श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ४७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रागुदक्प्रवणे देशे तथा युञ्जीत शास्त्रवित्।<br>कामं वितर्कं प्रीतिं च सुखदुःखे उभे तथा॥ ४०<br><br>निगृह्य मनसा सर्वं शुक्लं ध्यानमनुस्मरेत्।<br>घ्राणे च रसने नित्यं चक्षुषी स्पर्शने तथा॥ ४१<br>श्रोत्रे मनसि बुद्धौ च तत्र वक्षसि धारयेत्।<br>कालकर्माणि विज्ञाय समूहेष्वेव नित्यशः॥ ४२<br>द्वादशाध्यात्ममित्येवं योगधारणमुच्यते।<br>शतमर्धशतं वापि धारणां मूर्ध्नि धारयेत्॥ ४३<br>खिन्नस्य धारणाद्योगाद्वायुरूर्ध्वं प्रवर्तते।<br>ततश्चापूरयेद्देहमोङ्कारेण समन्वितः॥ ४४ | गयी है॥ ३७-३९॥<br><br>शास्त्रवेत्ताको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर विस्तारवाले स्थानमें ध्यानपरायण होवे। उसे कामना, तर्क, आसक्ति तथा सुख-दुःखको मनसे नियन्त्रित करके पूर्ण विशुद्ध ध्यानमें लीन हो जाना चाहिये। काल तथा कर्मोंको सदा लिङ्गशरीरोंके अन्तर्गत समझकर नाक, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन, बुद्धि तथा हृदयमें धारणा करनी चाहिये। इस प्रकार योगधारणको द्वादशाध्यात्म (बारह अध्यात्म) नामवाला कहा जाता है। सौ अथवा पचास धारणाको सिरमें धारण करना चाहिये। धारणाके अभ्याससे श्रान्त योगीकी वायु ऊपरकी ओर होने लगती है; तब ओंकारसे युक्त होकर शरीरको वायुसे पूर्ण करना चाहिये। इस प्रकार ओंकारमय योगी [अपनेको] ब्रह्ममें लीन करके ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ४०-४४ १/२॥ |
| तथोङ्कारमयो योगी अक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ओङ्कारप्राप्तिलक्षणम्॥ ४५<br>एष त्रिमात्रो विज्ञेयो व्यञ्जनं चात्र चेश्वरः।<br>प्रथमा विद्युती मात्रा द्वितीया तामसी स्मृता॥ ४६<br>तृतीयां निर्गुणां चैव मात्रामक्षरगामिनीम्।<br>गान्धारी चैव विज्ञेया गान्धारस्वरसम्भवा॥ ४७<br>पिपीलिकागतिस्पर्शा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लक्ष्यते।<br>यथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतिनिर्याति मूर्धनि॥ ४८<br>तथोङ्कारमयो योगी त्वक्षरे त्वक्षरी भवेत्।<br>प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मलक्षणमुच्यते॥ ४९<br>अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्। | [हे ऋषियो!] इसके बाद मैं ओंकारकी प्राप्तिका लक्षण बताऊँगा। इसे तीन मात्रावाला जानना चाहिये। इसमें व्यंजनसहित मकार ईश्वर (शिव) है। इसमें पहली मात्रा विद्युती (राजसी) एवं दूसरी मात्रा तामसी कही गयी है। तीसरी मकाररूप अक्षरगामिनी मात्राको सत्त्वगुणरूपवाली जानना चाहिये। इसे गान्धारी नामसे भी जानना चाहिये; क्योंकि यह गान्धारस्वरसे उत्पन्न है और पिपीलिकाकी गतिके स्पर्शके समान सूक्ष्म गतिवाली है तथा यह मूर्धदेशमें लक्षित होती है। जिस प्रकार उच्चारित किया गया ओंकार मूर्धा देशमें गमन करता है, वैसे ही ओंकारमय योगी ब्रह्ममें लीन होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है। परमेश्वरका वाचक प्रणव ही धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले प्रमादरहित साधकके द्वारा ही वह लक्ष्य वेधा जा सकता है, इसलिये उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये॥ ४५-४९ १/२॥ |
| ओमित्येकाक्षरं ह्येतद् गुहायां निहितं पदम्॥ ५०<br>ओमित्येतत् त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रयोऽग्नयः।<br>विष्णुक्रमास्त्रयस्त्वेते ऋक्सामानि यजूंषि च॥ ५१ | 'ओम्'—यह एकाक्षर पद गुहा (बुद्धि)-में निहित है। यह 'ओम्' तीनों लोकों, [ऋक्-यजुः-साम] तीनों वेदों, तीनों अग्नियों तथा विष्णुके तीनों पदोंके स्वरूपवाला |