भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| [ पूर्वभाग | श्रीलिङ्गमहापुराण | ७८ ] | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान् परमेश्वरम्।ईश्वर शिवका चिन्तन किया। उसी समयसे अतीन्द्रिय-दर्शक, परम-तत्त्वरूप कल्याणकारी वेद हुआ और उसी ऋषि (वेद)-से विष्णुने परमेश्वर शिवको जाना॥ ५७^{१/२} ॥
देव उवाच<br>चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ॥ ५८<br>अप्राप्य तं निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः।<br>एकाक्षरेण तद्वाच्यमृतं परमकारणम्॥ ५९<br>सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम्।<br>एकाक्षरादकाराख्यो भगवान् कनकाण्डजः॥ ६०देव (ब्रह्मा) बोले—वाणी भी मनके साथ जिन्हें प्राप्त न करके लौट आती है, उन चिन्तारहित भगवान् रुद्रका वाचक एकाक्षर प्रणव ही है और यही एकाक्षर प्रणव उस सृष्टिके परम कारणरूप, सत्य-आनन्द तथा अमृतरूप परात्पर परम ब्रह्मका भी वाचक है*॥ ५८-५९^{१/२}॥
एकाक्षरादुकाराख्यो हरिः परमकारणम्।<br>एकाक्षरान्मकाराख्यो भगवान्नीललोहितः॥ ६१उसी एकाक्षर प्रणवसे अकारसंज्ञक भगवान् ब्रह्मा, उकारसंज्ञक परमकारणस्वरूप विष्णु तथा मकारसंज्ञक परमेश्वर नीललोहितका प्रादुर्भाव हुआ है॥ ६०-६१॥
सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः।<br>मकाराख्यस्तयोर्नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् ॥ ६२अकारसंज्ञक ब्रह्मा सृष्टिके निर्माता, उकारसंज्ञक विष्णु मोह करनेवाले तथा मकारसंज्ञक शिव उन दोनों ब्रह्मा तथा विष्णुपर सदा अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६२॥
मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीजमुच्यते।<br>उकाराख्यो हरियोंनिः प्रधानपुरुषेश्वरः॥ ६३मकाररूप भगवान् शिव बीजवान्, अकाररूप ब्रह्मा बीज तथा उकाररूप प्रधानपुरुषेश्वर विष्णु योनि कहे जाते हैं॥ ६३॥
बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः।<br>बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः॥ ६४नादरूप महेश्वर शिव ही स्वयं बीजी, बीज तथा योनि—तीनों हैं। वे बीजीरूप महेश्वर स्वेच्छासे अपनेको विभाजित करके प्रतिष्ठित हैं॥ ६४॥
अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः।<br>उकारयोनौ निक्षिप्तमवर्धत समन्ततः॥ ६५<br>सौवर्णमभवच्चाण्डमावेष्ट्याद्यं तदक्षरम्।<br>अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम्॥ ६६इन बीजीरूप परमेश्वर शिवके लिङ्गसे अकाररूप बीज (ब्रह्मा), उकाररूप योनि (विष्णु)-में गिरकर चारों ओर वृद्धिको प्राप्त होने लगा और वह फिर स्वर्णका अण्ड हो गया। इसके बाद एकाक्षर प्रणवको आदि-अन्तसे आवेष्टित करके वह दिव्य अण्ड बहुत वर्षोंतक जलमें स्थित रहा॥ ६५-६६॥
ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम्।<br>अण्डमप्सु स्थितं साक्षादाद्याख्येनेश्वरेण तु॥ ६७तदनन्तर हजार वर्षोंके बाद साक्षात् आदिरूप परमेश्वरने जलमें स्थित उस अजोद्भूत अण्डको दो भागोंमें कर दिया॥ ६७॥
तस्याण्डस्य शुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम्।<br>जज्ञे यद् द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा॥ ६८उस अण्डके ऊर्ध्वस्थित हेममय पवित्र कपालसे आकाश तथा नीचेके भागसे पाँच लक्षणोंसे सम्पन्न पृथ्विकी उत्पत्ति हुई॥ ६८॥

* यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। (तैत्ति० २।४।१)