भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृतहिन्दी
ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ३४<br><br>(चित्र)<br><br>अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम्।ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त एक दीप्तिमान् लिङ्ग हमलोगोंके समक्ष प्रकट हुआ। वह लिङ्ग हजारों अग्नि-ज्वालाओंसे व्याप्त, सैकड़ों कालानिके सदृश, क्षय तथा वृद्धिसे रहित, आदि-मध्य-अन्तसे हीन, अतुलनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त तथा विश्वका उत्पत्तिकर्तरूप था॥ ३३-३४१/२॥
तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान् हरिः ॥ ३५<br>मोहितं प्राह मामत्र परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।<br>अधोगमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥ ३६<br>भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम्।उस लिङ्गकी हजारों ज्वालाओंसे भगवान् विष्णु तथा मैं—दोनों लोग मोहित हो गये। फिर विष्णुने मुझसे कहा कि हमें अग्नि-उद्भूत इस लिङ्गका पता लगाना चाहिये। एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्नि-स्तम्भके नीचे जाता हूँ और आप प्रयत्नपूर्वक शीघ्र इसके ऊपर जाइये॥ ३५-३६ १/२॥
एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा॥ ३७<br>वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान् सुराः।<br>तदा प्रभृति मामाहुर्हसं हंसो विराडिति॥ ३८<br>हंस हंसेति यो ब्रूयान्मां हंसः स भविष्यति।हे देवताओ! ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णुने वराहका रूप धारण कर लिया और मैं भी शीघ्र हंसके रूपको प्राप्त हो गया। उसी समयसे मुझ ब्रह्माको विराट् रूपवाले भगवान् विष्णु 'हंस' कहने लगे। जो प्राणी 'हंस-हंस' नामसे मेरा कीर्तन करता है, वह हंसत्वको प्राप्त हो जाता है॥ ३७-३८ १/२॥
सुश्वेतो ह्यनलाक्षश्च विश्वतः पक्षसंयुतः॥ ३९<br>मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोऽहं चोर्ध्वतः सुराः।हे देवताओ! उस समय मैं अत्यन्त श्वेत वर्णका था, मेरे नेत्र अग्निके समान थे और मैं सभी ओरसे पंखोंसे युक्त था—इस प्रकार हंसरूपमें मैं मनरूपी वायुके वेगसे उड़कर ऊपरकी ओर गया॥ ३९ १/२॥
नारायणोऽपि विश्वात्मा नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ४०<br>दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।<br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्॥ ४१<br>कालादित्यसभाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्।<br>ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम्॥ ४२<br>वाराहमसितं रूपमास्थाय गतवानधः।उधर विश्वात्मा नारायण विष्णु भी दस योजन चौड़े तथा शत योजन लम्बे और नीले अंजनके समूहसदृश, मेरुपर्वत-तुल्य शरीरवाले, श्वेत तथा तीक्ष्ण दंष्ट्रांकुर एवं विशाल थूथनवाले, छोटे-छोटे पैरोंवाले, विचित्र अंगोंवाले, प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान, दृढ़, अनुपमेय, भीषण शब्दवाले तथा सर्वथा अपराजेय कृष्णवाराहका रूप धारण करके उस अग्नि-स्तम्भ (लिङ्ग)-के नीचेकी ओर गये॥ ४०-४२ १/२॥
एवं वर्षसहस्रं तु त्वरन् विष्णुरधोगतः॥ ४३<br>नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः।इस प्रकार विष्णुभगवान् एक हजार वर्षतक वेगपूर्वक नीचेकी ओर जाते रहे, किंतु वाराहरूप विष्णु इस लिङ्गके मूलका अल्पांश भी नहीं देख सके॥ ४३ १/२॥
तावत्कालं गतो ह्यूर्ध्वमहमप्यरिसूदनः॥ ४४<br>सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया।<br>श्रान्तो ह्यदृष्ट्वा तस्यान्तमहङ्कारादधोगतः॥ ४५शत्रुओंका दमन करनेवाला मैं ब्रह्मा भी उस लिङ्गका अन्त जाननेकी इच्छासे पूरे प्रयासके साथ शीघ्रतापूर्वक ऊपरकी ओर जाता रहा॥ ४४ १/२॥