श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९२ ] अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन ४७५
बानबेवाँ अध्याय
अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य तथा श्रीविश्वेश्वरपूजाविधिवर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>एवं वाराणसी पुण्या यदि सूत महामते।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्प्रभावं हि साम्प्रतम्॥ १<br><br>क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्यमविमुक्तस्य शोभनम्।<br>विस्तरेण यथान्यायं श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे महाबुद्धिमान् सूतजी! यदि वाराणसी ऐसी पुण्यदायिनी है, तो अब हमलोगोंको उसका प्रभाव कृपापूर्वक बताइये; हमलोगोंको इस अविमुक्तक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको विस्तारपूर्वक विधिके अनुसार सुननेकी बड़ी उत्सुकता है॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सम्यक् वाराणस्याः सुशोभनम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं यथाहा भगवान् भवः॥ ३<br><br>विस्तरेण मया वक्तुं ब्रह्मणा च महात्मना।<br>शक्यते नैव विप्रेन्द्रा वर्षकोटिशतैरपि॥ ४ | **सूतजी बोले—**वाराणसीके अविमुक्तक्षेत्रके अति उत्तम माहात्म्यको मैं भली-भाँति संक्षेपमें बता रहा हूँ, जैसा कि भगवान् शिवने कहा था। हे विप्रेन्द्रो! मेरे तथा महात्मा ब्रह्माके द्वारा सौ करोड़ वर्षोंमें भी विस्तारसे इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ ३-४॥ |
| देवः पुरा कृतोद्वाहः शङ्करो नीललोहितः।<br>हिमवच्छिखराद्देव्या हैमवत्या गणेश्वरैः॥ ५<br><br>वाराणसीमनुप्राप्य दर्शयामास शङ्करः।<br>अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं वासं तत्र चकार सः॥ ६ | प्राचीन कालमें विवाह करनेके पश्चात् नीललोहित भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरसे देवी पार्वती तथा गणेश्वरोंके साथ वाराणसीमें पहुँचकर [अपने] अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन कराया और वे वहीं रहने लगे। |
| वाराणसीकुरुक्षेत्रश्रीपर्वतमहालये ।<br>तुङ्गेश्वरे च केदारे तत्स्थाने यो यतिर्भवेत्॥ ७<br><br>योगे पाशुपते सम्यक् दिनमेकं यतिर्भवेत्।<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य चरेत्पाशुपतं व्रतम्॥ ८ | वाराणसी, कुरुक्षेत्र, श्रीपर्वत, महालय, तुंगेश्वर और केदार—इन स्थानोंमें जो यति होता है; वह दूसरे जन्ममें पाशुपतयोग सिद्ध हो जानेपर एक ही दिनमें सम्यक् (ब्रह्मज्ञानसम्पन्न) यति हो जाता है। अतः सबकुछ छोड़कर पाशुपतव्रत करना चाहिये और वहाँ देवोद्यानमें वास करना चाहिये। |
| देवोद्याने वसेत्तत्र शर्वोद्यानमनुत्तमम्।<br>मनसा निर्ममे रुद्रो विमानं च सुशोभनम्॥ ९ | शिवजीका उद्यान अत्यन्त उत्तम है। रुद्रने मनसे एक परम सुन्दर भवनका निर्माण किया है। |
| दर्शयामास च तदा देवोद्यानमनुत्तमम्।<br>हैमवत्याः स्वयं देवः सनन्दी परमेश्वरः॥ १० | तब नन्दीसहित देव परमेश्वरने स्वयं पार्वतीको उस अत्युत्तम देवोद्यान |