भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

९०- यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण

४६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| द्वादश्यां धर्मतत्त्वज्ञं श्रौतस्मार्तप्रवर्तकम्।<br>त्रयोदश्यां जडां नारीं सर्वसङ्करकारिणीम्॥ ११६<br><br>जनयत्यङ्गना यस्मान्न गच्छेत्सर्वयत्नतः।<br>चतुर्दश्यां यदा गच्छेत्सा पुत्रजननी भवेत्॥ ११७<br><br>पञ्चदश्यां च धर्मिष्ठां षोडश्यां ज्ञानपारगम्।<br>स्त्रीणां वै मैथुने काले वामपार्श्वे प्रभञ्जनः॥ ११८<br><br>चरेद्यदि भवेन्नारी पुमांसं दक्षिणे लभेत्।<br>स्त्रीणां मैथुनकाले तु पापग्रहविवर्जिते॥ ११९<br><br>उक्तकाले शुचिर्भूत्वा शुद्धां गच्छेच्छुचिस्मिताम्।<br>इत्येवं सम्प्रसङ्गेन यतीनां धर्मसङ्ग्रहे॥ १२०<br><br>सर्वेषामेव भूतानां सदाचारः प्रकीर्तितः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि सदाचारं शुचिर्नरः॥ १२१<br><br>श्रावयेद्वा यथान्यायं ब्राह्मणान् दग्धकिल्बिषान्।<br>ब्रह्मलोकमनुप्राप्य ब्रह्मणा सह मोदते॥ १२२ | भाँति कन्या उत्पन्न करती है। बारहवें दिन स्त्री धर्मतत्त्वके ज्ञाता तथा श्रुति-स्मृतिके धर्मोंको चलानेवाले पुत्रको उत्पन्न करती है और तेरहवीं रातमें गमन करनेपर मूर्ख तथा वर्णसंकर [दोष] फैलानेवाली कन्या उत्पन्न करती है; अतः पूरे प्रयत्नसे उस दिन स्त्री-सहवास नहीं करना चाहिये। यदि चौदहवीं रातमें गमन किया जाय, तो वह स्त्री पुत्र उत्पन्न करनेवाली होती है। पन्द्रहवीं रातमें गमन करनेपर वह धर्मनिष्ठ कन्याको तथा सोलहवीं रातमें गमन करनेपर ज्ञानमें पारंगत पुत्रको उत्पन्न करती है॥ ११४-११७ १/२॥<br><br>मैथुनके समय यदि स्त्रियोंके बायें पार्श्वमें वायु प्रवाहित होता हो, तो कन्या होती है और दक्षिण पार्श्वमें प्रवाहित हो, तो पुत्र प्राप्त होता है। पापग्रहसे रहित मैथुन-कालमें स्त्रियोंसे सहवास करना चाहिये। ऐसे बताये गये [शुभ] समयमें पवित्र होकर उत्तम मुस्कानवाली भार्याके साथ गमन करना चाहिये॥ ११८-११९ १/२॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने यतियोंके धर्मसंग्रहमें प्रसंगपूर्वक सभी प्राणियोंके सदाचारका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य पवित्र होकर इस सदाचारको विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा दग्ध पापवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करके ब्रह्माके साथ आनन्द करता है॥ १२०-१२२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सदाचारकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः॥ ८९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सदाचारकथन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८९॥


नब्बेवाँ अध्याय

यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण

सूत उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतीनामिह निश्चितम्।<br>प्रायश्चित्तं शिवप्रोक्तं यतीनां पापशोधनम्॥ १<br><br>पापं हि त्रिविधं ज्ञेयं वाङ्मनःकायसम्भवम्।<br>सततं हि दिवा रात्रौ येनेदं वेष्ट्यते जगत्॥ २<br><br>तत्कर्मणा विनाप्येष तिष्ठतीति परा श्रुतिः।<br>क्षणमेवं प्रयोज्यं तु आयुष्यं तु विधारणम्॥ ३सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं यतियोंके लिये निश्चित किये गये प्रायश्चित्तका वर्णन करूँगा; शिवके द्वारा कहा गया यह [प्रायश्चित्त] यतियोंके पापका शोधन करनेवाला है॥ १॥<br><br>मन, वाणी तथा शरीरसे होनेवाले पापको तीन प्रकारका जानना चाहिये, जिसके द्वारा दिन-रात निरन्तर यह जगत् व्याप्त है। यति कर्मके बिना भी स्थित रहता है—

अध्याय १०] यतियोंके लिये प्रायश्चित्तनिरूपण ४६७

भवेद्योगोऽप्रमत्तस्य योगो हि परमं बलम्।<br>न हि योगात्परं किञ्चिन्नराणां दृश्यते शुभम्॥ ४<br><br>तस्माद्योगं प्रशंसन्ति धर्मयुक्ता मनीषिणः।<br>अविद्यां विद्यया जित्वा प्राप्यैश्वर्यमनुत्तमम्॥ ५<br><br>दृष्ट्वा परावरं धीराः परं गच्छन्ति तत्पदम्।यह उपनिषद्का कथन है; प्रत्येक क्षणको योगमें प्रयुक्त करना चाहिये; क्योंकि आयु अत्यन्त चलायमान है। प्रमादरहितको ही योग प्राप्त होता है। योग महान् बल है; मनुष्योंके लिये योगसे बढ़कर कल्याणकारी कुछ भी नहीं दिखायी देता है। अतः धर्मयुक्त विद्वान् लोग योगकी प्रशंसा करते हैं। विद्याके द्वारा अविद्याको जीतकर अत्युत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करके पुनः ब्रह्म तथा मायाविलासका भली-भाँति विचार करके धीर लोग [शिवनामक] उस परम पदको प्राप्त करते हैं॥ २—५ १/२॥
व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपाव्रतानि च॥ ६<br><br>एकैकातिक्रमे तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते।<br>उपेत्य तु स्त्रियं कामात्प्रायश्चित्तं विनिर्द्दिशेत्॥ ७<br><br>प्राणायामसमायुक्तं चरेत्सान्तपनं व्रतम्।<br>ततश्चरति निर्देशात्कृच्छ्रं चान्ते समाहितः॥ ८<br><br>पुनराश्रममागत्य चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः।यतियोंके लिये जो व्रत तथा उपव्रत हैं; उनमें प्रत्येकका अतिक्रम (उल्लंघन) होनेपर उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है। [गृहस्थको भी] कामनापूर्वक स्त्री-गमन करनेपर प्रायश्चित्त करना चाहिये; यतिको प्राणायामयुक्त सान्तपनव्रत करना चाहिये, इसके बाद एकाग्रचित्त होकर नियमानुसार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये, तत्पश्चात् अपने आश्रममें लौटकर आलस्यरहित होकर भिक्षुक (यति)-को आचारपूर्वक रहना चाहिये॥ ६—८ १/२॥
न धर्मयुक्तमनृतं हिनस्तीति मनीषिणः॥ ९<br><br>तथापि न च कर्तव्यं प्रसङ्गो ह्येष दारुणः।<br>अहोरात्रोपवासश्च प्राणायामशतं तथा॥ १०<br><br>असद्वादो न कर्तव्यो यतिना धर्मलिप्सुना।<br>परमापद्गतेनापि न कार्यं स्तेयमप्युत॥ ११<br><br>स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति श्रुतिः।<br>हिंसा ह्येषा परा सृष्टा स्तैन्यं वै कथितं तथा॥ १२<br><br>यदेतद्द्रविणं नाम प्राणा ह्येते बहिश्चराः।<br>स तस्य हरते प्राणान् यो यस्य हरते धनम्॥ १३<br><br>एवं कृत्वा सुदुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्युतः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणं व्रतम्॥ १४<br><br>विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति श्रुतिः।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते भूयः प्रक्षीणकल्मषः।<br>पुनर्निर्वेदमापन्नश्चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः ॥ १५धर्मार्थ असत्य [किसीको] दूषित नहीं करता है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं; फिर भी उसे नहीं करना चाहिये। यह असत्य प्रसंग भयंकर होता है। [यदि यह हो जाता है, तो] एक दिन तथा एक रात उपवास और सौ प्राणायाम इसका प्रायश्चित्त है। धर्मके इच्छुक यतिको असद्वाद नहीं करना चाहिये; बड़ी-से-बड़ी विपत्ति पड़नेपर भी उसे चोरी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चोरीसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। चोरीको प्राणवधके समान होनेवाली हिंसाके रूपमें कहा गया है। जो यह धन है, वह मनुष्योंका बाहर विचरण करनेवाला प्राण ही है। जो जिसके धनका हरण करता है, वह मानो उसका प्राण ही हर लेता है। इस [चौर] कर्मको करके वह अत्यन्त दुष्ट मनवाला व्यक्ति आचाररहित तथा व्रतच्युत हो जाता है। उसे फिरसे वैराग्ययुक्त होकर शास्त्रोक्त विधिसे एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करना चाहिये—ऐसा श्रुति कहती है। वर्षके अन्तमें वह पापरहित हो जाता है; इसके बाद यतिको वैराग्ययुक्त होकर आलस्यरहित हो सदाचारका पालन करना चाहिये॥ ९—१५॥
अहिंसा सर्वभूतानां कर्मणा मनसा गिरा।<br>अकामादपि हिंसेत यदि भिक्षुः पशून् कृमीन्॥ १६सभी प्राणियोंके प्रति मन, वचन तथा कर्मसे अहिंसा भाव रखना चाहिये। यदि यति अनजानमें भी पशुओं तथा

९१- आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण

४६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कृच्छ्रातिकृच्छ्रं कुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा।<br>स्कन्देदिन्द्रियदौर्बल्यात् स्त्रियं दृष्ट्वा यतिर्यदि॥ १७<br><br>तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु षोडश।<br>दिवा स्कन्नस्य विप्रस्य प्रायश्चित्तं विधीयते॥ १८<br><br>त्रिरात्रमुपवासाश्च प्राणायामशतं तथा।<br>रात्रौ स्कन्नः शुचिः स्नात्वा द्वादशैव तु धारणाः॥ १९<br><br>प्राणायामेन शुद्धात्मा विरजा जायते द्विजाः।<br>एकान्नं मधुमांसं वा अश्रुतान्नं तथैव च॥ २०<br><br>अभोज्यानि यतीनां तु प्रत्यक्षलवणानि च।<br>एकैकातिक्रमात्तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते॥ २१<br><br>प्राजापत्येन कृच्छ्रेण ततः पापात्प्रमुच्यते।<br>व्यतिक्रमाश्च ये केचिद्वाङ्मनःकायसम्भवाः॥ २२<br><br>सद्भिः सह विनिश्चित्य यद् ब्रूयुस्तत्समाचरेत्॥ २३<br><br>चरेद्धि शुद्धः समलोष्टकाञ्चनः<br>समस्तभूतेषु च सत्समाहितः।<br>स्थानं ध्रुवं शाश्वतमव्ययं तु<br>परं हि गत्वा न पुनर्हि जायते॥ २४ | कीड़ोंतककी हिंसा कर दे, तो उसे कृच्छ्रातिकृच्छ्र अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। स्त्रीको देखकर इन्द्रिय-दौर्बल्यके कारण यदि यति स्खलित हो जाता है, तो उसे सोलह बार प्राणायाम करना चाहिये। दिनमें वीर्यस्खलन करनेवाले विप्रके लिये प्रायश्चित्तस्वरूप तीन राततक उपवास और सौ प्राणायामका विधान है। यदि रातमें स्खलन होता है, तो स्नान करके बारह धारणा (प्राणायाम) करनेके अनन्तर वह शुद्ध हो जाता है। हे द्विजो! प्राणायामके द्वारा विप्र शुद्धमनवाला तथा पापसे रहित हो जाता है॥ १६–१९१/२॥<br><br>किसी एक व्यक्तिसे प्राप्त अन्न, मधु (शहद), मांस, बिना पका हुआ भोजन तथा प्रत्यक्ष लवण—ये सभी पदार्थ यतियोंके लिये अभोज्य हैं। इनमें किसी एकका भी उल्लंघन होनेपर उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है; कृच्छ्रप्राजापत्यव्रतके द्वारा उस पापसे यति छूट जाता है। मन, वाणी तथा शरीरसे जो कोई भी अन्य व्यतिक्रम हो जाय, तो उनके प्रायश्चित्तके लिये सत्पुरुषोंके साथ निर्णय करके वे जो बतायें, उसे करना चाहिये॥ २०–२३॥<br><br>जो शुद्ध मनसे मिट्टीके ढेले तथा सुवर्णमें समान भाव रखता है और सभी प्राणियोंमें ब्रह्मका चिन्तन करता है; वह स्थिर, शाश्वत तथा अविनाशी परम धामको प्राप्त करके पुनः जन्म नहीं ग्रहण करता है॥ २४॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे यतिप्रायश्चित्तं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'यतिप्रायश्चित्त' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥


