भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग


| प्रणम्य भगवान् विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः।<br>ॐकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम्॥ ८२<br><br>शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम्।<br>मेधाकरमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम्॥ ८३<br><br>गायत्रीप्रभवं मन्त्रं हरितं वश्यकारकम्।<br>चतुर्विंशति वर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम्॥ ८४<br><br>अथर्वमसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम्।<br>अभिचारिकमत्यर्थं त्रयस्त्रिंशच्छुभाक्षरम्॥ ८५<br><br>यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चत्रिंशच्छुभाक्षरम्।<br>कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा॥ ८६<br><br>त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लोहितम्।<br>सामोद्भवं जगत्याद्यं वृद्धिसंहारकारणम्॥ ८७<br><br>वर्णाः षडधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु।<br>पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान् हरिः॥ ८८ | उमाके साथ उन भगवान् महेश्वरको देखकर पुनः उन्हें प्रणाम करके जब भगवान् विष्णुने ऊपरकी ओर देखा तब उन्हें ॐकारसे उत्पन्न, पाँच कलाओंसे युक्त, बुद्धिविवर्धक तथा सभी धर्म-अर्थको सिद्ध करनेवाला शुद्ध स्फटिक-तुल्य अत्यन्त शुभ्र तथा अड़तीस शुभ अक्षरोंवाला पवित्र मन्त्र (ईशानः सर्वविद्यानाम् ०)¹ दृष्टिगोचर हुआ। साथ ही गायत्रीसे उत्पन्न, चार कलाओंवाला, चौबीस अक्षरोंसे युक्त तथा वश्यकारक हरित वर्ण अत्युत्तम मन्त्र (तत्पुरुषाय विद्महे ०)²; अथर्ववेदसे उत्पन्न आठ कलाओंसे युक्त तैंतीस शुभ अक्षरोंवाला कृष्णवर्ण तथा अत्यन्त अभिचारिक अघोर-मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्य ०)³; यजुर्वेदसे प्रादुर्भूत, आठ कलाओंवाला, श्वेतवर्णवाला, शान्तिकारक पैंतीस अक्षरोंसे युक्त पवित्र सद्योजात मन्त्र (सद्योजातं प्रपद्यामि ०)⁴ एवं सामवेदसे उत्पन्न, रक्तवर्ण, बाल आदि तेरह कलाओंसे युक्त, जगत्का आदि स्वरूप तथा वृद्धि-संहारका कारणरूप छाछठ अक्षरोंवाला उत्तम मन्त्र (वामदेवाय नमो ०)⁵ दृष्टिगत हुए। इन पाँचों मन्त्रोंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुने इनका जप करना आरम्भ कर दिया॥ ८१—८८॥ | | अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम्।<br>ईशानमीशमुकुटं पुरुषास्यं पुरातनम्॥ ८९<br><br>अघोरहृदयं हृद्यं वामगुह्यं सदाशिवम्।<br>सद्यः पादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम्॥ ९०<br><br>विश्वतः पादवदनं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम्।<br>ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम्॥ ९१<br><br>तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्वरदमीश्वरम्॥ ९२ | तत्पश्चात् समस्त कलाओंकी कान्तिसे युक्त, ऋक्-यजुः-सामस्वरूप, ईशान मन्त्ररूप मुकुटवाले, तत्पुरुष मन्त्ररूप मुखवाले, अघोर मन्त्ररूप करुणामय हृदयवाले, वामदेव मन्त्र-रूप सदा कल्याणकर गुह्यस्थान-वाले तथा सद्योजात मन्त्ररूप चरणोंवाले, विशाल सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले, चारों ओर पैर-मुख-आँख धारण किये हुए, सृष्टि-पालन-संहारके कारणस्वरूप, पुरातन पुरुष महादेव ब्रह्माधिपति शिवको देखकर भगवान् विष्णु अभीष्ट स्तुतियोंसे उन वरदाता परमेश्वर ईशानका पुनः स्तवन करने लगे॥ ८९—९२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गोद्भवो नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गोद्भव' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥


१. ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥ (नारायणोपनिषद्)
२. तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (नारायणोपनिषद्)
३. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (नारायणोपनिषद्)
४. सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमोनमः। भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)
५. वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (नारायणोपनिषद्)