श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| यथैष पर्वतो मेरुर्देवलोको ह्युदाहृतः।<br>तस्य चेदं हि माहात्म्यं विद्धि देववरस्य ह॥ ९४ | शक्ति ही ऐश्वरी माया कही गयी है॥ ९३॥<br>जिस प्रकार यह मेरुपर्वत देवलोकके रूपमें प्रसिद्ध है, उसी प्रकार उन देवश्रेष्ठ महादेवके इस माहात्म्यको भी प्रसिद्ध समझिये॥ ९४॥ |
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| ज्ञात्वा चेश्वरसद्भावं ज्ञात्वा मामम्बुजेक्षणम्।<br>महादेवं महाभूतं भूतानां वरदं प्रभुम्॥ ९५<br><br>प्रणवेनाथ साम्ना तु नमस्कृत्य जगद्गुरुम्।<br>त्वां च मां चैव सङ्क्रुद्धो निःश्वासानिर्दहेदयम्॥ ९६ | परमेश्वर महादेवका सद्भाव जानकर तथा मुझ कमलनयनको जानकर प्रणवयुक्त साममन्त्रोंके द्वारा भूतोंके भी महाभूत वरदाता जगद्गुरु प्रभु महादेवको नमस्कार करके उठिये, अन्यथा ये क्रोधित होकर अपने निःश्वाससे मुझे तथा आपको दग्ध कर डालेंगे॥ ९५-९६॥ |
| एवं ज्ञात्वा महायोगमभ्युत्तिष्ठन्महाबलम्।<br>अहं त्वामग्रतः कृत्वा स्तोष्याम्यनलसप्रभम्॥ ९७ | इस प्रकार उनके महान् योग तथा अमित बलको जानकर आपको आगे करके अग्निसदृश प्रभाववाले महादेवके निकट खड़ा होकर मैं उनकी स्तुति करूँगा॥ ९७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मप्रबोधनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मप्रबोधन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य
| सूत उवाच<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा ततः स गरुडध्वजः।<br>अतीतैश्च भविष्यैश्च वर्तमानैस्तथैव च॥ १<br>नामभिश्छान्दसैश्चैव इदं स्तोत्रमुदीरयेत्। | सूतजी बोले—तदनन्तर ब्रह्माको आगे करके वे गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु अतीत, भविष्य तथा वर्तमान कल्पोंसे सम्बन्धित महादेवजीके वेदप्रतिपादित नामोंसे इस स्तोत्रका वाचन करने लगे॥ १ १/२ ॥ |
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| विष्णुरुवाच<br>नमस्तुभ्यं भगवते सुव्रतानन्ततेजसे॥ २<br>नमः क्षेत्राधिपतये बीजिने शूलिने नमः।<br>सुमेंद्रायार्च्यमेंद्राय दण्डिने रूक्षरेतसे॥ ३ | विष्णुजी बोले—हे सुव्रत! आप अनन्त तेजसम्पन्न भगवान्को नमस्कार है। क्षेत्राधिपति, बीजी तथा त्रिशूलधारीको नमस्कार है। सुमेंद्र (सुन्दर लिङ्गवाले), अर्च्यमेंद्र (पूजनीय लिङ्गवाले), दण्डी तथा रूक्षरेता (रूक्ष वीर्यवाले)-को नमस्कार है॥ २-३॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय पूर्वाय प्रथमाय च।<br>नमो मान्याय पूज्याय सद्योजाताय वै नमः॥ ४<br>गहराय घटेशाय व्योमचीराम्बराय च।<br>नमस्ते ह्यस्मदादीनां भूतानां प्रभवे नमः॥ ५ | ज्येष्ठको, श्रेष्ठको, पूर्वको तथा प्रथमको नमस्कार है। मान्यको, पूज्यको तथा सद्योजातको नमस्कार है। गहर (अगम्य)-को, घटेश (चेष्टमान जीवोंके स्वामी)-को तथा आकाश एवं वृक्षकी छालको अम्बर (वस्त्र)-के रूपमें धारण करनेवाले तथा हम-जैसे प्राणियोंकें स्वामीको नमस्कार है॥ ४-५॥ |
| वेदानां प्रभवे चैव स्मृतीनां प्रभवे नमः।<br>प्रभवे कर्मदानानां द्रव्याणां प्रभवे नमः॥ ६ | वेदोंके स्वामी तथा स्मृतियोंके स्वामीको नमस्कार है। कर्मों तथा दान आदिके स्वामी और द्रव्योंके |