इक्यानबेवाँ अध्याय

आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य तथा शिवोपासनानिरूपण

| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि अरिष्टानि निबोधत।<br>येन ज्ञानविशेषेण मृत्युं पश्यन्ति योगिनः॥ १<br><br>अरुन्धतीं ध्रुवं चैव सोमच्छायां महापथम्।<br>यो न पश्येन जीवेत्स नरः संवत्सरात्परम्॥ २<br><br>अरश्मिवन्तमादित्यं रश्मिवन्तं च पावकम्।<br>यः पश्यति न जीवेद्वै मासादेकादशात्परम्॥ ३<br><br>वमेन्मूत्रं पुरीषं च सुवर्णं रजतं तथा।<br>प्रत्यक्षमथवा स्वप्ने दशमासान्न जीवति॥ ४ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं अरिष्टों (मृत्युको सूचित करनेवाले चिह्नों)-को बताऊँगा, जिस ज्ञानविशेषसे योगीलोग मृत्युको देखते हैं; आपलोग उन्हें जानिये॥ १॥<br><br>जो मनुष्य अरुन्धती, ध्रुव, सोमछाया (छायापुरुष) तथा आकाशगंगामार्गको नहीं देख पाता है, वह एक वर्षसे अधिक नहीं जीवित रहता है। जो रश्मिरहित सूर्यको तथा रश्मियुक्त अग्निको देखता है, वह ग्यारह महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो प्रत्यक्ष अथवा |

अध्याय ९१] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुक्मवर्णं द्रुमं पश्येद् गन्धर्वनगराणि च।<br>पश्येत्प्रेतपिशाचांश्च नवमासान् स जीवति॥ ५<br><br>अकस्माच्च भवेत्स्थूलो ह्यकस्माच्च कृशो भवेत्।<br>प्रकृतेश्च निवर्तेत चाष्टौ मासांश्च जीवति॥ ६स्वप्नमें मूत्र, पुरीष (विष्ठा), सुवर्ण अथवा रजत (चाँदी)-का वमन करता है, वह दस महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो स्वप्नमें सुनहरे वृक्षको देखता है और गन्धर्वनगरों तथा प्रेतपिशाचोंको देखता है, वह नौ महीनेतक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल हो जाता है, अकस्मात् दुर्बल हो जाता है और अपने स्वभावसे दूर हो जाता है, वह आठ महीनेतक जीवित रहता है॥ २–६॥
अग्रतः पृष्ठतो वापि खण्डं यस्य पदं भवेत्।<br>पांसुके कर्दमे वापि सप्तमासान् स जीवति॥ ७<br><br>काकः कपोतो गृध्रो वा निलीयेद्यस्य मूर्धनि।<br>क्रव्यादो वा खगो यस्य षण्मासान्नातिवर्तते॥ ८<br><br>गच्छेद्व्रायसपङ्क्तीभिः पांसुवर्षेण वा पुनः।<br>स्वच्छायां विकृतां पश्येच्चतुः पञ्च स जीवति॥ ९<br><br>अनभ्रे विद्युतं पश्येदक्षिणां दिशमास्थिताम्।<br>उदके धनुरेन्द्रं वा त्रीणि द्वौ वा स जीवति॥ १०जिसके पैरकी आकृति धूल या कीचड़में सामने या पीछेसे खण्डित दिखायी दे, वह सात महीनेतक जीता है। जिसके सिरपर कौआ, कबूतर, गीध अथवा मांसभक्षी अन्य पक्षी बैठ जाता है, वह छः महीनेसे अधिक नहीं जीता है। जो कौओंकी पंक्तियोंके साथ गमन करता है अथवा धूलवृष्टि (आँधी)-के साथ गमन करता है और अपनी छायाको विकृत देखता है, वह चार-पाँच महीनेतक जीता है। जो मेघरहित आकाशमें विद्युत्‌को दक्षिण दिशामें स्थित देखता है अथवा जलमें इन्द्रधनुषको देखता है, वह दो अथवा तीन महीनेतक जीवित रहता है॥ ७–१०॥
अप्सु वा यदि वादर्शे यो ह्यात्मानं न पश्यति।<br>अशिरस्कं तथा पश्येन्मासादूर्ध्वं न जीवति॥ ११<br><br>शवगन्धि भवेद् गात्रं वसागन्धमथापि वा।<br>मृत्युर्ह्युपागतस्तस्य अर्धमासान्न जीवति॥ १२<br><br>यस्य वै स्नातमात्रस्य हृदयं परिशुष्यति।<br>धूमं वा मस्तकात्पश्येद्वशहान्न स जीवति॥ १३जो जलमें अथवा दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको नहीं देख पाता है और अपनेको सिरविहीन देखता है, वह एक महीनेसे अधिक नहीं जीता है। यदि किसीका शरीर शवकी गन्धवाला अथवा चर्बीकी गन्धवाला हो जाता है, तो उसकी मृत्यु समीप आयी हुई होती है; वह आधे महीनेसे अधिक नहीं जीवित रहता है। स्नान करनेके तुरंत बाद जिसका हृदय सूख जाता है अथवा मस्तकसे धुआँ दिखायी देता है, वह दस दिनसे अधिक नहीं जीता है॥ ११–१३॥
सम्भिन्नो मारुतो यस्य मर्मस्थानानि कृन्तति।<br>अद्भिः स्पृष्टो न हृष्येत तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ १४प्रवाहमय वायु जिसके मर्मस्थानोंको भेद देता है और जो जलसे स्पृष्ट होकर प्रसन्न नहीं होता है, उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये।
ऋक्षवानरयुक्तेन रथेनाशां च दक्षिणाम्।<br>गायन्नृत्यन् व्रजेत्स्वप्ने विद्यान्मृत्युरुपस्थितः॥ १५यदि कोई स्वप्नमें ऋक्ष (भालू) तथा बन्दरसे जुते हुए रथसे दक्षिण दिशाकी ओर गाते तथा नाचते हुए यात्रा करता है, तो उसकी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये।
कृष्णाम्बरधरा श्यामा गायन्ती वाप्यथाङ्गना।<br>यं नयेद्दक्षिणामाशां स्वप्ने सोऽपि न जीवति॥ १६स्वप्नमें काले रंगका वस्त्र धारण किये कृष्ण वर्णवाली
४७०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| छिद्रं वा स्वस्य कण्ठस्य स्वप्ने यो वीक्षते नरः।<br>नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्॥ १७<br><br>आमस्तकतलाद्यस्तु निमज्जेत्पङ्कसागरे।<br>दृष्ट्वा तु तादृशं स्वप्नं सद्य एव न जीवति॥ १८<br><br>भस्माङ्गारांश्च केशांश्च नदीं शुष्कां भुजङ्गमान्।<br>पश्येद्यो दशरात्रं तु न स जीवति तादृशः॥ १९<br><br>कृष्णैश्च विकटैश्चैव पुरुषैरुद्यतायुधैः।<br>पाषाणैस्ताड्यते स्वप्ने यः सद्यो न स जीवति॥ २० | स्त्री गाती हुई जिसे दक्षिण दिशाकी ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता है॥ १४-१६॥<br><br>जो मनुष्य स्वप्नमें अपने कण्ठका छिद्र देखता है अथवा नग्न श्रमण (भिक्षु)-को देखता है, उसे अपनी मृत्युको उपस्थित समझना चाहिये। जो मनुष्य [स्वप्नमें] अपनेको पैरसे मस्तकतक कीचड़के समुद्रमें डूबा हुआ पाता है; वह उस प्रकारके स्वप्नको देखनेपर जीवित नहीं रहता है और शीघ्र ही मर जाता है। जो भस्म, अंगारों, केशों, सूखी नदी तथा सर्पोंको स्वप्नमें देखता है; वह दस राततक जीवित नहीं रह पाता है। जो उठाये हुए शस्त्रोंवाले काले तथा विकट (विकराल) पुरुषोंके द्वारा पत्थरोंसे स्वप्नमें मारा जाता है, वह जीवित नहीं रहता है॥ १७-२०॥ | | सूर्योदये प्रत्यूषसि प्रत्यक्षं यस्य वै शिवाः।<br>क्रोशन्त्यभिमुखं प्रेत्य स गतायुर्भवेन्नरः॥ २१<br><br>यस्य वा स्नातमात्रस्य हृदयं पीड्यते भृशम्।<br>जायते दन्तहर्षश्च तं गतायुषमादिशेत्॥ २२<br><br>भूयो भूयस्त्रसेद्यस्तु रात्रौ वा यदि वा दिवा।<br>दीपगन्धं च नाघ्राति विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्॥ २३<br><br>रात्रौ चेन्द्रधनुः पश्येद्दिवा नक्षत्रमण्डलम्।<br>परनेत्रेषु चात्मानं न पश्येन्न स जीवति॥ २४ | सूर्योदयके समय प्रातःकाल जिसके सामने प्रत्यक्ष आकर सियार रुदन करते हैं, वह मनुष्य समाप्त आयुवाला होता है। स्नान करनेके तुरंत बाद जिसके हृदयमें तीव्र वेदना होती है और दाँतोंमें कम्पन होता है, उसे समाप्त आयुवाला समझना चाहिये। जो मनुष्य दिनमें अथवा रातमें बार-बार भयभीत होता हो और दीपककी गन्धको न सूँघ पाता हो, उसे अपनी मृत्युको उपस्थित जानना चाहिये। जो रातमें इन्द्रधनुषको तथा दिनमें तारामण्डलको देखे और दूसरोंके नेत्रोंमें अपना प्रतिबिम्ब न देख सके; वह जीवित नहीं रहता है॥ २१-२४॥ | | नेत्रमेकं स्रवेद्यस्य कर्णौ स्थानाच्च भ्रश्यतः।<br>वक्रा च नासा भवति विज्ञेयो गतजीवितः॥ २५<br><br>यस्य कृष्णा खरा जिह्वा पद्माभासं च वै मुखम्।<br>गण्डे वा पिण्डिकारक्ते तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ २६<br><br>मुक्तकेशो हसंश्चैव गायन्नृत्यंश्च यो नरः।<br>याम्यामभिमुखं गच्छेदन्तं तस्य जीवितम्॥ २७ | जिसके एक नेत्रसे पानी आता हो, दोनों कान अपने स्थानसे खिसके हुए हों और जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी हो, उसे समाप्त जीवनवाला समझना चाहिये। जिसकी जीभ काली तथा खुरदुरी हो जाय, मुख पाण्डुरवर्णवाला हो जाय और दोनों गाल खजूर फलके समान रक्तवर्णके हो जायँ, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जो मनुष्य स्वप्नमें खुले बालोंवाला होकर हँसता हुआ, गाता हुआ तथा नाचता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर जाता है, उसका जीवन समाप्त हो जाता है॥ २५-२७॥ | | यस्य श्वेतघनाभासा श्वेतसर्षपसन्निभा।<br>श्वेता च मूर्तिर्ह्यसकृत्तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ २८ | जिसका शरीर श्वेत मेघोंकी आभाके समान और |

