श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय २०] शेषशय्यापर आसीन भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव ९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शतानि दशवर्षाणामण्डमप्सु प्रतिष्ठितम् ।<br>अन्ते वर्षसहस्रस्य वायुना तद् द्विधा कृतम् ॥ ८०<br><br>कपालमेकं द्यौर्जज्ञे कपालमपरं क्षितिः ।<br>उल्बं तस्य महोत्सेधो योऽसौ कनकपर्वतः ॥ ८१ | अण्डमें परिवर्तित हो गया ॥ ७८-७९ ॥<br>एक हजार वर्षांतक वह अण्ड जलमें ही स्थित रहा; इस अवधिके अन्तमें वायुके द्वारा यह दो भागोंमें विभक्त हो गया। एक खण्डसे आकाश तथा दूसरे खण्डसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। यह अति उन्नत जो स्वर्णपर्वत मेरु है, वह उस अण्डके गर्भावरणसे निर्मित हुआ ॥ ८०-८१ ॥ |
| ततश्च प्रतिसन्ध्यात्मा देवदेवो वरः प्रभुः।<br>हिरण्यगर्भो भगवांस्त्वभिजज्ञे चतुर्मुखः ॥ ८२ | तत्पश्चात् प्रतिसन्ध्यात्मा देवाधिदेव हिरण्यगर्भ चतुर्मुख महाप्रभु भगवान् ब्रह्मा आविर्भूत हुए ॥ ८२ ॥ |
| आतारार्केन्दु नक्षत्रं शून्यं लोकमवेक्ष्य च।<br>कोऽहमित्यपि च ध्याते कुमारास्तेऽभवंस्तदा ॥ ८३<br><br>प्रियदर्शनास्तु यतयो यतीनां पूर्वजास्तव ।<br>भूयो वर्षसहस्रान्ते तत एवात्मजास्तव ॥ ८४<br><br>भुवनानलसङ्काशाः पद्मपत्रायतेक्षणाः ।<br>श्रीमान् सनत्कुमारश्च ऋभुश्चैवोर्ध्वरेतसौ ॥ ८५<br><br>सनकः सनातनश्चैव तथैव च सनन्दनः ।<br>उत्पन्नाः समकालं ते बुद्ध्यातीन्द्रियदर्शनाः ॥ ८६<br><br>उत्पन्नाः प्रतिभात्मानो जगतां स्थितिहेतवः ।<br>नारप्स्यन्ते च कर्माणि तापत्रयविवर्जिताः ॥ ८७ | तारा, सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रपर्यन्त समस्त लोकोंको शून्य देखकर 'मैं कौन हूँ'—ऐसा आपके विचार करनेपर पुनः एक हजार वर्षके अनन्तर यतियोंके पूर्वज, यलशील, प्रिय दर्शनवाले, समस्त भुवनोंको अपने तेजसे व्याप्त करनेवाले, कमलपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाले श्रीमान् सनत्कुमार, ऋभु, सनक, सनातन तथा सनन्दन नामक वे कुमार आपके पुत्ररूपमें आविर्भूत हुए, जिनमें सनत्कुमार तथा ऋभु ऊर्ध्वरेता थे। बुद्धि तथा इन्द्रियोंसे अगोचर, विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न, जगत्की स्थितिके कारणरूप तथा तीन प्रकारके तापोंसे रहित वे कुमार एक साथ उत्पन्न हुए थे, जिनकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति नहीं थी ॥ ८३—८७ ॥ |
| अल्पसौख्यं बहुक्लेशं जराशोकसमन्वितम्।<br>जीवनं मरणं चैव सम्भवश्च पुनः पुनः ॥ ८८<br><br>अल्पभूतं सुखं स्वर्गे दुःखानि नरके तथा।<br>विदित्वा चागमं सर्वमवश्यं भवितव्यताम् ॥ ८९<br><br>ऋभुं सनत्कुमारं च दृष्ट्वा तव वशे स्थितौ ।<br>त्रयस्तु त्रीन् गुणान् हित्वा चात्मजाः सनकादयः ॥ ९०<br><br>वैवर्तेन तु ज्ञानेन प्रवृत्तास्ते महौजसः ।<br>ततस्तेषु प्रवृत्तेषु सनकादिषु वै त्रिषु ॥ ९१ | जीवनमें सुख कम तथा दुःख अधिक है, जीवन जरा तथा शोकसे युक्त है, जीवनमें जन्म तथा मरण बार-बार होते रहते हैं, स्वर्गमें अत्यल्प सुख तथा नरकमें दुःख-ही-दुःख है और भावी अटल है—ये सब बातें अवश्यम्भावी हैं, ऐसा जानकर ऋभु तथा सनत्कुमारको आपके वशमें स्थित देखकर त्रिगुणातीत सनक-सनातन-सनन्दन—ये आपके तीनों महातेजस्वी पुत्र अध्यात्मसम्बन्धी ब्रह्मज्ञानकी ओर प्रवृत्त हो गये ॥ ८८—९० १/२ ॥ |
| भविष्यसि विमूढस्त्वं मायया शङ्करस्य तु ।<br>एवं कल्पे तु वै वृत्ते संज्ञा नश्यति तेऽनघ ॥ ९२ | तत्पश्चात् उन सनक आदि तीनों कुमारोंके ज्ञानमार्गमें प्रवृत्त हो जानेपर आप महादेवकी मायासे विमूढ़ (मोहित) हो गये। हे अनघ! इस प्रकार कल्पके प्रवृत्त होनेपर आपका ज्ञान नष्ट हो जाया करता है ॥ ९१-९२ ॥ |
| कल्पे शेषाणि भूतानि सूक्ष्माणि पार्थिवानि च।<br>सर्वेषां ह्यैश्वरी माया जागृतिः समुदाहृता ॥ ९३ | कल्पमें जो सूक्ष्म जीव तथा पार्थिव पदार्थ अवशिष्ट रह जाते हैं। उन सबको जाग्रत् करनेवाली |