बीजवान्) किस प्रकार हैं? आप मेरे इस सूक्ष्म तथा अव्यक्त संदेहका निवारण करनेकी कृपा करें॥ ७३-७४॥
ज्ञात्वा च विविधोत्पत्तिं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>इमं परमसादृश्यं प्रश्नमभ्यवदद्धरिः॥ ७५<br><br>अस्मान्महत्तरं भूतं गुह्यमन्यन्न विद्यते।<br>महतः परमं धाम शिवमध्यात्मिनां पदम्॥ ७६अनेक प्रकारसे लोकतन्त्री ब्रह्माकी उत्पत्ति जानकर भगवान् विष्णुने उनके इस परम निगूढ़ प्रश्नका उत्तर दिया। इन महादेवसे बढ़कर अन्य कोई भी गूढ़ तत्त्व नहीं है। महत्तत्त्वका सर्वोत्कृष्ट स्थान अध्यात्मज्ञानियोंका कल्याणमय पद है॥ ७५-७६॥
द्विविधं चैवमात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः।<br>निष्कलस्तत्र योऽव्यक्तः सकलश्च महेश्वरः॥ ७७उन्होंने अपनेको सगुण तथा निर्गुण—इन दो रूपोंमें विभाजित किया। उनमें जो निर्गुण हैं, वे अव्यक्तरूपमें तथा जो सगुण हैं, वे महेश्वररूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ ७७॥
यस्य मायाविधिज्ञस्य अगम्यगहनस्य च।<br>पुरा लिङ्गोद्भवं बीजं प्रथमं त्वादिसर्गिकम्॥ ७८<br><br>मम योनौ समायुक्तं तद् बीजं कालपर्ययात्।<br>हिरण्मयमकूपारे योन्यामण्डमजायत॥ ७९प्राचीनकालमें सृष्टिके आदिमें मायाकी विधिको भी जाननेवाले, अगम्य तथा दुर्बोध उन्हीं महादेवके लिङ्गसे प्रादुर्भूत बीज सर्वप्रथम मेरी योनिमें गिरा। पुनः कालान्तरमें उस सागररूप योनिमें वह बीज स्वर्णके