अध्याय ९१ ] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४७१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उष्ट्रा वा रासभा वाभियुक्ताः स्वप्ने रथे शुभाः।<br>यस्य सोऽपि न जीवेत्तु दक्षिणाभिमुखो गतः॥ २९<br><br>द्वे वाथ परमेऽरिष्टे एकीभूतः परं भवेत्।<br>घोषं न शृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति॥ ३०<br><br>श्वभ्रे यो निपतेत्स्वप्ने द्वारं चापि पिधीयते।<br>न चोत्तिष्ठति यः श्वभ्रात्तदन्तं तस्य जीवितम्॥ ३१श्वेत सरसोंके समान गौर वर्णका हो जाय, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जिसके स्वप्नमें रथमें जुते हुए अशुभ ऊँट अथवा गधे दिखायी पड़ें और वह दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा हो, वह [व्यक्ति] जीवित नहीं रहता है। जो कानमें ध्वनि न सुन सके और नेत्रमें प्रकाश न देख सके—यदि ये दो बहुत अनिष्टकारी घटनाएँ स्वप्नमें एक साथ घटित हों, तो वह व्यक्ति मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें गड्ढेमें गिर पड़े तथा उसका द्वार बन्द हो जाय और वह गड्ढेसे निकल न सके, उसका जीवन समाप्त हो जाता है॥ २८—३१॥
ऊर्ध्वा च दृष्टिर्न च सम्प्रतिष्ठा<br>  रक्ता पुनः सम्परिवर्तमाना।<br>मुखस्य शोषः सुशिरा च नाभि-<br>  रत्युष्णमूत्रो विषमस्थ एव॥ ३२जिसके नेत्र ऊपरकी ओर उलट जायँ, स्थिर हो जायँ, रक्तवर्णके हो जायँ, बार-बार घूमते हों, मुख सूखने लगे, नाभि छिद्रयुक्त हो जाय, मूत्र अत्यधिक गर्म हो; वह संकटग्रस्त होता है अर्थात् उसकी मृत्यु आसन्न होती है॥ ३२॥
दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रत्यक्षं यो निहन्यते।<br>हन्तारं न च पश्येच्च स गतायुर्न जीवति॥ ३३<br><br>अग्निप्रवेशं कुरुते स्वप्नान्ते यस्तु मानवः।<br>स्मृतिं नोपलभेच्चापि तदन्तं तस्य जीवितम्॥ ३४<br><br>यस्तु प्रावरणं शुक्लं स्वकं पश्यति मानवः।<br>कृष्णं रक्तमपि स्वप्ने तस्य मृत्युरुपस्थितः॥ ३५जो दिनमें अथवा रातमें किसीके द्वारा प्रत्यक्ष रूपसे मारा जाय, किंतु मारनेवालेको देख न सके; वह समाप्त आयुवाला होता है और जीवित नहीं रह पाता है। जो मनुष्य स्वप्नमें अग्निमें प्रवेश करे और स्वप्नके अन्तमें इसका स्मरण न कर सके; उसका जीवन समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य स्वप्नमें अपने श्वेत प्रावरण (ओढ़नेके वस्त्र)-को काला तथा लाल देखता है, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है॥ ३३—३५॥
अरिष्टे सूचिते देहे तस्मिन् काल उपस्थिते।<br>त्यक्त्वा खेदं विषादं च उपेक्षेद् बुद्धिमान्नरः॥ ३६उस मृत्युकालके उपस्थित होनेपर और शरीरमें अरिष्टके सूचित होनेपर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि खेद तथा विषादका परित्यागकर उपेक्षाभाव धारण करे॥ ३६॥
प्राचीं वा यदि वोदीचीं दिशं निष्क्रम्य वै शुचिः।<br>समेऽतिस्थावरे देशे विविक्ते जन्तुवर्जिते॥ ३७<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा स्वस्थश्चाचान्त एव च।<br>स्वस्तिकेनोपविष्टस्तु नमस्कृत्वा महेश्वरम्॥ ३८<br><br>समकायशिरोग्रीवो धारयन्नावलोकयेत्।<br>यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता॥ ३९पूरब या उत्तर दिशामें जाकर पवित्र हो करके किसी समतल, अतिस्थावर (आकाशरहित), एकान्त तथा जन्तुविहीन स्थानमें पूरब या उत्तरकी ओर मुख करके स्वस्तिक आसनमें बैठ जाय और शान्त होकर आचमन करके महेश्वरको प्रणामकर शरीर, सिर तथा गर्दनको सीधा करके धारणा करते हुए किसी वस्तुकी ओर न देखे, जैसे वायुरहित स्थानमें रखे दीपककी लौ विचलित नहीं होती है; इसके लिये यह उपमा बतायी
४७२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रागुदक्प्रवणे देशे तथा युञ्जीत शास्त्रवित्।<br>कामं वितर्कं प्रीतिं च सुखदुःखे उभे तथा॥ ४०<br><br>निगृह्य मनसा सर्वं शुक्लं ध्यानमनुस्मरेत्।<br>घ्राणे च रसने नित्यं चक्षुषी स्पर्शने तथा॥ ४१<br>श्रोत्रे मनसि बुद्धौ च तत्र वक्षसि धारयेत्।<br>कालकर्माणि विज्ञाय समूहेष्वेव नित्यशः॥ ४२<br>द्वादशाध्यात्ममित्येवं योगधारणमुच्यते।<br>शतमर्धशतं वापि धारणां मूर्ध्नि धारयेत्॥ ४३<br>खिन्नस्य धारणाद्योगाद्वायुरूर्ध्वं प्रवर्तते।<br>ततश्चापूरयेद्देहमोङ्कारेण समन्वितः॥ ४४गयी है॥ ३७-३९॥<br><br>शास्त्रवेत्ताको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर विस्तारवाले स्थानमें ध्यानपरायण होवे। उसे कामना, तर्क, आसक्ति तथा सुख-दुःखको मनसे नियन्त्रित करके पूर्ण विशुद्ध ध्यानमें लीन हो जाना चाहिये। काल तथा कर्मोंको सदा लिङ्गशरीरोंके अन्तर्गत समझकर नाक, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन, बुद्धि तथा हृदयमें धारणा करनी चाहिये। इस प्रकार योगधारणको द्वादशाध्यात्म (बारह अध्यात्म) नामवाला कहा जाता है। सौ अथवा पचास धारणाको सिरमें धारण करना चाहिये। धारणाके अभ्याससे श्रान्त योगीकी वायु ऊपरकी ओर होने लगती है; तब ओंकारसे युक्त होकर शरीरको वायुसे पूर्ण करना चाहिये। इस प्रकार ओंकारमय योगी [अपनेको] ब्रह्ममें लीन करके ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ४०-४४ १/२॥
तथोङ्कारमयो योगी अक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ओङ्कारप्राप्तिलक्षणम्॥ ४५<br>एष त्रिमात्रो विज्ञेयो व्यञ्जनं चात्र चेश्वरः।<br>प्रथमा विद्युती मात्रा द्वितीया तामसी स्मृता॥ ४६<br>तृतीयां निर्गुणां चैव मात्रामक्षरगामिनीम्।<br>गान्धारी चैव विज्ञेया गान्धारस्वरसम्भवा॥ ४७<br>पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते।<br>यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतिनिर्याति मूर्धनि॥ ४८<br>तथोङ्कारमयो योगी त्वक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मलक्षणमुच्यते॥ ४९<br>अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्।[हे ऋषियो!] इसके बाद मैं ओंकारकी प्राप्तिका लक्षण बताऊँगा। इसे तीन मात्रावाला जानना चाहिये। इसमें व्यंजनसहित मकार ईश्वर (शिव) है। इसमें पहली मात्रा विद्युती (राजसी) एवं दूसरी मात्रा तामसी कही गयी है। तीसरी मकाररूप अक्षरगामिनी मात्राको सत्त्वगुणरूपवाली जानना चाहिये। इसे गान्धारी नामसे भी जानना चाहिये; क्योंकि यह गान्धारस्वरसे उत्पन्न है और पिपीलिकाकी गतिके स्पर्शके समान सूक्ष्म गतिवाली है तथा यह मूर्धदेशमें लक्षित होती है। जिस प्रकार उच्चारित किया गया ओंकार मूर्धा देशमें गमन करता है, वैसे ही ओंकारमय योगी ब्रह्ममें लीन होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है। परमेश्वरका वाचक प्रणव ही धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकके द्वारा ही वह लक्ष्य वेधा जा सकता है, इसलिये उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४५-४९ १/२॥
ओमित्येकाक्षरं ह्येतद् गुहायां निहितं पदम्॥ ५०<br>ओमित्येतत् त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रयोऽग्नयः।<br>विष्णुक्रमास्त्रयस्त्वेते ऋक्सामानि यजूंषि च॥ ५१'ओम्'—यह एकाक्षर पद गुहा (बुद्धि)-में निहित है। यह 'ओम्' तीनों लोकों, [ऋक्-यजुः-साम] तीनों वेदों, तीनों अग्नियों तथा विष्णुके तीनों पदोंके स्वरूपवाला

