श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७ ] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य... शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७३
सत्रहवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमा-महेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति
| सूत उवाच<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः सद्यादीनां समुद्भवः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ १<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं प्रसादात्परमेष्ठिनः। | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! इस प्रकार मैंने शिवजीके सद्योजात आदि अवतारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को सुनाता है, वह शिवजीके अनुग्रहसे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है॥ १ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>कथं लिङ्गमभूल्लिङ्गे समभ्यर्च्यः स शङ्करः॥ २<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सूत वक्तुमिहार्हसि। | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! लिङ्गकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उस लिङ्गमें शंकरजीकी उपासना कैसे की जानी चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? यह आप हमें बताइये॥ २ १/२॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>एवं देवाश्च ऋषयः प्रणिपत्य पितामहम्॥ ३<br>अपृच्छन् भगवँल्लिङ्गं कथमासीदिति स्वयं।<br>लिङ्गे महेश्वरो रुद्रः समभ्यर्च्यः कथं त्विति॥ ४<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सोऽप्याह च पितामहः। | **रोमहर्षण [ सूतजी ] बोले—**हे ऋषियो! इसी प्रकार अत्यन्त निवेदनपूर्वक देवताओंने भी पितामह ब्रह्मासे पूछा था कि हे भगवन्! यह लिङ्ग कैसे उत्पन्न हुआ तथा लिङ्गमें महेश्वर रुद्रका किस प्रकार पूजन होना चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? इसपर वे ब्रह्मा बोले॥ ३-४ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>प्रधानं लिङ्गमाख्यातं लिङ्गी च परमेश्वरः॥ ५<br>रक्षार्थमम्बुधौ महां विष्णोस्तवासीत्सुरोत्तमाः। | **पितामह [ ब्रह्माजी ]-ने कहा—**प्रधानको लिङ्ग तथा परमेश्वरको लिङ्गी कहा गया है। हे उत्तम देवताओ! यह मेरी तथा विष्णुकी रक्षाके लिये समुद्रमें प्रकट हुआ था॥ ५ १/२॥ | | वैमानिके गते सर्गे जनलोकं सहर्षिभिः॥ ६<br>स्थितिकाले तदा पूर्णे ततः प्रत्याहृते तथा।<br>चतुर्युगसहस्रान्ते सत्यलोकं गते सुराः॥ ७ | जब देवताओंकी सृष्टि समाप्त हो गयी, तब वे देवता ऋषियोंके साथ जनलोक चले गये और पुनः स्थिति-कालके पूर्ण होनेपर और इसके बाद हजार चतुर्युगीके अन्तमें पुनः प्रलयके उपस्थित होनेपर वे सत्यलोक चले गये॥ ६-७॥ | | विनाधिपत्यं समतां गतेऽन्ते ब्रह्मणो मम।<br>शुष्के च स्थावरे सर्वे त्वनावृष्ट्या च सर्वशः॥ ८<br>पशवो मानुषा वृक्षाः पिशाचाः पिशिताशनाः।<br>गन्धर्वाद्याः क्रमेणैव निर्दग्धा भानुभानुभिः॥ ९ | उस समय मैं ब्रह्मा बिना किसी आधिपत्यके साम्य-अवस्थाको प्राप्त था। इस प्रकार अन्तमें अनावृष्टिके कारण सभी स्थावर पदार्थोंके सूख जानेपर सभी ओर समस्त पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस, गन्धर्व आदि क्रमसे सूर्यकी किरणोंसे दग्ध हो गये॥ ८-९॥ | | एकार्णवे महाघोरे तमोभूते समन्ततः।<br>सुष्वापाम्भसि योगात्मा निर्मलो निरुपप्लवः॥ १० | तत्पश्चात् चारों ओर समुद्र-ही-समुद्रके व्याप्त हो |