श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 79, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 79
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथैव भगवान् विष्णुः श्रान्तः सन्त्रस्तलोचनः।<br>सर्वदेवभवस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः॥ ४६ | तत्पश्चात् अहंकारपूर्वक ऊपर गया हुआ मैं उस लिङ्गका अन्त न देखकर अत्यन्त थका हुआ नीचे लौट आया और उसी प्रकार सभी देवताओंके उद्भवकर्ता तथा महान् शरीरवाले वे भगवान् विष्णु भी थकान एवं सन्त्रासभरे नेत्रोंके साथ लिङ्गका मूल न पाकर नीचेसे ऊपर आ गये॥ ४५-४६॥ |
| समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य महामनाः।<br>मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः॥ ४७ | शंकरकी मायासे मोहको प्राप्त वे महामना विष्णु मेरे साथ आकर परमेश्वरको प्रणाम करके व्याकुल मनसे खड़े हो गये। |
| पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव चाग्रतः परमेश्वरम्।<br>प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति॥ ४८ | इसके बाद मेरे साथ पुनः परमेश्वरको पीछेसे, बगलसे तथा आगेसे प्रणाम करके वे विचार करने लगे कि [आदि-अन्तहीन] यह क्या है?॥ ४७-४८॥ |
| तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः।<br>ओमोमिति सुरश्रेष्ठाः सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः॥ ४९ | हे श्रेष्ठ देवताओ! उसी समय वहाँ प्लुत स्वरसे युक्त ‘ओम्-ओम्’ ऐसा अत्यन्त स्पष्ट शब्दरूप नाद सुनायी पड़ा॥ ४९॥ |
| किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन् महास्वनम्।<br>लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तदापश्यत्सनातनम्॥ ५० | यह तीव्र शब्द क्या है— ऐसा मेरे साथ विचार करते हुए वे विष्णु खड़े रहे। तभी उन्होंने उस ‘ओम्’ नादके अन्तमें लिङ्गके दक्षिण भागमें सनातन आदि वर्ण |
| आद्यवर्णमकारं तु उकारं चोत्तरे ततः।<br>मकारं मध्यतश्चैव नादान्तं तस्य चोमिति॥ ५१ | अकार, उसके उत्तर भागमें उकार तथा उसके मध्यमें मकार देखा॥ ५०-५१॥ |
| सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे।<br>उत्तरे पावकप्रख्यमुकारं पुरुषर्षभः॥ ५२ | इस प्रकार सूर्यमण्डलके समान आदि वर्ण अकारको लिङ्गके दक्षिणमें, अग्निके सदृश प्रतीत होनेवाले उकारको उत्तरमें |
| शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं मध्यमं तथा।<br>तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकवत्प्रभुम्॥ ५३ | तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य मकारको मध्यमें देखनेके बाद उन पुरुषश्रेष्ठ विष्णुने उसके ऊपर |
| तुरीयातीतममृतं निष्कलं निरुपप्लवम्।<br>निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम्॥ ५४ | तुरीयातीत, अमृतरूप, कलारहित, विकारशून्य, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यस्वरूप, बाह्य तथा आभ्यन्तरसे रहित, |
| सबाह्याभ्यन्तरं चैव सबाह्याभ्यन्तरस्थितम्।<br>आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यापि कारणम्॥ ५५ | बाह्य तथा आभ्यन्तरसे युक्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों रूपोंमें स्थित, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा आनन्दके भी कारणस्वरूप शुद्ध स्फटिकके सदृश प्रकाशमान प्रभुको देखा॥ ५२—५५॥ |
| मात्रास्तिस्रस्त्वर्धमात्रं नादाख्यं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>ऋग्यजुःसामवेदा वै मात्रारूपेण माधवः॥ ५६ | अकार, उकार और मकाररूप तीन मात्राएँ तथा बिन्दुरूप अर्धमात्रास्वरूपवाला प्रणव ही नाद कहलाता है और वही ब्रह्मसंज्ञावाला है। ऋक्-यजुः तथा सामवेद उन तीनों मात्राओंके रूपमें विष्णु ही हैं॥ ५६॥ |
| वेदशब्दैभ्य एवेशं विश्वात्मानमचिन्तयत्।<br>तदाभवदृषिर्वेद ऋषेः सारतमं शुभम्॥ ५७ | उसी वेदरूप शब्दके द्वारा विष्णुने विश्वात्मा |