अध्याय ११ ] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४७३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मात्रा सार्धं च तिस्रस्तु विज्ञेयाः परमार्थतः।<br>तत्प्रयुक्तस्तु यो योगी तस्य सालोक्यमाप्नुयात् ॥ ५२है; वस्तुतः अर्धमात्रासहित इसकी तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। जो योगी इस प्रणवसे प्रेरित होता है, वह ब्रह्मका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥५०—५२॥
अकारो ह्यक्षरो ज्ञेय उकारः सहितः स्मृतः।<br>मकारसहितोङ्कारस्त्रिमात्र इति संज्ञितः॥५३<br><br>अकारस्त्वेष भूर्लोक उकारो भुव उच्यते।<br>सव्यञ्जनो मकारस्तु स्वर्लोक इति गीयते॥५४<br><br>ओङ्कारस्तु त्रयो लोकाः शिरस्तस्य त्रिविष्टपम्।<br>भुवनाङ्गं च तत्सर्वं ब्राह्मं तत्पदमुच्यते॥५५<br><br>मात्रापादो रुद्रलोको ह्यमात्रं तु शिवं पदम्।<br>एवं ज्ञानविशेषेण तत्पदं समुपास्यते॥५६<br><br>तस्माद्ध्यानरतिर्नित्यममात्रं हि तदक्षरम्।<br>उपास्यं हि प्रयत्नेन शाश्वतं सुखमिच्छता॥५७अकारको अक्षर जानना चाहिये; इसके साथ उकारका संयोग कहा गया है। पुनः मकार (अनुस्वार)-के योगसे बना हुआ ओंकार तीन मात्रावाला कहा गया है। अकारको भूलोक तथा उकारको भुवर्लोक कहा जाता है। व्यंजनसहित मकारको स्वर्लोक कहा जाता है। ओंकार त्रिलोकस्वरूप है, उसका सिर स्वर्ग है, सभी भुवन अंग हैं। ब्रह्मलोकको उसका पाद कहा जाता है। रुद्रलोक मात्रापादरूप है। शिवपद मात्रासे अतीत है— इस ज्ञानविशेषके द्वारा उस तुरीय पदकी उपासना की जाती है। इसलिये सदा ध्यानपरायणता होनी चाहिये। शाश्वत (स्थिर) सुख चाहनेवालेको उस मात्रातीत अक्षर [शिवतत्त्व]-की प्रयत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिये॥५३—५७॥
ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा ततो दीर्घा त्वनन्तरम्।<br>ततः प्लुतवती चैव तृतीया चोपदिश्यते॥५८<br><br>एतास्तु मात्रा विज्ञेया यथावदनुपूर्वशः।<br>यावदेव तु शक्यन्ते धार्यन्ते तावदेव हि॥५९<br><br>इन्द्रियाणि मनो बुद्धिं ध्यायन्नात्मनि यः सदा।<br>अर्ध तन्मात्रमपि चेच्छृणु यत्फलमाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>मासे मासेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः।<br>तेन यत्प्राप्यते पुण्यं मात्रया तदवाप्नुयात् ॥ ६१<br><br>न तथा तपसोग्रेण न यज्ञैर्भूरिदक्षिणैः।<br>यत्फलं प्राप्यते सम्यङ्मात्रया तदवाप्नुयात् ॥ ६२[ॐकी] पहली मात्रा ह्रस्व है और दूसरी मात्रा दीर्घ है। तीसरी मात्रा प्लुत कही जाती है। इन मात्राओंको क्रमशः यथावत् जानना चाहिये। जितना अपना सामर्थ्य हो सके, उतना मनीषी लोग इन्हें धारण कर सकते हैं। इन्द्रियों, मन तथा बुद्धिको नियन्त्रित करके यदि जो कोई आत्मामें सदा अर्धमात्राका ध्यान करता है, तो वह जिस फलको प्राप्त करता है, उसे सुनिये। जो सौ वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासमें अश्वमेध यज्ञ करता है, वह उसके द्वारा जो पुण्य पाता है, उसे इस मात्रासे प्राप्त कर लेता है। जो फल न तो कठोर तपस्यासे और न तो विपुल दक्षिणावाले यज्ञोंसे प्राप्त किया जा सकता है, वह फल इस मात्राके द्वारा सम्यक् प्राप्त हो जाता है॥५८—६२॥
तत्र चैषा तु या मात्रा प्लुता नामोपदिश्यते।<br>एषा एव भवेत्कार्या गृहस्थानां तु योगिनाम्॥६३<br><br>एषा चैव विशेषेण ऐश्वर्ये ह्राष्टलक्षणे।<br>अणिमाद्ये तु विज्ञेया तस्माद्युञ्जीत तां द्विजाः॥६४उस प्रणवमें जो यह प्लुत नामक मात्रा बतायी गयी है, गृहस्थ योगियोंको उसका अभ्यास करना चाहिये। विशेषरूपसे आठ लक्षणोंवाले अणिमा आदि ऐश्वर्यों (सिद्धियों)-के लिये इस मात्राको जानना चाहिये; अतः हे द्विजो! उस मात्राकी साधना करनी चाहिये॥६३-६४॥
४७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं हि योगसंयुक्तः शुचिर्दान्तो जितेन्द्रियः।<br>आत्मानं विद्यते यस्तु स सर्वं विन्दते द्विजाः॥ ६५<br><br>तस्मात्पाशुपतैर्यौगैरात्मानं चिन्तयेद् बुधः।<br>आत्मानं जानते ये तु शुचयस्ते न संशयः॥ ६६हे द्विजो ! इस प्रकार योगसम्पन्न, विशुद्ध, मनपर नियन्त्रण करनेवाला तथा जितेन्द्रिय जो व्यक्ति आत्माको जान लेता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। अतः बुद्धिमान्‌को पाशुपत योगोंके द्वारा आत्मचिन्तन करना चाहिये। जो आत्माको जान लेते हैं, वे शुद्ध हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६५-६६॥
ऋचो यजूंषि सामानि वेदोपनिषदस्तथा।<br>योगज्ञानादवाप्नोति ब्राह्मणोऽध्यात्मचिन्तकः॥ ६७<br><br>सर्वदेवमयो भूत्वा अभूतः स तु जायते।<br>योनिसङ्क्रमणं त्यक्त्वा याति वै शाश्वतं पदम्॥ ६८अध्यात्मका चिन्तन करनेवाला ब्राह्मण योगज्ञानके द्वारा ऋक्-यजुः-सामकी ऋचाओं, सभी वेदों तथा उपनिषदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है। वह सर्वदेवमय होकर लिङ्गशरीरसे शून्य हो जाता है और पुनर्जन्मका त्याग करके शाश्वत पद (शिवपद)-को प्राप्त करता है॥ ६७-६८॥
यथा वृक्षात्फलं पक्वं पवनेन समीरितम्।<br>नमस्कारेण रुद्रस्य तथा पापं प्रणश्यति॥ ६९<br><br>यत्र रुद्रनमस्कारः सर्वकर्मफलो ध्रुवः।<br>अन्यदेवनमस्कारान्न तत्फलमवाप्नुयात्॥ ७०<br><br>तस्मात् त्रिःप्रवणं योगी उपासीत महेश्वरम्।<br>दशविस्तारकं ब्रह्म तथा च ब्रह्मविस्तरैः॥ ७१जिस प्रकार पका हुआ फल वायुद्वारा हिलाये जानेपर वृक्षसे गिर पड़ता है, उसी प्रकार भगवान् सदाशिवके नमस्कारसे पाप नष्ट हो जाता है। रुद्रनमस्कार निश्चितरूपसे सभी कर्मोंका फल देनेवाला है; अन्य देवताओंको नमस्कार करनेसे उनका फल प्राप्त नहीं होता है, अतः मन, वचन, कर्म—इन तीनोंसे विनम्र होकर योगीको महेश्वर तथा दसों इन्द्रियोंका विस्तार करनेवाले ब्रह्मकी उपासना दसों इन्द्रियोंसे करनी चाहिये॥ ६९—७१॥
एवं ध्यानसमायुक्तः स्वदेहं यः परित्यजेत्।<br>स याति शिवसायुज्यं समुद्धृत्य कुलत्रयम्॥ ७२<br><br>अथवारिष्टमालोक्य मरणे समुपस्थिते।<br>अविमुक्तेश्वरं गत्वा वाराणस्यां तु शोधनम्॥ ७३<br><br>येन केनापि वा देहं सन्त्यजेन्मुच्यते नरः।<br>श्रीपर्वते वा विप्रेन्द्राः सन्त्यजेत्स्वतनं नरः॥ ७४<br><br>स याति शिवसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रं जन्तूनां मुक्तिदं सदा॥ ७५<br><br>सेवेत सततं धीमान् विशेषान्मरणान्तिके॥ ७६इस प्रकार ध्यानमग्न होकर जो अपने शरीरका त्याग करता है, वह तीनों कुलोंका उद्धार करके शिवसायुज्य प्राप्त करता है। अथवा [योगोपासनामें असमर्थ होनेपर] कुछ अरिष्ट देखनेपर और मृत्यु आसन्न होनेपर वाराणसीमें अविमुक्तेश्वरमें जाकर शुद्धि (प्रायश्चित्त) करनी चाहिये; जिस-किसी तरह वहाँ देहत्याग कर देना चाहिये; इससे वह मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे विप्रेन्द्रो ! जो मनुष्य श्रीपर्वतपर अपने शरीरको छोड़ता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् [व्यक्ति]-को प्राणियोंको सदा मुक्ति देनेवाले उत्तम अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में विशेषरूपसे मरणकालमें वास करना चाहिये॥ ७२—७६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अरिष्टकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः॥ ९१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अरिष्टकथन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९१॥

९२- अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वर-पूजाविधिवर्णन

अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७५


बानबेवाँ अध्याय

अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>एवं वाराणसी पुण्या यदि सूत महामते।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्प्रभावं हि साम्प्रतम्॥ १<br><br>क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्यमविमुक्तस्य शोभनम्।<br>विस्तरेण यथान्यायं श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ २**ऋषिगण बोले—**हे महाबुद्धिमान् सूतजी! यदि वाराणसी ऐसी पुण्यदायिनी है, तो अब हमलोगोंको उसका प्रभाव कृपापूर्वक बताइये; हमलोगोंको इस अविमुक्तक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको विस्तारपूर्वक विधिके अनुसार सुननेकी बड़ी उत्सुकता है॥ १-२॥
सूत उवाच<br>वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सम्यक् वाराणस्याः सुशोभनम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं यथाहा भगवान् भवः॥ ३<br><br>विस्तरेण मया वक्तुं ब्रह्मणा च महात्मना।<br>शक्यते नैव विप्रेन्द्रा वर्षकोटिशतैरपि॥ ४**सूतजी बोले—**वाराणसीके अविमुक्तक्षेत्रके अति उत्तम माहात्म्यको मैं भली-भाँति संक्षेपमें बता रहा हूँ, जैसा कि भगवान् शिवने कहा था। हे विप्रेन्द्रो! मेरे तथा महात्मा ब्रह्माके द्वारा सौ करोड़ वर्षोंमें भी विस्तारसे इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ ३-४॥
देवः पुरा कृतोद्वाहः शङ्करो नीललोहितः।<br>हिमवच्छिखराद्देव्या हैमवत्या गणेश्वरैः॥ ५<br><br>वाराणसीमनुप्राप्य दर्शयामास शङ्करः।<br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं वासं तत्र चकार सः॥ ६प्राचीन कालमें विवाह करनेके पश्चात् नीललोहित भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरसे देवी पार्वती तथा गणेश्वरोंके साथ वाराणसीमें पहुँचकर [अपने] अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन कराया और वे वहीं रहने लगे।
वाराणसीकुरुक्षेत्रश्रीपर्वतमहालये ।<br>तुङ्गेश्वरे च केदारे तत्स्थाने यो यतिर्भवेत्॥ ७<br><br>योगे पाशुपते सम्यक् दिनमेकं यतिर्भवेत्।<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य चरेत्पाशुपतं व्रतम्॥ ८वाराणसी, कुरुक्षेत्र, श्रीपर्वत, महालय, तुंगेश्वर और केदार—इन स्थानोंमें जो यति होता है; वह दूसरे जन्ममें पाशुपतयोग सिद्ध हो जानेपर एक ही दिनमें सम्यक् (ब्रह्मज्ञानसम्पन्न) यति हो जाता है। अतः सबकुछ छोड़कर पाशुपतव्रत करना चाहिये और वहाँ देवोद्यानमें वास करना चाहिये।
देवोद्याने वसेत्तत्र शर्वोद्यानमनुत्तमम्।<br>मनसा निर्ममे रुद्रो विमानं च सुशोभनम्॥ ९शिवजीका उद्यान अत्यन्त उत्तम है। रुद्रने मनसे एक परम सुन्दर भवनका निर्माण किया है।
दर्शयामास च तदा देवोद्यानमनुत्तमम्।<br>हैमवत्याः स्वयं देवः सनन्दी परमेश्वरः॥ १०तब नन्दीसहित देव परमेश्वरने स्वयं पार्वतीको उस अत्युत्तम देवोद्यान

