श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ११ ] आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधनामें प्रणवका माहात्म्य ४७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मात्रा सार्धं च तिस्रस्तु विज्ञेयाः परमार्थतः।<br>तत्प्रयुक्तस्तु यो योगी तस्य सालोक्यमाप्नुयात् ॥ ५२ | है; वस्तुतः अर्धमात्रासहित इसकी तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। जो योगी इस प्रणवसे प्रेरित होता है, वह ब्रह्मका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥५०—५२॥ |
| अकारो ह्यक्षरो ज्ञेय उकारः सहितः स्मृतः।<br>मकारसहितोङ्कारस्त्रिमात्र इति संज्ञितः॥५३<br><br>अकारस्त्वेष भूर्लोक उकारो भुव उच्यते।<br>सव्यञ्जनो मकारस्तु स्वर्लोक इति गीयते॥५४<br><br>ओङ्कारस्तु त्रयो लोकाः शिरस्तस्य त्रिविष्टपम्।<br>भुवनाङ्गं च तत्सर्वं ब्राह्मं तत्पदमुच्यते॥५५<br><br>मात्रापादो रुद्रलोको ह्यमात्रं तु शिवं पदम्।<br>एवं ज्ञानविशेषेण तत्पदं समुपास्यते॥५६<br><br>तस्माद्ध्यानरतिर्नित्यममात्रं हि तदक्षरम्।<br>उपास्यं हि प्रयत्नेन शाश्वतं सुखमिच्छता॥५७ | अकारको अक्षर जानना चाहिये; इसके साथ उकारका संयोग कहा गया है। पुनः मकार (अनुस्वार)-के योगसे बना हुआ ओंकार तीन मात्रावाला कहा गया है। अकारको भूलोक तथा उकारको भुवर्लोक कहा जाता है। व्यंजनसहित मकारको स्वर्लोक कहा जाता है। ओंकार त्रिलोकस्वरूप है, उसका सिर स्वर्ग है, सभी भुवन अंग हैं। ब्रह्मलोकको उसका पाद कहा जाता है। रुद्रलोक मात्रापादरूप है। शिवपद मात्रासे अतीत है— इस ज्ञानविशेषके द्वारा उस तुरीय पदकी उपासना की जाती है। इसलिये सदा ध्यानपरायणता होनी चाहिये। शाश्वत (स्थिर) सुख चाहनेवालेको उस मात्रातीत अक्षर [शिवतत्त्व]-की प्रयत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिये॥५३—५७॥ |
| ह्रस्वा तु प्रथमा मात्रा ततो दीर्घा त्वनन्तरम्।<br>ततः प्लुतवती चैव तृतीया चोपदिश्यते॥५८<br><br>एतास्तु मात्रा विज्ञेया यथावदनुपूर्वशः।<br>यावदेव तु शक्यन्ते धार्यन्ते तावदेव हि॥५९<br><br>इन्द्रियाणि मनो बुद्धिं ध्यायन्नात्मनि यः सदा।<br>अर्ध तन्मात्रमपि चेच्छृणु यत्फलमाप्नुयात् ॥ ६०<br><br>मासे मासेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः।<br>तेन यत्प्राप्यते पुण्यं मात्रया तदवाप्नुयात् ॥ ६१<br><br>न तथा तपसोग्रेण न यज्ञैर्भूरिदक्षिणैः।<br>यत्फलं प्राप्यते सम्यङ्मात्रया तदवाप्नुयात् ॥ ६२ | [ॐकी] पहली मात्रा ह्रस्व है और दूसरी मात्रा दीर्घ है। तीसरी मात्रा प्लुत कही जाती है। इन मात्राओंको क्रमशः यथावत् जानना चाहिये। जितना अपना सामर्थ्य हो सके, उतना मनीषी लोग इन्हें धारण कर सकते हैं। इन्द्रियों, मन तथा बुद्धिको नियन्त्रित करके यदि जो कोई आत्मामें सदा अर्धमात्राका ध्यान करता है, तो वह जिस फलको प्राप्त करता है, उसे सुनिये। जो सौ वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासमें अश्वमेध यज्ञ करता है, वह उसके द्वारा जो पुण्य पाता है, उसे इस मात्रासे प्राप्त कर लेता है। जो फल न तो कठोर तपस्यासे और न तो विपुल दक्षिणावाले यज्ञोंसे प्राप्त किया जा सकता है, वह फल इस मात्राके द्वारा सम्यक् प्राप्त हो जाता है॥५८—६२॥ |
| तत्र चैषा तु या मात्रा प्लुता नामोपदिश्यते।<br>एषा एव भवेत्कार्या गृहस्थानां तु योगिनाम्॥६३<br><br>एषा चैव विशेषेण ऐश्वर्ये ह्राष्टलक्षणे।<br>अणिमाद्ये तु विज्ञेया तस्माद्युञ्जीत तां द्विजाः॥६४ | उस प्रणवमें जो यह प्लुत नामक मात्रा बतायी गयी है, गृहस्थ योगियोंको उसका अभ्यास करना चाहिये। विशेषरूपसे आठ लक्षणोंवाले अणिमा आदि ऐश्वर्यों (सिद्धियों)-के लिये इस मात्राको जानना चाहिये; अतः हे द्विजो! उस मात्राकी साधना करनी चाहिये॥६३-६४॥ |