भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 476
४७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं हि योगसंयुक्तः शुचिर्दान्तो जितेन्द्रियः।<br>आत्मानं विद्यते यस्तु स सर्वं विन्दते द्विजाः॥ ६५<br><br>तस्मात्पाशुपतैर्यौगैरात्मानं चिन्तयेद् बुधः।<br>आत्मानं जानते ये तु शुचयस्ते न संशयः॥ ६६हे द्विजो ! इस प्रकार योगसम्पन्न, विशुद्ध, मनपर नियन्त्रण करनेवाला तथा जितेन्द्रिय जो व्यक्ति आत्माको जान लेता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। अतः बुद्धिमान्‌को पाशुपत योगोंके द्वारा आत्मचिन्तन करना चाहिये। जो आत्माको जान लेते हैं, वे शुद्ध हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६५-६६॥
ऋचो यजूंषि सामानि वेदोपनिषदस्तथा।<br>योगज्ञानादवाप्नोति ब्राह्मणोऽध्यात्मचिन्तकः॥ ६७<br><br>सर्वदेवमयो भूत्वा अभूतः स तु जायते।<br>योनिसङ्क्रमणं त्यक्त्वा याति वै शाश्वतं पदम्॥ ६८अध्यात्मका चिन्तन करनेवाला ब्राह्मण योगज्ञानके द्वारा ऋक्-यजुः-सामकी ऋचाओं, सभी वेदों तथा उपनिषदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है। वह सर्वदेवमय होकर लिङ्गशरीरसे शून्य हो जाता है और पुनर्जन्मका त्याग करके शाश्वत पद (शिवपद)-को प्राप्त करता है॥ ६७-६८॥
यथा वृक्षात्फलं पक्वं पवनेन समीरितम्।<br>नमस्कारेण रुद्रस्य तथा पापं प्रणश्यति॥ ६९<br><br>यत्र रुद्रनमस्कारः सर्वकर्मफलो ध्रुवः।<br>अन्यदेवनमस्कारान्न तत्फलमवाप्नुयात्॥ ७०<br><br>तस्मात् त्रिःप्रवणं योगी उपासीत महेश्वरम्।<br>दशविस्तारकं ब्रह्म तथा च ब्रह्मविस्तरैः॥ ७१जिस प्रकार पका हुआ फल वायुद्वारा हिलाये जानेपर वृक्षसे गिर पड़ता है, उसी प्रकार भगवान् सदाशिवके नमस्कारसे पाप नष्ट हो जाता है। रुद्रनमस्कार निश्चितरूपसे सभी कर्मोंका फल देनेवाला है; अन्य देवताओंको नमस्कार करनेसे उनका फल प्राप्त नहीं होता है, अतः मन, वचन, कर्म—इन तीनोंसे विनम्र होकर योगीको महेश्वर तथा दसों इन्द्रियोंका विस्तार करनेवाले ब्रह्मकी उपासना दसों इन्द्रियोंसे करनी चाहिये॥ ६९—७१॥
एवं ध्यानसमायुक्तः स्वदेहं यः परित्यजेत्।<br>स याति शिवसायुज्यं समुद्धृत्य कुलत्रयम्॥ ७२<br><br>अथवारिष्टमालोक्य मरणे समुपस्थिते।<br>अविमुक्तेश्वरं गत्वा वाराणस्यां तु शोधनम्॥ ७३<br><br>येन केनापि वा देहं सन्त्यजेन्मुच्यते नरः।<br>श्रीपर्वते वा विप्रेन्द्राः सन्त्यजेत्स्वतनं नरः॥ ७४<br><br>स याति शिवसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रं जन्तूनां मुक्तिदं सदा॥ ७५<br><br>सेवेत सततं धीमान् विशेषान्मरणान्तिके॥ ७६इस प्रकार ध्यानमग्न होकर जो अपने शरीरका त्याग करता है, वह तीनों कुलोंका उद्धार करके शिवसायुज्य प्राप्त करता है। अथवा [योगोपासनामें असमर्थ होनेपर] कुछ अरिष्ट देखनेपर और मृत्यु आसन्न होनेपर वाराणसीमें अविमुक्तेश्वरमें जाकर शुद्धि (प्रायश्चित्त) करनी चाहिये; जिस-किसी तरह वहाँ देहत्याग कर देना चाहिये; इससे वह मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे विप्रेन्द्रो ! जो मनुष्य श्रीपर्वतपर अपने शरीरको छोड़ता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् [व्यक्ति]-को प्राणियोंको सदा मुक्ति देनेवाले उत्तम अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में विशेषरूपसे मरणकालमें वास करना चाहिये॥ ७२—७६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अरिष्टकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः॥ ९१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अरिष्टकथन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९१॥

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