४७६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्यमविमुक्तस्य शङ्करः।<br>उक्तवान् परमेशानः पार्वत्याः प्रीतये भवः॥ ११॥(आनन्दकानन)-को दिखाया। भगवान् परमेश्वर शंकरने पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये इस अविमुक्तक्षेत्रके माहात्म्यका वर्णन किया॥ ५-११॥
प्रफुल्लनानाविधगुल्मशोभितं लताप्रतानादिमनोहरं बहिः।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ १२<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभि-र्णिकामपुष्पैर्बकुलैश्च सर्वतः।<br>अशोकपुन्नागशतैः सुपुष्पितै-र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ १३वह उद्यान अनेक प्रकारके विकसित गुल्मोंसे सुशोभित था, बाहरसे लता-शाखाओं आदिसे अत्यन्त मनोहर था और विरूढ़ पुष्पोंवाले प्रियंगुसे तथा पूर्ण रूपसे खिले हुए काँटेदार केतकीवृक्षोंसे युक्त था। वह सुगन्धसे युक्त तमालके गुच्छोंसे घिरा हुआ था, अत्यधिक पुष्पोंवाले बकुलके वृक्षोंसे सभी ओरसे सुशोभित था और भौरोंकी पंक्तियोंसे शोभायमान तथा खिले हुए पुष्पोंवाले सैकड़ों अशोक एवं पुन्नागके वृक्षोंसे युक्त था॥ १२-१३॥
क्वचित्प्रफुल्लाम्बुजरेणुभूषितै-र्विहङ्गमैश्चानुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसचक्रवाकैः प्रमत्तदात्यूहवरैश्च सर्वतः॥ १४वह उद्यान कहीं विकसित कमलोंके परागसे भूषित पक्षियों सारस, चक्रवाक तथा उन्मत्त श्रेष्ठ पपीहा नामक पक्षियोंकी मधुर ध्वनियोंसे सभी ओर विशेष रूपसे गुंजित था॥ १४॥
क्वचिच्च केकारुतनादितं शुभं क्वचिच्च कारण्डवनादनादितम्।<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतं मदाकुलाभिर्भ्रमराङ्गनादिभिः ॥ १५वह सुन्दर उद्यान कहीं-कहीं मयूरोंकी ध्वनिसे निनादित था, कहीं-कहीं कारण्डव पक्षीकी ध्वनिसे शब्दायमान था और कहीं-कहीं मत्त भ्रमर-समूहोंसे तथा मदसे आकुल भ्रमरांगनाओंसे गुंजायमान था॥ १५॥
निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पकैः क्वचित्सुपुष्पैः सहकारवृक्षैः।<br>लतोपगूढैस्तिलकैश्च गूढं प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणम् ॥ १६वह उद्यान कहीं-कहीं अति सुगन्धित पुष्पोंसे युक्त था, कहीं-कहीं सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए आमके वृक्षोंसे सुशोभित था, लताओंसे परिपूर्ण तिलक वृक्षोंसे समन्वित था और विद्याधरों-सिद्धों तथा चारणोंके गायनसे युक्त था॥ १६॥
प्रवृत्तनृत्तानुगताप्सरोगणं प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितम् ।<br>प्रवृत्तहारीतकुलोपनादितं मृगेन्द्रनादाकुलमत्तमानसैः ॥ १७<br>क्वचित्क्वचिद्गन्धकदम्बकैर्मृगै-र्विलूनदर्भाङ्कुरपुष्पसञ्चयम् ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः सरस्तडागैरुपशोभितं क्वचित्॥ १८वहाँ अप्सराओंका समूह नृत्य करनेमें लीन था, अनेक प्रकारके प्रसन्न पक्षी वहाँ निवास करते थे, वह उद्यान नृत्य करते हुए हारीत पक्षियोंके समुदायोंसे निनादित था। वह कहीं-कहीं सिंहोंके नादसे आकुल तथा मत्त मनवाले कस्तूरीमृग-समुदायोंसे चरे गये दर्भांकुरों तथा पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं-कहीं अनेकविध विकसित सुन्दर कमलोंसे युक्त सरोवरों तथा तड़ागोंसे सुशोभित था॥ १७-१८॥
विटपनिचयलीनं नीलकण्ठाभिरामं मदमुदितविहङ्गं प्राप्तनादाभिरामम्।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं नवकिसलयशोभाशोभितं प्रांशुशाखम्॥ १९वह उद्यान वृक्षोंके समुदायोंसे सम्पन्न था, नीलकण्ठ पक्षियोंके द्वारा सुन्दर प्रतीत होता था, प्रसन्न मनवाले
अध्याय ९२ ]अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन४७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्वचिच्च दन्तक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिनीभि-<br>र्निषेवितं किम्पुरुषाङ्गनाभिः॥ २०पक्षियोंसे युक्त था, [सभी ओर] ध्वनि होनेसे यह अति सुन्दर था, खिले हुए पुष्पोंवाले वृक्षोंकी शाखाओंमें विद्यमान मस्त भौरोंसे सुशोभित था, नूतन कलियोंकी सुन्दरतासे सुशोभित था और ऊँची-ऊँची शाखाओंसे युक्त था ॥ १९ ॥<br><br>वह उद्यान कहीं-कहीं दाँतोंसे क्षत की गयी सुन्दर लताओंसे सुशोभित था, कहीं-कहीं लताओंसे वेष्टित वृक्षोंसे मण्डित था और कहीं-कहीं विलासके कारण मन्थर गतिवाली किंपुरुष अंगनाओंसे सेवित था ॥ २० ॥
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रङ्कषैः सितमनोहरचारुरूपैः।<br>आकीर्णपुष्यनिकरप्रविभक्तहंसै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदिव्यकुलैरनेकः॥ २१<br><br>फुल्लोत्पलाम्बुजवितानसहस्रयुक्तं<br>तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम्।<br>मार्गान्तराकलितपुष्पविचित्रपंक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्र्विविधैरुपेतम् ॥ २२वह उद्यान पारावत पक्षियोंकी ध्वनिसे निनादित तथा गगनचुम्बी शृंगोंवाले वृक्षोंसे, बिखरे हुए पुष्पसमूहोंको विभक्त कर देनेवाले श्वेत वर्णके मनोहर तथा सुन्दर रूपवाले हंसोंसे और अनेक देवताओंके दिव्य कुलोंसे सुशोभित है। वह विकसित नीलकमलके हजारों वितानोंसे युक्त है, जलाशयोंसे सुशोभित देवमार्गवाला है और मार्गके मध्यमें खिले हुए विचित्र पुष्पोंकी पंक्तिसे सम्बद्ध विविध गुल्मों तथा विटपोंसे समन्वित है॥ २१-२२॥
तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्पैस्तबकभरनतप्रांशुशाखैरशोकै-<br>र्दोलान्तान्तालीनश्रुतिसुखजनकैर्भासितान्तं मनोज्ञैः।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुप्तप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदूर्वाङ्कुराग्रम् ॥ २३<br><br>हंसानां पक्षवातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रचकितकदलीचाटुनृत्यन्मयूरम् ।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदवनिगतैरञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विलीनप्रमुदितविलसन् मत्तहारीतवृन्दम् ॥ २४उस वनका प्रान्तभाग तुंग अग्रभागवाले, नीलपुष्प-गुच्छोंके भारसे झुकी हुई ऊँची शाखाओंवाले, वायुके द्वारा आन्दोलित होनेपर कानोंको सुख देनेवाली ध्वनिसे भासित अन्तर्भागवाले मनोहर अशोक वृक्षोंसे युक्त है। वह रात्रिमें चन्द्रकी किरणोंसे कुसुमित तिलक वृक्षोंके साथ एकताको प्राप्त है और छायामें सोकर उठे हुए हरिणके समुदायके द्वारा चरे गये दूर्वांकुरोंके अग्रभागोंसे युक्त है। वह हंसोंके पंखोंकी वायुसे हिले हुए कमल तथा स्वच्छ और विस्तीर्ण जलसे समन्वित है, सरोवरोंके तटपर उत्पन्न तथा चकित कर देनेवाले कदलीपत्रोंकी चाटुकारितामें नाचते हुए मयूरोंसे युक्त है, कहीं पृथ्वीपर मयूरोंके पंखमें स्थित चन्दासे अलंकृत भूभागसे सुशोभित है और स्थान-स्थानपर छिपे हुए प्रमुदित, मत्त तथा क्रीड़ा करते हुए हारीत पक्षिसमूहोंसे सुशोभित है॥ २३-२४॥
सारङ्गैः क्वचिदुपशोभितप्रदेशं<br>प्रच्छन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किन्नराङ्गनाभि-<br>र्वीणाभिः सुमधुरगीतनृत्तकण्ठम् ॥ २५वह उद्यान सारंग हरिणोंसे कहीं-कहीं सुशोभित भागवाला है, कहीं-कहीं विकसित पुष्पोंसे आच्छादित है। कहीं-कहीं प्रसन्नचित्त किन्नरांगनाओंके द्वारा बजायी गयी वीणाओंकी मधुर ध्वनि-गान-नृत्यसे सुशोभित है।
संस्पृष्टैः क्वचिदुपलिप्तकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात्फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ २५-२६वह कहीं लीपी हुई, परस्पर सटी हुई तथा बिखरे पुष्पोंसे सुशोभित मुनियोंकी कुटियोंसे घिरे हुए वृक्षोंसे समन्वित है। वह कहीं जड़से ही फलोंसे लदे हुए, विशाल तथा ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे व्याप्त है॥ २५-२६॥
फुल्लातिमुक्तकलतागृहनीतसिद्ध-<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुररावरम्यम् ।<br>रम्यं प्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीकवलिताम्रकदम्बपुष्पम् ॥ २७वह उद्यान पूर्णतः पुष्पित लतागृहोंमें ले जायी गयी सिद्धोंकी सिद्धांगनाओंके सुवर्णमय नूपुरकी ध्वनिसे रमणीय है, प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर मँडराते हुए भौंरोंसे सुशोभित है और भौंरोंकी पंक्तियोंसे आस्वादित आम्र तथा कदम्बके पुष्पोंसे समन्वित है॥ २७॥
पुष्पोत्करानिलविधूर्णितवारिरम्यं<br>रम्यद्विरेफविनिपातितमञ्जुगुल्मम् ।<br>गुल्मान्तरप्रसभभीतमृगीसमूहं<br>वातेरितं तनुभृतामपवर्गदातृ॥ २८वह उद्यान पुष्पसमूहोंसे सुवासित वायुसे आन्दोलित जलाशयोंसे सुशोभित है, भौंरोंके द्वारा गिराये गये सुन्दर पुष्पोंके गुच्छोंसे युक्त है, वृक्षकुंजोंमें अत्यधिक डरी हुई हिरणियोंके झुण्डोंसे मण्डित है और वायुसे प्रेरित है। वह उद्यान मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है॥ २८॥
चंद्रांशुजालशबलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकरद्युतिसमैरथ कर्णिकारैः<br>पुष्पोत्करैरुपचितं सुविशालशाखैः॥ २९वह चन्द्रमाकी किरणोंके जालसे विविध रंगोंवाले मनोहर तिलकवृक्षोंसे युक्त है, सिन्दूर-कुंकुम तथा कुसुम्भ रंगकी आभावाले अशोक वृक्षोंसे युक्त है और सुवर्णकी कान्तिवाले, विशाल शाखाओंवाले तथा पुष्पोंसे लदे हुए कनेर वृक्षोंसे युक्त है॥ २९॥
क्वचिदञ्जनचूर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसङ्काशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ३०उस उद्यानकी भूमि कहीं-कहीं अंजनके चूर्णके समान आभावाले, कहीं विद्रुमके समान कान्तिवाले और कहीं सुवर्णसदृश प्रभाववाले पुष्पोंसे आच्छादित रहती थी॥ ३०॥
पुन्नागेषु द्विजशतविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनतम् ।<br>रम्योपान्तक्लमहरभवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ३१उस उद्यानमें पुन्नागके वृक्षोंपर सैकड़ों पक्षियोंकी ध्वनि होती रहती थी, गुच्छोंके भारसे रक्त अशोकवृक्ष झुके रहते थे, रम्य सीमास्थलपर थकानको हरनेवाले भवन थे और खिले हुए कमलोंपर भौंरे मँडराते रहते थे॥ ३१॥
सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरपुत्र्या सार्धमिष्टैर्गणेशैः।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्नपुष्टै-<br>रुपवनमतिरम्यं दर्शयामास देव्याः॥ ३२उस समय हिमालयपुत्री [पार्वती] और मत्त, प्रसन्न तथा शरीरसे पुष्ट प्रिय गणेश्वरोंके साथ विद्यमान सम्पूर्ण भवनोंके भर्ता शिवने अनेकविध विशाल वृक्षोंवाले अत्यन्त रम्य उपवनको देवीको दिखाया॥ ३२॥
पुष्पैर्वन्यैः शुभ्रशुभतमैः कल्पितैर्दिव्यभूषै-<br>र्देवीं दिव्यामुपवनगतां भूषयामास शर्वः।<br>सा चाप्येनं तुहिनगिरिसुता शङ्करं देवदेवं<br>पुष्पैर्दिव्यैः शुभतरतमैर्भूषयामास भक्त्या॥ ३३शिवजीने अत्यन्त सुन्दर वन्य पुष्पोंसे बनाये गये दिव्य आभूषणोंसे उपवनमें गयी हुई दिव्य देवीको सजाया और उन पार्वतीने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य

अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुष्पोंसे इन देवदेव शंकरको भक्तिपूर्वक अलंकृत किया॥ ३३॥
सम्पूज्य पूज्यं त्रिदशेश्वराणां<br>सम्प्रेक्ष्य चोद्यानमतीव रम्यम्।<br>गणेश्वरैर्नन्दिमुखैश्च सार्ध-<br>मुवाच देवं प्रणिपत्य देवी॥ ३४तदनन्तर उस अत्यन्त रम्य उद्यानको देखकर नन्दी आदि गणेश्वरोंके साथ देवताओंके लिये पूज्य देव [शंकर]-की पूजा करके और उन्हें प्रणामकर देवी [पार्वती] कहने लगीं॥ ३४॥
श्रीदेव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव प्रभया परया युतम्।<br>क्षेत्रस्य च गुणान् सर्वान् पुनर्मे वक्तुमर्हसि॥ ३५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य सर्वथा।<br>वक्तुमर्हसि देवेश देवदेव वृषध्वज॥ ३६श्रीदेवी बोलीं—हे देव! आपने परम शोभासे युक्त उद्यानको मुझे दिखाया; अब आप इस क्षेत्रके समस्त गुणोंको मुझे बतानेकी कृपा करें। हे देवेश! हे देवदेव! हे वृषभध्वज! आप इस अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य पूर्णरूपसे बतायें॥ ३५-३६॥
सूत उवाच<br>देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वरप्रभुः।<br>आघ्राय वदनाम्भोजं तदाह गिरिजां हसन्॥ ३७सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब देवीका वह वचन सुनकर देवदेव श्रेष्ठ प्रभु उनके मुखकमलको सूँघकर हँसते हुए पार्वतीसे कहने लगे॥ ३७॥
श्रीभगवानुवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा॥ ३८<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः॥ ३९<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं युक्तात्मानो जितेन्द्रियाः।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगशोभिते॥ ४०<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे॥ ४१श्रीभगवान् बोले—वाराणसी नामक यह मेरा नित्य गुह्यतम क्षेत्र है; यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका हेतु है। हे देवि! इस [क्षेत्र]-में सिद्ध लोग सदा मेरे व्रतमें स्थित रहते हैं और मेरे लोककी अभिलाषा करनेवाले लोग नित्य अनेकविध लिङ्गोंको धारण किये रहते हैं। अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सुशोभित, कमल तथा उत्पलके पुष्पोंसे सम्पन्न सरोवरोंसे अलंकृत और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित इस शुभ क्षेत्रमें युक्तात्मा जितेन्द्रिय लोग श्रेष्ठ योगका अभ्यास करते हैं॥ ३८-४१॥
रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि नित्यार्पितक्रियः॥ ४२<br>यथा मोक्षमवाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित्।<br>कामं ह्यत्र मृतो देवि जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ४३<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतमं महत्।<br>ब्रह्मादयो विजानन्ति ये च सिद्धा मुमुक्षवः॥ ४४<br>अतः परमिदं क्षेत्रं परा चेयं गतिर्मम।<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन॥ ४५[हे देवि!] जिस कारणसे मुझे यहाँ निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मुझमें अपने मनको स्थिर रखनेवाला तथा मुझमें सदा सभी क्रियाएँ अर्पित करनेवाला मेरा भक्त जिस प्रकारका मोक्ष यहाँ प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं। हे देवि! यहाँ मरनेवाला प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है। मेरा यह पुर दिव्य, गुह्यसे भी गुह्यतम तथा महान् है—इसे ब्रह्मा आदि, सिद्धगण तथा मुक्तिके इच्छुक लोग जानते हैं। अतः यह परम क्षेत्र मेरी परम गति है। मैंने कभी भी इसका त्याग नहीं किया है और न तो कभी इसका त्याग करूँगा, अतः मेरा यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया
४८०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
है॥ ४२-४५ ^{१}/_{२} ॥
मम क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिति स्मृतम्।<br>नैमिषे च कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ ४६<br>स्नानात्संसेवनाद्वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः।<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद्विशिष्यते॥ ४७<br>प्रयागे वा भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात्।<br>प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादविमुक्तमिदं शुभम्॥ ४८नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा पुष्करमें स्नान करने तथा वहाँ निवास करनेसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है, बल्कि यहाँ प्राप्त हो जाता है, अतः यह [अन्य तीर्थोंसे] विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा यहाँपर मेरे परिग्रहके कारण मुक्ति होती है; तीर्थोंमें अग्रणी (श्रेष्ठ) प्रयागसे भी शुभ यह अविमुक्त [क्षेत्र] है॥ ४६-४८ ^{१}/_{२} ॥
धर्मस्योपनिषत्सत्यं मोक्षस्योपनिषच्छमः।<br>क्षेत्रतीर्थोपनिषदं न विदुर्बुधसत्तमाः॥ ४९धर्मका सारतत्त्व सत्य है, मोक्षका सारतत्त्व शम है; किंतु क्षेत्रतीर्थके सारतत्त्वको ऋषिगण भी नहीं जानते हैं॥ ४९॥
कामं भुञ्जन् स्वपन् क्रीडन् कुर्वन् हि विविधाः क्रियाः।<br>अविमुक्ते त्यजेत्प्राणान् जन्तुर्मोक्षाय कल्पते॥ ५०इच्छानुसार खाता हुआ, सोता हुआ, क्रीड़ा करता हुआ तथा अनेक क्रियाएँ करता हुआ भी प्राणी इस अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणत्याग करे, तो वह मोक्ष प्राप्त करता है॥ ५०॥
कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्।<br>न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना॥ ५१<br>तस्मात्संसेवनीयं हि अविमुक्तं हि मुक्तये।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं गतो यत्र महातपाः॥ ५२<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद्भक्त्या च मम भावितः।<br>जैगीषव्यगुहा श्रेष्ठा योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५३<br>ध्यायन्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्दप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानामपि दुर्लभम्॥ ५४यहाँ हजारों पाप करके पिशाचत्वको प्राप्त होना मनुष्योंके लिये अच्छा है, किंतु काशीपुरीको छोड़कर स्वर्गमें हजार बार इन्द्र होना अच्छा नहीं है। अतएव मुक्तिके लिये इस अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करना चाहिये। महातपस्वी महर्षि जैगीषव्यने इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा मेरी भक्तिसे युक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की थी। महर्षि जैगीषव्यकी श्रेष्ठ गुफा योगियोंकी स्थली मानी जाती है। योगी लोग वहाँ सदा मेरा ध्यान करते हैं और वहाँ योगकी अग्नि तीव्रतासे प्रज्वलित होती रहती है। मनुष्य [यहाँ] परम कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ५१-५४॥
अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभोऽन्यत्र कर्हिचित्॥ ५५<br>तेभ्यश्चाहं प्रवक्ष्यामि योगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ५६अव्यक्त लिङ्गोंवाले तथा सभी सिद्धान्तोंको जाननेवाले मुनिगण यहाँ मोक्ष प्राप्त करते हैं, जो अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। मैं उनके लिये अत्युत्तम योगैश्वर्य तथा अपने सायुज्यरूप अभीष्ट स्थानको बताऊँगा।
कुबेरोऽत्र मम क्षेत्रे मयि सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंसेवनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ५७मेरे क्षेत्रमें अपनी सभी क्रियाएँ मुझमें समर्पित करनेवाले कुबेरने क्षेत्रके सेवनसे ही गणेशत्वको प्राप्त किया था।
संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्तो ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ५८हे देवि! जो ऋषि संवर्त नामक मेरे भक्त जन्म लेंगे, वे भी यहाँ मेरी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त करेंगे।
पाराशरसुतो योगी ऋषिव्यासो महातपाः।<br>मम भक्तो भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ५९हे कमलनयने! महातपस्वी पराशरपुत्र योगी ऋषि व्यास मेरे भक्त होंगे; वेदसंहिताओंका प्रवर्तन

अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः ।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वापि दिवाकरः ॥ ६०<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः ।<br>उपासते महात्मानः सर्वे मामिह सुव्रते ॥ ६१करनेवाले वे मुनिश्रेष्ठ भी इस क्षेत्रमें विहार करेंगे। हे सुव्रते ! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, देवराज इन्द्र अन्य देवता लोग तथा महात्मा—ये सब यहाँपर मेरी उपासना करते हैं॥ ५५-६१॥
अन्येऽपि योगिनो दिव्याश्छन्नरूपा महात्मनः ।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा ॥ ६२<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः ।<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारे न पुनर्भवेत् ॥ ६३<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः ।<br>व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः ॥ ६४<br>देवदेवं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः ।<br>गता इह परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६५<br>जन्मान्तरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ।<br>तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥ ६६अन्य दिव्य योगी तथा महात्मा लोग भी प्रच्छन्न [गुप्त] रूप धारणकर एकाग्रचित्त होकर यहाँपर सदा मेरी उपासना करते रहते हैं। विषयोंमें आसक्त मनवाला तथा धर्मका त्याग किया हुआ मनुष्य भी यदि इस क्षेत्रमें मृत हो जाय, तो वह भी संसारमें पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है; तो फिर हे सुव्रते ! जो ममतारहित, धीर, सत्त्वगुणमें स्थित, जितेन्द्रिय, व्रती, कर्मप्रवृत्तिसे रहित, मुझमें ध्यानरत, बुद्धिमान् तथा संगरहित हैं—वे सब [मुझ] देवदेवको प्राप्त करके मेरी कृपासे यहाँ श्रेष्ठ मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं। हे सुव्रते ! हजारों जन्मोंमें भी योगी जिस [मोक्ष]-को प्राप्त नहीं कर पाता है, उस उत्तम मोक्षको वह यहाँपर मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है॥ ६२–६६॥
गोप्रेक्षकमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा।<br>कैलासभवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥ ६७<br>गोप्रेक्षकमथागम्य दृष्ट्वा मामत्र मानवः ।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥ ६८<br>कपिलाह्रदमित्येवं तथा वै ब्रह्मणा कृतम् ।<br>गवां स्तन्यजतोयेन तीर्थं पुण्यतमं महत् ॥ ६९<br>अत्रापि स्वयमेवाहं वृषध्वज इति स्मृतः ।<br>सान्निध्यं कृतवान् देवि सदाहं दृश्यते त्वया ॥ ७०हे वरानने ! पूर्वकालमें यहाँ ब्रह्माके द्वारा स्थापित किये गये कैलास भवन नामक इस गोप्रेक्षक क्षेत्रको देखो। इस गोप्रेक्षक [क्षेत्र]-में आकर मेरा दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे छूट जाता है। इसी प्रकार यहाँपर ब्रह्माने गायोंके दूधसे कपिलाह्रद नामक विशाल तथा पुण्यतम तीर्थका निर्माण किया है। यहाँ भी मैं स्वयं वृषभध्वज—इस नामसे विख्यात हूँ। हे देवि ! मैंने सदासे यहाँ निवास किया है; ऐसा आप देखती भी हैं॥ ६७–७०॥
भद्रतोयं च पश्येह ब्रह्मणा च कृतं ह्रदम्।<br>सर्वैर्देवैरहं देवि अस्मिन् देशे प्रसादितः ॥ ७१<br>गच्छोपशममीशेति उपशान्तः शिवस्तथा।<br>अत्राहं ब्रह्मणानीय स्थापितः परमेष्ठिना ॥ ७२<br>ब्रह्मणा चापि सङ्गृह्य विष्णुना स्थापितः पुनः ।<br>ब्रह्मणापि ततो विष्णुः प्रोक्तः संविग्नचेतसा ॥ ७३<br>मयानीतमिदं लिङ्गं कस्मात्स्थापितवानसि ।<br>तमुवाच पुनर्विष्णुर्ब्रह्माणं कुपिताननम् ॥ ७४यहाँ ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये भद्रतोय नामक सरोवरको देखो। हे देवि! सभी देवताओंने 'हे ईश! शान्त हो जाइए'—ऐसा कहकर इस स्थानपर मुझ शिवको प्रसन्न किया था, तब मैं शान्त हो गया था। परमेष्ठी ब्रह्माने यहाँ लाकर मुझे स्थापित किया। ब्रह्माजीसे प्राप्त करके विष्णुने पुनः स्थापित किया। तब दुःखी चित्तवाले ब्रह्माने विष्णुसे कहा—आपने मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको क्यों स्थापित किया? तत्पश्चात् विष्णु कुपितमुखवाले उन ब्रह्मासे पुनः बोले—रुद्र
४८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| रुद्रे देवे ममात्यन्तं परा भक्तिर्महत्तरा।<br>मयैव स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति॥ ७५ | देवतामें मेरी अत्यधिक, श्रेष्ठ तथा महत्तर भक्ति है; मेरे द्वारा स्थापित किया गया यह लिङ्ग आपके ही नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७१-७५॥ | | हिरण्यगर्भ इत्येवं ततोऽत्राहं समास्थितः।<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं मम लोकं व्रजेन्नरः॥ ७६<br><br>ततः पुनरपि ब्रह्मा मम लिङ्गमिदं शुभम्।<br>स्थापयामास विधिवद्भक्त्या परमया युतः॥ ७७<br><br>स्वर्लीनेश्वर इत्येवमत्राहं स्वयमागतः।<br>प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न पुनर्जायते क्वचित्॥ ७८ | [हे देवि!] मैं तभीसे यहाँ हिरण्यगर्भ—इस नामसे स्थित हूँ। इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा लोक प्राप्त करता है। तत्पश्चात् ब्रह्माने परम भक्तिसे युक्त होकर मेरे इस पवित्र लिङ्गको विधिपूर्वक पुनः स्थापित किया। मैं यहाँ स्वर्लीनेश्वर नामसे स्वयं विद्यमान हूँ; यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्य कभी जन्म नहीं लेता है। जो गति योगियोंकी कही गयी है, वह अनन्य गति उसकी भी होती है॥ ७६-७८ १/२॥ | | अनन्या सा गतिस्तस्य योगिनां चैव या स्मृता।<br>अस्मिन्नपि मया देशे दैत्यो दैवतकण्टकः॥ ७९<br><br>व्याघ्ररूपं समास्थाय निहतो दर्पितो बली।<br>व्याघ्रेश्वर इति ख्यातो नित्यमत्राहमास्थितः॥ ८०<br><br>न पुनदुर्गतिं याति दृष्ट्वैनं व्याघ्रीमीश्वरम्।<br>उत्पलो विदलश्चैव यौ दैत्यौ ब्रह्मणा पुरा॥ ८१<br><br>स्त्रीवध्यौ दर्पितौ दृष्ट्वा त्वयैव निहतौ रणे।<br>सावज्ञं कन्दुकेनात्र तस्येदं देहमास्थितम्॥ ८२ | इसी स्थानपर मैंने व्याघ्रका रूप धारण करके देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक अभिमानी तथा बलवान् दैत्यका वध किया था; [तभीसे] व्याघ्रेश्वर इस नामसे प्रसिद्ध होकर मैं यहाँ सदा स्थित हूँ। इन व्याघ्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य पुनः दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है। पूर्वकालमें उत्पल तथा विदल नामक जिन दो दैत्योंके लिये ब्रह्माने स्त्रीके द्वारा वध्य होनेका विधान किया था, उन्हें अभिमानयुक्त देखकर आपने ही रणमें अवज्ञापूर्वक एक कन्दुकसे मार डाला था; आपके उसी कन्दुकका यह देह यहाँ स्थापित हो गया अर्थात् वह कन्दुक लिङ्गरूपमें परिणत होकर स्थापित हो गया॥ ७९-८२॥ | | आदावत्राहमागम्य प्रस्थितो गणपैः सह।<br>ज्येष्ठस्थानमिदं तस्मादेतन्मे पुण्यदर्शनम्॥ ८३<br><br>देवैः समन्तादेतानि लिङ्गानि स्थापितान्यतः।<br>दृष्ट्वापि नियतो मर्त्यो देहभेदे गणो भवेत्॥ ८४ | प्रारम्भमें गणपोंके साथ आकर मैं यहाँ स्थित हो गया, अतः यह ज्येष्ठस्थान है; यहाँ मेरा दर्शन पुण्यप्रद है। देवताओंने यहाँ सभी ओर इन लिङ्गोंको स्थापित किया है; अतः भक्तियुक्त होकर इन लिङ्गोंका केवल दर्शन करके मनुष्य मृत्यु होनेपर [शिवका] गण हो जाता है॥ ८३-८४॥ | | पित्रा ते शैलराजेन पुरा हिमवता स्वयम्।<br>मम प्रियहितं स्थानं ज्ञात्वा लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ८५<br><br>शैलेश्वरमिति ख्यातं दृश्यतामिह चादरात्।<br>दृष्ट्वैतन्मनुजो देवि न दुर्गतिमतो व्रजेत्॥ ८६ | [हे देवि!] पूर्वकालमें स्वयं तुम्हारे पिता पर्वत-राज हिमालयने इसे मेरा प्रिय तथा हितकर स्थान समझकर यहाँ लिङ्गकी स्थापना की थी। शैलेश्वर नामसे प्रसिद्ध इस लिङ्गको तुम आदरपूर्वक देखो। हे देवि! इसका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है॥ ८५-८६॥ | | नद्येषा वरुणा देवि पुण्या पापप्रमोचनी।<br>क्षेत्रमेतदलङ्कृत्य जाह्नव्या सह सङ्गता॥ ८७ | हे देवि! पुण्यमयी तथा पापको नष्ट करनेवाली |

अध्याय ९२] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८३


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
स्थापितं ब्रह्मणा चापि सङ्गमे लिङ्गमुत्तमम्।<br>सङ्गमेश्वरमित्येवं ख्यातं जगति दृश्यताम्॥ ८८<br>सङ्गमे देवनद्या हि यः स्नात्वा मनुजः शुचिः।<br>अर्चयेत्सङ्गमेशानं तस्य जन्मभयं कुतः॥ ८९यह वरुणा नदी इस क्षेत्रको अलंकृत करके गंगाके साथ मिल जाती है। इनके संगमपर भी ब्रह्माके द्वारा उत्तम लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह संगमेश्वर—इस नामसे जगत्में प्रसिद्ध है, तुम इसका दर्शन करो। देवनदीके संगमपर स्नान करके शुद्ध होकर जो मनुष्य संगमेश्वरकी पूजा करता है, उसे जन्मभय कहाँसे हो सकता है!॥ ८७—८९ ॥
इदं मन्ये महाक्षेत्रं निवासो योगिनां परम्।<br>क्षेत्रमध्ये च यत्राहं स्वयं भूत्वाग्रमास्थितः॥ ९०<br>मध्यमेश्वरमित्येवं ख्यातः सर्वसुरासुरैः।<br>सिद्धानां स्थानमेतद्धि मदीयव्रतधारिणाम्॥ ९१<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां ज्ञानयोगरतात्मनाम्।<br>दृष्ट्वैनं मध्यमेशानं जन्म प्रति न शोचति॥ ९२[हे देवि!] मैं इसे महाक्षेत्र मानता हूँ; यह योगियोंका परम निवास-स्थान है। इस श्रेष्ठ क्षेत्रके मध्यमें मैं स्वयं प्रकट होकर अधिष्ठित हूँ। सभी सुर तथा असुर [यहाँ] मुझे मध्यमेश्वर—इस नामसे कहते हैं। मेरा व्रत धारण करनेवाले सिद्धों और मोक्षकी अभिलाषावाले तथा ज्ञानयोगमें परायण मनवाले योगियोंका यह निवास-स्थान है। इन मध्यमेश्वरका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य अपने जन्मके विषयमें चिन्ता नहीं करता है॥ ९०—९२ ॥
स्थापितं लिङ्गमेतत्तु शुक्रेण भृगुसूनुना।<br>नाम्ना शुक्रेश्वरं नाम सर्वसिद्धामरार्चितम्॥ ९३<br>दृष्ट्वैनं नियतः सद्यो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>मृतश्च न पुनर्जन्तुः संसारी तु भवेन्नरः॥ ९४भृगुपुत्र शुक्राचार्यने भी यहाँ लिङ्गको स्थापित किया है; शुक्रेश्वर नामसे विख्यात यह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंसे पूजित है। नियमित होकर इनका दर्शन करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर पुनः संसारी जीव नहीं होता है॥ ९३-९४॥
पुरा जम्बुकरूपेण असुरो देवकण्टकः।<br>ब्रह्मणो हि वरं लब्ध्वा गोमायुर्बन्धशङ्कितः॥ ९५<br>निहतो हिमवत्पुत्रि जम्बुकेशस्ततो ह्यहम्।<br>अद्यापि जगति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्॥ ९६<br>दृष्ट्वैनमपि देवेशं सर्वान् कामानवाप्नुयात्।<br>ग्रहैः शुक्रपुरोगैश्च एतानि स्थापितानि ह॥ ९७<br>पश्य पुण्यानि लिङ्गानि सर्वकामप्रदानि तु।<br>एवमेतानि पुण्यानि मन्निवासानि पार्वति॥ ९८<br>कथितानि मम क्षेत्रे गुह्यं चान्यदिदं शृणु।<br>चतुःक्रोशं चतुर्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम्॥ ९९पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटकस्वरूप एक दैत्य सियारके रूपमें विद्यमान था। अपने बन्धनसे सशंकित उस दैत्यने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके गोमायु (सियार)-का रूप धारण कर लिया था। हे पार्वति! मैंने उसका वध किया और तब मैं जम्बुकेश कहा जाने लगा; आज भी लोकमें प्रसिद्ध तथा देवताओं और असुरोंसे नमस्कृत इन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। [हे देवि!] शुक्र आदि प्रधान ग्रहोंके द्वारा स्थापित किये गये इन पुण्यमय तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले लिङ्गोंका दर्शन करो। हे पार्वति! इस प्रकार मैंने अपने निवासस्वरूप इन पवित्र लिङ्गोंका वर्णन किया; मेरे क्षेत्रमें एक अन्य गुप्त रहस्य भी है, इसे सुनो॥ ९५-९८ १/२॥
४८४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| योजनं विद्धि चार्वङ्गि मृत्युकालेऽमृतप्रदम्।<br>महालयगिरिस्थं मां केदारे च व्यवस्थितम्॥ १००<br><br>गणत्वं लभते दृष्ट्वा ह्यस्मिन् मोक्षो ह्यवाप्यते।<br>गाणपत्यं लभेदस्माद्यतः सा मुक्तिरुत्तमा॥ १०१<br><br>ततो महालयात्तस्मात्केदारान्मध्यमादपि।<br>स्मृतं पुण्यतमं क्षेत्रमविमुक्तं वरानने॥ १०२<br><br>केदारं मध्यमं क्षेत्रं स्थानं चैव महालयम्।<br>मम पुण्यानि भूलोके तेभ्यः श्रेष्ठतमं त्विदम्॥ १०३ | यह क्षेत्र चारों दिशाओंमें चार कोस अतएव एक योजनमें कहा गया है; हे सुन्दर अंगोंवाली! मृत्युकालमें इसे अमरता प्रदान करनेवाला जानो। महालय गिरिमें विराजमान और केदारपर स्थित मेरा दर्शन करके मनुष्य गणत्व प्राप्त करता है, किंतु इस क्षेत्रमें मोक्षकी प्राप्ति होती है। उन स्थानोंमें गणपति पद प्राप्त होता है और यहाँपर उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है, अतः हे वरानने! उस महालय, केदार तथा मध्यम क्षेत्र—इन सबसे पुण्यप्रद यह अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। केदार, मध्यमक्षेत्र तथा महालय स्थान—ये तीनों पृथ्वीलोकमें मेरे पवित्र क्षेत्र हैं, किंतु यह [अविमुक्तक्षेत्र] उनसे भी अधिक श्रेष्ठ है॥ ९९–१०३॥ | | यतः सृष्टास्त्विमे लोकास्ततः क्षेत्रमिदं शुभम्।<br>कदाचिन्न मया मुक्तमविमुक्तं ततोऽभवत्॥ १०४<br><br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं मम दृष्ट्वेह मानवः।<br>सद्यः पापविनिर्मुक्तः पशुपाशैर्विमुच्यते॥ १०५<br><br>शैलेशं सङ्गमेशं च स्वर्लीनं मध्यमेश्वरम्।<br>हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं वृषभध्वजम्॥ १०६<br><br>उपशान्तं शिवं चैव ज्येष्ठस्थाननिवासिनम्।<br>शुक्रेस्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम्॥ १०७<br><br>दृष्ट्वा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे। | जबसे इन लोकोंकी सृष्टि की गयी है, तबसे मैंने इस पवित्र क्षेत्रका परित्याग कभी नहीं किया, इसलिये यह अविमुक्त [क्षेत्र] हो गया। यहाँ मेरे अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शीघ्र ही पापोंसे मुक्त होकर पशुपाशों (जीवबन्धन)—से छूट जाता है। शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भ, ईशान, गोप्रेक्ष, वृषभध्वज, उपशान्त, ज्येष्ठस्थानमें निवास करनेवाले शिव, शुक्लेश्वर, प्रसिद्ध व्याघ्रेश्वर तथा जम्बुकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुःखके सागररूप संसारमें [पुनः] जन्म नहीं लेता है॥ १०४–१०७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा महादेवे दिशः सर्वा व्यलोकयत्॥ १०८<br><br>विलोक्य संस्थिते पश्चाद्देवदेवे महेश्वरे।<br>अकस्मादभवत्सर्वः स देशोज्ज्वलितो यथा॥ १०९<br><br>ततः पाशुपताः सिद्धा भस्माभ्यङ्गसितप्रभाः।<br>माहेश्वरा महात्मानस्तथा वै नियतव्रताः॥ ११०<br><br>बहवः शतशोऽभ्येत्य नमश्चक्रुर्महेश्वरम्।<br>पुनर्निरीक्ष्य योगेशं ध्यानयोगं च कृत्स्नशः॥ १११<br><br>तस्थुरात्मानमास्थाय लीयमाना इवेश्वरे।<br>स्थितानां स तदा तेषां देवदेव उमापतिः॥ ११२<br><br>स बिभ्रत्परमां मूर्तिं बभूव पुरुषः प्रभुः।<br>कृत्स्नं जगदिहैकस्थं कर्तुमन्त इव स्थितः॥ ११३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर महादेवने सभी दिशाओंकी ओर देखा। [दिशाओंकी ओर] देखकर देवदेव महेश्वरके बैठ जानेके अनन्तर वह सम्पूर्ण स्थान सहसा देदीप्यमान हो गया। तत्पश्चात् भस्म लगानेसे श्वेत प्रभाववाले, नियम-व्रत धारण करनेवाले, पशुपतिके भक्त और महेश्वरके प्रति समर्पित बहुत-से सैकड़ों सिद्ध तथा महात्माओंने वहाँ आकर महेश्वरको प्रणाम किया; पुनः वे ध्यानयोगमें स्थित योगेश्वर [शिव]—को बार-बार देखकर अपने मनको स्थिर करके उन ईश्वरमें लीन होते हुए—से स्थित हो गये। उनके इस प्रकार स्थित होनेपर वे देवदेव उमापति परम मूर्ति धारण करते हुए विराट् पुरुषके रूपमें हो गये; वे सम्पूर्ण जगत्को एक स्थानपर एकत्र करनेके |

अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४८५


| तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः।<br>न शशाक पुनर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा ॥ ११४<br>ततस्त्वदृष्टमाकारं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम्।<br>प्रकृतेर्मूर्तिमास्थाय योगेन परमेश्वरी ॥ ११५<br>तं शशाक पुनर्द्रष्टुं हरस्य च महात्मनः।<br>ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु ॥ ११६<br>विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः।<br>पञ्चाक्षरस्य वै बीजं संस्मरन्तः सुशोभनम् ॥ ११७<br>सर्वपापहरं दिव्यं पुरा चैव प्रकाशितम्।<br>नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम् ॥ ११८<br>तं दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा।<br>स्तुवती चरणौ नत्वा क इमे भगवन्निति ॥ ११९<br>तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम्।<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः ॥ १२०<br>यैर्यैर्योग इहाभ्यस्तास्तेषामेकेन जन्मना।<br>क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन भक्त्या च मम भामिनि ॥ १२१<br>अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मूर्तितः स्वयम्।<br>तस्मादेतन्महत्क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेवितं तथा ॥ १२२<br>श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः।<br>प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम् ॥ १२३<br>उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यामुपास्यते।<br>शशिभानूपरागे च कार्तिका्यां च विशेषतः ॥ १२४<br>सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च।<br>पृथिव्यां सर्वतीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवीम् ॥ १२५<br>उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिःसृताम्।<br>पितुस्ते गिरिराजस्य शुभां हिमवतः सुताम् ॥ १२६<br>पुण्यस्थानस्थितां पुण्यां पुण्यदिक्प्रवहां सदा।<br>भजन्ते सर्वतोऽभ्येत्य ये ताञ्छृणु वरानने ॥ १२७ | लिये प्रलयकालके समान खड़े हो गये॥ १०८–११३॥<br><br>तब पुलकित रोमोंवाली पार्वती वहाँ स्थित उन जगत्प्रभुकी उस परम मूर्तिको पुनः देखनेमें समर्थ न हो सकीं। तदनन्तर पहले कभी न देखे गये उस स्वरूपको प्रकृतिमें स्थित समझकर वे परमेश्वरी योगके द्वारा प्रकृतिका रूप धारणकर महात्मा शिवके उस स्वरूपको पुनः देखनेमें समर्थ हो गयीं॥ ११४-११५ १/२॥<br><br>तब अत्यन्त सुन्दर पंचाक्षर मन्त्रका स्मरण करते हुए दग्ध लिङ्गवाले वे सभी योगी शिवके ध्यानमें लीन होकर उन [विराट्] पुरुषके हृदयमें प्रविष्ट हुए। तदनन्तर शिवजीने सभी पापोंका हरण करनेवाले, दिव्य तथा पूर्वमें प्रकट किये गये नीललोहितमूर्तिस्थ रूपको पुनः धारण किया॥ ११६–११८॥<br><br>उस रूपको देखकर पुलकित समस्त रोमोंवाली पार्वती स्तुति करते हुए तथा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—‘हे भगवन्! ये कौन हैं?’ तब सुरश्रेष्ठ [शिव] पर्वतराजकी उन पुत्रीसे कहने लगे॥ ११९ १/२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले—हे भामिनि! मेरे व्रतका आश्रय लेकर जिन-जिन भक्तियुक्त श्रेष्ठ द्विजोंने यहाँ योगका अभ्यास किया है, उनके एक जन्ममें ही इस क्षेत्रके प्रभाव तथा उनकी भक्तिके कारण मैं स्वयं विग्रहरूपसे इस प्रकारका अनुग्रह करता हूँ। अतः यह महान् क्षेत्र ब्रह्मा आदि [देवताओं], वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों, सिद्धों तथा तपस्वियोंके द्वारा सेवित है। हे देवि! प्रत्येक महीनेमें दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको वाराणसीमें शिवकी पूजा की जाती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर, विशेषकर कार्तिक महीनेमें, पुण्यप्रद सभी पर्वोंमें, विषुवत् एवं अयन संक्रान्तियोंमें पृथ्वीपर स्थित सभी तीर्थ वाराणसीमें विद्यमान उत्तरवाहिनी, पुण्यमयी, मेरे सिरसे निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमालयकी पुत्री, पुण्यमयस्थानमें विराजमान और सदा पुण्य दिशाकी ओर प्रवाहित होनेवाली पवित्र गंगाका सेवन करते हैं। हे वरानने! सभी ओरसे आकर जो उन भागीरथीका सेवन करते हैं, उन्हें सुनो॥ १२०–१२७॥ |